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फिराक को याद करना यानी एक दूसरी ही दुनिया में चले जाना

फिराक वे कवि ,लेखक,आलोचक और शिक्षक थे. जिन्होंने अपने ढंग से जीवन जीया. कुछ सामान्य तो कुछ असामान्य.

Updated On: Aug 28, 2017 10:41 AM IST

Surendra Kishore Surendra Kishore
वरिष्ठ पत्रकार

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फिराक को याद करना यानी एक दूसरी ही दुनिया में चले जाना

रघुपति सहाय फिराक की सिर्फ यही खूबी नहीं थी कि वे एक बहुत बड़े शायर थे,बल्कि वे आई.सी.एस.अफसर भी रह चुके थे. इतना ही नहीं, वह कांग्रेस मुख्यालय में कभी अंडर सेक्रेट्री थे और आजादी की लड़ाई में शामिल होने के कारण उन्हें डेढ़ साल की सजा भी हुई थी.

जोश मलीहाबादी ने लिखा था कि ‘मीर और गालिब के बाद फिराक गोरखपुरी भारत के सबसे बड़े उर्दू शायर थे.’ उर्दू काव्य कृति ‘गुल ए नग्मा’ के लिए फिराक साहब को 1970 में ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला था. उन्हें अन्य कई पुरस्कार और सम्मान भी मिले थे.

'राजनीति करने वालों को शादी नहीं करनी चाहिए'

फिराक गोरख पुरी का जन्म 28 अगस्त 1896 को गोरखपुर में हुआ था. उनका निधन 3 मार्च 1982 को हुआ. उनकी शिक्षा अरबी, फारसी और अंग्रेजी में हुई. उनका विवाह 29 जून 1914 को जमींदार बिंदेश्वरी प्रसाद की पुत्री किशोरी देवी से हुआ. पर,उनका दाम्पत्य जीवन सुखमय नहीं था.

उनका पारिवारिक जीवन टाल्सटाॅय के उथल-पुथल वाले पारिवारिक जीवन की याद दिलाती है.हालांकि उतनी उथल पुथल यहां नहीं थी. समाजवादी नेता डॉ.राम मनोहर लोहिया ने कहा था कि राजनीति करने वालों को शादी नहीं करनी चाहिए. खुद लोहिया कुंवारे रहे. पर ऐसा लगता है कि साहित्य के क्षेत्र में भी बड़ी संभावनाओं वाली हस्तियों को भी शादी नहीं करनी चाहिए.

फिराक ने लिखा है कि ‘पिता के मरने के बाद घर की हालत बहुत खराब हो गई थी. गरीबी आ गई और घर के लोगों से मुहब्बत के लिए तरस गया था. फिर सोचा कि बीवी आएगी तो सारी कमी पूरी कर देगी. लेकिन वह आई बेहद गंवार. मैंने सोचा कि मुझे ऐसी जिंदगी अपनानी चाहिए जिसमें मेरी बीवी खप जाए. बस उसी झक में मैंने आई.सी.एस.छोड़ दी.’

हालांकि पत्रकार पी.डी.टंडन के अनुसार बाद में भी फिराक अपनी पत्नी पर नाराज ही रहते थे. टंडन जी ने लिखा है कि ‘फिराक अजीबो-गरीब हस्ती थे. उनका तौर तरीका एक मानी में निराला था. वे शायरी की दुनिया में करीब-करीब हर समय रहते थे. फिर सैकड़ों बातों में उनकी दिलचस्पी थी. कई मामलात में वे बड़े जोरों से बहस करते और ज्यादातार वे अपने नए-नए तर्कों से दूसरे लोगों को चित्त कर देते थे. बड़े-बड़े वाकयातों पर उनकी प्रतिक्रिया अनोखी होती थी. लोगों को उनकी बातें सुनने में बड़ा मजा आता था चाहे वे उनसे सहमत हों या नहीं.’

