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जन्मदिन विशेषः फैंस को ऑटोग्राफ देकर दीप्ति नवल को नीचे क्यों लिखना पड़ता था- ‘मिस चमको’

समानान्तर सिनेमा की लोकप्रिय अभिनेत्री दीप्ति नवल के जन्मदिन पर खास

Shivendra Kumar Singh Shivendra Kumar Singh Updated On: Feb 03, 2018 09:38 AM IST

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जन्मदिन विशेषः फैंस को ऑटोग्राफ देकर दीप्ति नवल को नीचे क्यों लिखना पड़ता था- ‘मिस चमको’

80 के दशक की बात है. सई परांजपे की फिल्म आई थी-चश्मे बद्दूर. इस फिल्म की अभिनेत्री दीप्ति नवल थीं. ये दीप्ति नवल के करियर के शुरुआती दौर की फिल्म थी. इस फिल्म में उनका ‘कैरेक्टर’ इतना मशहूर हुआ कि काफी दिनों बाद तक लोग उनसे मिलते थे तो ऑटोग्राफ मांगते थे और साथ में कहते थे कि नीचे ब्रैकेट में लिख दीजिएगा मिस चमको.

फिल्मी फैंस को याद होगा कि उस फिल्म में दीप्ति नवल ने एक ‘सेल्सगर्ल’ का काम किया था जो चमको वाशिंग पाउडर बेचती थी. ये दीप्ति नवल की ‘नैचुरल एक्टिंग’ थी जिसकी बदौलत उन्हें फिल्म इंडस्ट्री में शुरू से ही अलग पहचान मिली. उनके जन्मदिन पर आज आपको दीप्ति नवल का सफर बताते हैं.

दीप्ति नवल का जन्म पंजाब के अमृतसर में हुआ था. शुरुआती पढ़ाई-लिखाई भी अमृतसर के ही एक कॉन्वेंट स्कूल में हुई. दीप्ति नवल अपनी मां की शख्सियत से काफी प्रभावित थीं. इतनी ज्यादा कि वो बचपन से सोचती थीं कि बड़े होकर उन्हें अपनी मां की तरह ही बनना है.

अमेरिका में टाइपिस्ट का काम करती थीं दीप्ति नवल 

दीप्ति के पिता उदय चंद नवल पंजाब विश्वविद्यालय के हिंदू कॉलेज में इंग्लिश के हेड ऑफ द डिपार्टमेंट थे. उन्होंने अपनी बेटियों को खुला माहौल दिया. कभी किसी बात पर पाबंदी नहीं लगाई.

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दीप्ति नवल करीब 12 साल की थीं, जब उनके पिता ने अमेरिका शिफ्ट होने का फैसला किया. इस फैसले के पीछे की सोच भी अपने बच्चों को बेहतर भविष्य देने की ही थी. दीप्ति के पिता अमेरिका चले गए. वहां जाकर उन्होंने 65 साल की उम्र में ‘लिंग्विस्टक्स’ में पीएचडी की. जाहिर है शुरुआती दिन उनके लिए मुश्किलों भरे रहे. वो दिन में एक लाइब्रेरी में काम करते थे और रात में एक इमारत के चौकीदार के तौर पर काम करते थे.

इस मेहनत के पीछे की वजह थी इतने पैसों को जोड़ना कि पूरे परिवार को अमेरिका बुलाया जा सके. इस तरह दीप्ति नवल अपने परिवार के साथ अमेरिका पहुंच गईं. दीप्ति जैसे ही न्यूयॉर्क पहुंची उन्होंने सबसे पहले वहां एक टाइपिस्ट का काम खोजा. इस काम से वो अपनी ट्यूशन फीस का इंतजाम कर लेती थीं. बाद में दीप्ति ने वहां पेंटिंग की बाकायदा पढ़ाई की. इसके अलावा उन्होंने अंग्रेजी और साइकॉलजी की भी पढ़ाई की. साथ ही वहीं पर उन्होंने ‘अमेरिकन थिएटर’ की भी पढ़ाई की.

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इस दौरान वो वहां के एक रेडियो स्टेशन के लिए एक शो भी तैयार करती थीं. इसी शो के दौरान दीप्ति नवल की मुलाकात राज कपूर से हुई थी. धीरे-धीरे दीप्ति को एक्टिंग का शौक लग गया. घरवालों से बात की तो उन्हें सिरे से खारिज कर दिया गया. दीप्ति के पिताजी चाहते थे कि वो पेंटिंग करें. बावजूद इसके एक्टिंग को लेकर उनके उत्साह को देखकर आखिरकार उन्होंने दीप्ति का साथ दिया.

