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जन्मतिथि विशेष वीपी सिंह: वाकई राजा होकर भी फकीर थे

हर व्यक्ति की तरह वीपी सिंह को काले और सफेद में देखना बेमानी है

Ajay Singh Ajay Singh Updated On: Jun 25, 2017 04:16 PM IST

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जन्मतिथि विशेष वीपी सिंह: वाकई राजा होकर भी फकीर थे

राजा नहीं फकीर है भारत की तकदीर है. देश के हिंदी बोलने वाले इलाकों में ये नारा प्रचलित हो गया था. विश्वनाथ प्रताप सिंह नए राजनीतिक मसीहा बन गए. 1987 के लगभग भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम ने उनका आभामंडल ही बदल दिया था. 1984 में अभूतपूर्व मतों से विजयी राजीव गांधी मजाक के पात्र हो गए थे.

गोरखपुर, बनारस और बिहार के भोजपुरी बेल्ट में गायक बालेश्वर का गाना प्रचलित हो गया था. इस गाने के बोल थे, ‘साला झूठ बोलेला. काली दिल्ली का छोरा साला झूठ बोलेला.’ काली दिल्ली का छोरा कोई और नहीं राजीव गांधी थे.

यह वो समय था जिसमें वीपी सिंह की आंधी थी. वीपी सिंह के पास इलाहाबाद के नजदीक मांडा स्टेट की रियासत थी. प्यार से उन्हें ‘राजा साहब’ कहा जाता था. उन्हें इसका एतराज नहीं था. शायद इसकी वजह यह थी कि जमींदारी के कोई अवगुण उनमें नहीं थे. वो स्वभाव से शालीन और अपने मूल्यों पर जीने वाले व्यक्ति थे.

1989 में वीपी सिंह ने राजीव गांधी को शिकस्त दी थी

1987-90 तक की राजनीति में वो धूमकेतु की तरह छाए रहे. दिलचस्प यह है कि न ही उनके पास कोई संगठन था और न किसी विचारधारा का आलम्बन. थी तो सिर्फ एक छवि जो साफ-सुथरे ईमानदार राजनेता की थी. इसी के भरोसे उन्होंने राजीव गांधी की शक्तिशाली कांग्रेस को चुनौती दी. वामपंथ और दक्षिणपंथ यानी बीजेपी उनके साथ हो लिए. 1989 के चुनाव में राजीव गांधी को शिकस्त दी.

नि:संदेह यह मामूली घटना नहीं थी. प्रधानमंत्री बनने के बाद वीपी सिंह अपनी राजनीति में फंस के रह गए. भितरघात के अलावा बीजेपी का फैलाव उनके लिए मुसीबत का सबब बना. संगठनात्मक ढांचा न होने के कारण उनकी राजनीति भी एक अजीब भटकाव के दौर में आ गई. चौधरी देवीलाल की चुनौती से निपटने के लिए उन्होंने मंडल आयोग का सहारा लिया. आरक्षण एक जरूरत है इसका उन्हें एहसास था. पर समाज इसके लिए तैयार नहीं था. न ही कोई ऐसी राजनीतिक पहल हुई कि समाज को इसके लिए तैयार किया जाए.

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वीपी सिंह देश की भावनात्मक राजनीति के शिकार हुए. एक वक्त का मसीहा अब समाज के कुछ वर्ग को शैतानी शक्ल में दिखने लगा. वीपी सिंह को समझते देर न लगी कि बाजी उनके हाथ से निकल गई है. उनकी स्वीकार्यता का दायरा संकीर्ण हो गया है. यही वजह है कि प्रधानमंत्री पद छोड़ने के बाद सत्ता की राजनीति से वो दूर रहे. लेकिन सामाजिक न्याय की प्रतिबद्धता में उन्होंने कभी कमी नहीं दिखाई.

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वीपी सिंह को पता था कि पिछड़ों की राजनीति के वो नेता नहीं हो सकते हैं. बातचीत के क्रम में एक बार उन्होंने इस बात को स्वीकारा. पर फिर उन्होंने कहा, ‘केंचुए को मरना पड़ता है तितली के जनम के लिए.’ क्या हुआ अगर मैं सामाजिक न्याय का नेता नहीं हूं तो? उनका जवाब और सवाल दोनों सार्थतकतापूर्ण थे. आज तक मेरे कानों में गूंजते हैं.

पर क्या वीपी सिंह सामाजिक न्याय से निकले नेताओं से खुश थे? मसलन लालू यादव, मुलायम सिंह यादव. मायावती. जीवन के अंतिम दौर में उन्होंने एक बार तकलीफ प्रकट की कि यह सकारात्मक आंदोलन कैसे लोगों के पास चला गया है? उन्होंने कहा ‘इसीलिए तो आज यह हालत है.’ यह दौर था जब केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी.

वीपी सिंह के भीतर गरीबों के लिए कुछ करने का जज्बा था

एक राजनीतिक व्यक्ति के रूप में वीपी सिंह का विश्लेषण कई तरह से हो सकता है. उनकी कई व्यक्तिगत व राजनीतिक खामियां गिनाई जा सकती हैं. मसलन उन पर संजय गांधी और इंदिरा गांधी की चाटुकारिता का आरोप लगता है.

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्रित्व काल में उन्होंने फर्जी एनकाउंटर को प्रोत्साहित किया. हर व्यक्ति की तरह वीपी सिंह को काले और सफेद में देखना बेमानी है. इसमें जरा भी संदेह नहीं कि राजनीति व सार्वजनिक जीवन में उन्होंने ईमानदारी, शुचिता व मूल्यों की पुरजोर वकालत की. जीवन के अंतिम क्षण तक वो अपनी शर्तों पर जीते रहे. देश के शीर्षस्थ पद पर रहने और राजसी पृष्ठभूमि के बावजूद उनमें समाज, विशेषकर गरीबों के लिए कुछ करने का जज्बा था. राजनीतिक संगठन न होने की वजह से उनका नाम अंधेरे में भले खो गया हो पर यह भी सच है कि अपने समकालीन अग्रणी नेताओं में वो चमत्कारी व्यक्तित्व थे.

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