live
गुलज़ार साहब बेमिसाल हैं. मगर हिंदी सिनेमा को उनकी सबसे बड़ी देन क्या कही जाएगी? ‘तेरे बिना ज़िंदगी से कोई’ जैसे लाजवाब गाने, ’कोशिश’ और ‘अंगूर’ जैसी क्लासिक मानी जाने वाली फिल्में या मिर्ज़ा गालिब जैसे सीरियल.
जवाब इन सब से अलहदा है. गुलज़ार के इन सारे मास्टरपीस के जरिए संजीव कुमार जैसा जीनियस अदाकार हिंदी सिनेमा को दिया. ये गुलज़ार ही थे जो साठ के दशक में छोटी-छोटी भूमिकाओं में खप रहे हरिलाल जरीवाला को संजीव कुमार बनाकर सेल्युलाइड पर लेकर आए.
वैसे आप सोच रहे होंगे कि ऊपर लिखे नामों में ‘मिर्ज़ा ग़ालिब’ का नाम गलती से लिख गया होगा. नहीं, गुलज़ार ने जब मिर्ज़ा ग़ालिब पर काम करना शुरू किया था तो उनके दिमाग में इस पर फिल्म बनाने का आइडिया था. और मिर्ज़ा असदउल्ला खां के किरदार के लिए वो संजीव कुमार को कास्ट करना चाहते थे.

इस कास्टिंग के बारे में पढ़कर नसीरुद्दीन शाह ने एक रजिस्टर्ड खत गुलज़ार को लिखा था. तब नसीर और गुलज़ार एक दूसरे को नहीं जानते थे. नसीर ने खत में लिखा था कि वो कैसे एक गुजराती को मिर्ज़ा ग़ालिब के रोल में लेने का सोच सकते हैं. ग़ालिब का रोल अगर कोई कर सकता है तो खुद वो यानी नसीरुद्दीन शाह ही कर सकते हैं.
जब तक मिर्ज़ा ग़ालिब को साकार करने का समय आया तो हरि भाई यानी संजीव कुमार दुनिया से जा चुके थे. गुलज़ार को नसीर का वो खत तो नहीं मिला था. मगर नसीरुद्दीन शाह ने भी साबित कर दिया कि ग़ालिब को पर्दे पर साकार करने में उनका कोई सानी नहीं.
सबसे बड़ी रेंज का एक्टर
देखिए, लिखना संजीव कुमार के बारे में था मगर बात गुलज़ार और नसीरुद्दीन शाह की होने लगी. दरअसल संजीव कुमार की अभिनय की रेंज ही ऐसी है कि उनके बारे में तमाम बातें की जा सकती हैं. सत्यजीत रे के सामने जब अपनी एकमात्र हिंदी फिल्म ‘शतरंज के खिलाड़ी’ के लिए नायक चुनने की बात आई तो उन्होंने संजीव कुमार को ही मिर्ज़ा सज्जाद अली के किरदार में चुना.
यही संजीव ‘कोशिश’ में गूंगे के रोल में जब वो पैरों के पास हरी मिर्च रखकर अपना नाम हरिचरन बताते हैं तो कितने मासूम लगते हैं. वहीं शोले में तेजतर्रार ठाकुर बलदेव सिंह के रोल में जब वो कहते हैं, 'गब्बर! ये हाथ नहीं फांसी का फंदा है'. तो एक पल के लिए गब्बर सिंह का ऑरा भी धुंधला पड़ जाता है.
संजीव कुमार की एक्टिंग की तारीफ करते-करते लोग अक्सर कह देते हैं कि वो कम उम्र में उम्र दराज रोल करने वाले एक्टर थे. ऐसा नहीं है. जया बच्चन के पति (कोशिश), प्रेमी (अनामिका, नया दिन नई रात) ससुर (शोले) और मुंह बोले भाई (सिलसिला) के रोल करने वाले संजीव कुमार ने तमाम लीक से हट कर रोल किए.