संवेदनशील फारूख शेख ने कभी भी मुझे ‘सीरियसली’ नहीं लिया 

1980 में विनोद पांडे एक फिल्म बना रहे थे- एक बार फिर. उस फिल्म में दीप्ति नवल को काम मिला. उस फिल्म में सईद जाफरी और सुरेश ओबेरॉय भी थे. दीप्ति नवल ने सुरेश ओबेरॉय की पत्नी का किरदार निभाया था. इसी के बाद फिल्मों में दीप्ति नवल की एक्टिंग का सिलसिला चल पड़ा. दीप्ति नवल के फिल्मी करियर को पहचान दिलाने वाली फिल्म थी चश्मे बद्दूर.

इस फिल्म का जिक्र हम पहले भी कर चुके हैं. इस फिल्म के साथ ही दर्शकों को ‘ऑनस्क्रीन’ दीप्ति नवल और फारूख की जोड़ी जम गई. इसके बाद दीप्ति नवल और फारूख शेख ने कई फिल्में एक साथ कीं जिन्हें दर्शकों ने बहुत सराहा. फारूख को याद करते हुए एक इंटरव्यू में दीप्ति नवल कहती हैं- 'फारूख मेरे बड़े प्यारे दोस्त थे. वो बहुत ही संवेदनशील अभिनेता थे. आज के दौर में इस तरह के को-स्टार का मिलना बहुत मुश्किल है. ये अलग बात है कि फारूख ने कभी भी मुझे ‘सीरियसली’ नहीं लिया. हर वक्त मजाक करते रहना उनकी आदत थी. वो और ऋषि दा जब एक साथ मिल जाते थे तो मेरी खूब खिंचाई करते थे. मैं जैसे ही सेट पर पहुंचती थी इन लोगों के ‘वन लाइनर्स’ शुरू हो जाते थे. मैं उनकी बातों से बहुत चिढ़ती थी.'

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यही वो वक्त था जब समानान्तर फिल्मों में दीप्ति नवल और फारूख शेख के अलावा नसीरूद्दीन शाह, ओम पुरी, शबाना आजमी और स्मिता पाटिल का दौर चल रहा था. दीप्ति नवल नसीरुद्दीन शाह और ओम पुरी के अभिनय से भी बहुत प्रभावित थीं. ओम पुरी को दीप्ति हमेशा ओम जी कहती थीं. ऐसा इसलिए क्योंकि स्मिता पाटिल ओम पुरी को हमेशा चिढ़ाती थी और ओम जी ही कहती थी.

ओमपुरी के योगदान को अहम मानती हैं 

दीप्ति नवल मानती हैं कि ओम पुरी साहब का हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में योगदान बहुत बड़ा है. स्मिता पाटील से भी दीप्ति नवल की अच्छी दोस्ती रही. अनकही, मैं जिंदा हूं, लीला, करंट  जैसी फिल्मों को दीप्ति नवल अपने करियर की बेहतरीन फिल्में मानती हैं. मिर्च मसाला, अंगूर, साथ-साथ  जैसी फिल्मों ने उन्हें लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचाया.

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दीप्ति नवल ने प्रकाश झा के निर्देशन में दामुल  जैसी सशक्त फिल्म की. फिल्मों के अलावा दीप्ति नवल ने दूरदर्शन के लिए सीरियल बनाए. स्टेज पर शेखर सुमन के साथ ‘प्ले’ किया. जो अमृता प्रीतम और साहिर लुधियानवी पर आधारित था. इसके अलावा दो पैसे की धूप-चार आने की बारिश जैसी फिल्म का निर्माण किया.

फिल्मों के अलावा दीप्ति नवल को पेटिंग, फोटोग्राफी और लेखन का जबरदस्त शौक है. लेखन को वो अपने दिल के बेहद करीब बताती हैं. दीप्ति नवल को अपने लेखन की नसीरुद्दीन शाह से काफी तारीफ मिलती है. नसीरुद्दीन शाह ने दीप्ति नवल की किताब ‘द ब्लैक विंड एंड अदर पोएम्स’ पढ़ी तो उसकी तारीफ की. इस किताब के लिए अमिताभ बच्चन ने भी दीप्ति नवल की जमकर तारीफ की. इसके बाद 2011 में दीप्ति नवल ने ‘मैड तिब्तेन स्टोरी’ लिखी. दीप्ति अभी भी सशक्त किरदारों के साथ फिल्मी परदे पर सक्रिय हैं.

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