अब सवाल है कि जो रात-रात भर जाग कर लिखेगा और बीवी पर समुचित ध्यान नहीं देगा तो क्या होगा? पारिवारिक जीवन कैसा होगा?

फिराक ने राजनीति भी छोड़ दी थी

राजनीति के बारे में भी फिराक की कुछ वैसी ही राय बनी थी. फिराक साहब 1920 में आई.सी.एस.बने थे. नौकरी से इस्तीफा देकर स्वराज आंदोलन में कूदे. वह जवाहर लाल नेहरू के अंडर सेक्रेट्री थे. उन दिनों कांग्रेस का मुख्यालय इलाहाबाद में ही था. पर फिराक ने राजनीति भी छोड़ दी. किसी ने पूछा तो उन्होंने कहा कि लंदफंद मेरे वश की बात नहीं है. यानी तब भी राजनीति में लंदफंद होता था.

फिराक ने 1930 से 1959 तक इलाहाबाद विश्व विद्यालय में अंग्रेजी पढ़ाई. एक बार फिराक से किसी ने पूछा कि विश्व विद्यालय से रिटायर होने के बाद अब आप बोर होने लगे हैं?

उन्होंने कहा कि ‘अजी, फुर्सत नहीं मिलती. सुबह हुई तो समझो एक प्याला चाय, फिर अखबार की बेचैनी. सुबह का दृश्य बहुत ही अच्छा लगता है. उसे चुपचाप देखना. सही मायने में वह उषापान करना. फिर कुछ बोल कर लिखाता हूं. कुछ पढ़ता हूं. दिन में खा पीकर थोड़ी देर आराम. शाम में मुलाकाती आते हैं. उसी वक्त पीता भी हूं. कोई न आए तो अकेलेपन में पागल हो जाता हूं.

फिर फिराक एक शेर कहते हैं,‘शामें किसी को ढूंढ़ती हैं आज भी फिराक, गो जिंदगी में यूं मुझे कोई कमी नहीं.’

Firaq-Gorakhpuri

फिराक साहब रामायण के प्रशंसक थे

फिराक वे कवि ,लेखक,आलोचक और शिक्षक थे. जिन्होंने अपने ढंग से जीवन जीया. कुछ सामान्य तो कुछ असामान्य. उनके जीवन की कई बातें लिखने लायक हैं. लिखीं भी गई हैं. पर कुछ बातें नहीं लिखने लायक. पर अपने जीवन के अंतिम दिनों में वे कुछ भी छिपाते नहीं थे.

वे कहते थे कि ‘अच्छा हुआ कि मैं इलाहाबाद में ही रहा. यदि मैं दिल्ली या लखनऊ में रहा होता तो मेरी शायरी वहां तक नहीं पहुंचती जहां पहुंची है. क्योंकि दोनों जगहों पर परंपराओं की इतनी जबर्दस्त बोझ है कि मेरी शायरी मर जाती.’

अपने बचपन के बारे में उन्होंने एक बार कहा था कि मेरी शायरी दूसरों से अलग इसलिए रही क्योंकि मैंने बचपन में कभी शायरी-वायरी की ही नहीं. एक तो मेरे घर में सब भोजपुरी बोलते थे, दूसरे सस्ती छेड़छाड़ को कविता में बांधना मुझे सख्त नापसंद था.

उस वक्त की उर्दू की शायरी में यही होता था जबकि मैं गहरी और ऊंची बात करना चाहता था. पर जबान साथ नहीं देती थी. बाप शायर थे,लेकिन अपनी शायरी सुनाते नहीं थे.मां बसंतपुर की ठेठ भोजपुरिया थी तो शायरी आती कहां से? लेकिन उर्दू छंद मुझे बचपन से ही बिना सिखाए आ गए थे.

फिराक साहब रामायण के प्रशंसक थे. कहते थे कि रामायण के शब्द अमृत में डूबे हुए स्वरों के अंदाज में उठते हैं. उन्होंने कहा था कि मुझे पढ़ना कम, मनन करना ज्यादा पसंद रहा है.

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