अंगूर में उनकी कॉमिक टाइमिंग आज भी एक्टिंग का एक रिफरेंस पॉइंट है. ‘नया दिन नई रात’ में उनके निभाए नौ रस वाले नौ किरदार भी अद्भुत हैं, खासकर श्रृंगार रस प्रधान मास्टर जी बने संजीव जब कहते हैं, “चल! लुच्चा कहीं का” तो लगता ही नहीं कि यही आदमी शोले में ठाकुर बना था.
फिल्म काबिल में जिस तरह के अंधे मगर सक्षम आदमी का रोल ऋतिक ने किया था वो संजीव कुमार ‘कत्ल’ में बहुत पहले ही निभा चुके थे. इसी तरह से ‘ओ माय गॉड’ के परेश रावल के किरदार से मिलती जुलती भूमिका ‘ये है ज़िंदगी थी’ में थी.
असफल प्रेमकहानियों की लंबी कतार
अनामिका फिल्म के टाइटल सॉन्ग ‘अनामिका तू भी तरसे’ में एक अंतरा है. ‘आग से नाता, नारी से रिश्ता काहे मन समझ न पाया’. संजीव कुमार के लिए ये मिसरे गाने से निकल कर ज़िंदगी में उतर आए थे. उनके साथ जुड़ने वाली प्रेम कहानियों की फेहरिस्त लंबी है. मगर इनमें से कोई भी मुकम्मल नहीं हुई.
उनकी दोस्त रहीं अंजू महेंद्रू ने एक बार बीबीसी को बताया था कि संजीव बहुत शक्की थे. उन्हें अक्सर लगता था कि लड़कियां उनके पैसे के कारण उनसे शादी करना चाहती थीं. सुलक्षणा पंडित के साथ उनका रिश्ता टूटने के पीछे सबसे बड़ा कारण यही था.
इसके अलावा कहा जाता है कि उन्हें एक बार नूतन ने सेट पर थप्पड़ मार दिया था. मगर संजीव कुमार का नाम सबसे ज़ोर शोर से हेमामालिनी के साथ जुड़ा. ‘शोले’ से ठीक पहले संजीव ने हेमा को प्रपोज़ किया. हेमा ने मना कर दिया. उस समय तक वीरू का रोल संजीव के पास था और ठाकुर का धर्मेंद्र के पास. रमेश सिप्पी वीरू के रोल में धर्मेंद्र को लेना चाहते थे. उन्होंने धर्मेंद्र से कहा कि वीरू का रोल करने वाला हेमा के करीब रहेगा. रोल बदल दिए गए.

बताया जाता है कि धर्मेंद्र लाइट वालों को पैसा देकर सुनिश्चित करते थे कि आम पर निशाना लगाने जैसे रोमांटिक सीन में कई रीटेक हों. दूसरी तरफ संजीव देर से सेट पर पहुंचते. एक ही टेक में सीन ओके करते, जल्दी से सारा काम निपटाते और शाम होते ही शराब में डूब जाते.
उन्होंने फिल्म ‘मीरा’ में हेमामालिनी के पति का भोजराज का रोल करने से मना कर दिया. 1978 को एक मैग्ज़ीन को दिए गए इंटरव्यू में उन्होंने इसकी वजह हिरोइन के साथ हुई कुछ समस्याएं ही बताया था.
खानदानी तौर पर दिल की बीमारी से जूझ रहे संजीव कुमार की सेहत को इन सब बातों से बहुत फर्क पड़ा. उनके परिवार में शायद ही कोई मर्द 50 की उम्र पार कर पाया हो. संजीव की बायपास सर्जरी हुई. 1985 में उनके छोटे भाई की दिल के दौरे से मौत हो गई. इस बात से उन्हें बहुत सदमा पहुंचा, छः महीने बाद ही संजीव भी चल बसे.
मरने के बाद उनकी दस फिल्में रिलीज़ हुईं. इनमें से एक ‘लव ऐंड गॉड’ भी थी. लव ऐंड गॉड के पहले हीरो गुरुदत्त थे. 9 जुलाई को ही पैदा हुए गुरुदत्त ने फिल्म पूरी होने से पहले खुदकुशी कर ली. के आसिफ ने फिर इस फिल्म में संजीव कुमार को कास्ट किया. वो भी चल बसे इसके कुछ समय बाद खुद के आसिफ भी इस दुनिया से रुखसत हो गए. बाद में उनकी पत्नी ने इस फिल्म को जैसे-तैसे रिलीज़ करवाया.




हंदवाड़ा में भी आतंकियों के साथ एक एनकाउंटर चल रहा है. बताया जा रहा है कि यहां के यारू इलाके में जवानों ने दो आतंकियों को घेर रखा है
कांग्रेस में शामिल हो कर अपने राजनीतिक सफर की शुरूआत करने जा रहीं फिल्म अभिनेत्री उर्मिला मातोंडकर का कहना है कि वह ग्लैमर के कारण नहीं बल्कि विचारधारा के कारण कांग्रेस में आई हैं
पीएम के संबोधन पर राहुल गांधी ने उनपर कुछ इसतरह तंज कसा.
मलाइका अरोड़ा दूसरी बार शादी करने जा रही हैं
संयुक्त निदेशक स्तर के एक अधिकारी को जरूरी दस्तावेजों के साथ बुधवार लंदन रवाना होने का काम सौंपा गया है.