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जन्मदिन विशेष: दिलीप कुमार को एक्टर क्यों नहीं मानते थे ऋषि दा

पेशावर के एक मामूली फल-फरोश के घर 11 दिसंबर, 1922 को एक लड़के ‘युसूफ’ ने जब जन्म लिया होगा तो कौन जनता होगा कि यही युसूफ एक दिन हिंदुस्तान की फिल्मी-दुनिया का सबसे अज़ीम और काबिले-फख्र हीरो, दिलीप कुमार बनेगा

Updated On: Dec 11, 2017 11:22 AM IST

Nazim Naqvi

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जन्मदिन विशेष: दिलीप कुमार को एक्टर क्यों नहीं मानते थे ऋषि दा

'लोग कहते हैं कि दिलीप कुमार एक बेहतरीन एक्टर है, मुझे इस बात से कड़ा विरोध है. जब वो कैमरे के सामने नहीं होता और लोगों से हंसता बोलता है तब भी तो वो वही होता है, उतने ही शिष्टाचार के साथ बोलता है, फिर भी लोग कहते हैं कि वो एक्टर है, मुझे इस बात पर घोर आपत्ति है.' ये शब्द हैं ऋषिकेश मुखर्जी के.

'दिलीप साहब की महानता ये है कि जो सीन वो करते हैं वो इतने सटीक होते हैं कि हम या किसी भी अभिनय करने वाले के लिए ये नामुमकिन है कि उस सीन को किसी दूसरी तरह से कर ले और वही बात पैदा हो जाए जो दिलीप साहब की एक्टिंग से होती है', ये शब्द उनके हैं जिन्हें दुनिया सदी का महानायक कहती है. जी हां ये अमिताभ बच्चन के शब्द हैं.

अमिताभ बच्चन की नजर में दिलीप कुमार की सबसे अच्छी फिल्म ‘गंगा-जमुना’ है और वो कहते हैं कि उन्हें आज भी हैरत होती है दिलीप साहब जो कि पेशावर के पठान हैं, इतनी अच्छी तरह से अवधी कैसे बोल सकते हैं. लगता है कि इलाहाबाद या अवध के इलाके में उन्होंने सारी ज़िंंदगी गुजारी है.

ऋषि दा तो कहते हैं, 'गंगा-जमुना में उसने एक डाकू का किरदार निभाया है, ये लोगों का आम ख़याल है, लेकिन मैं ऐसा नहीं समझता. मेरा विचार है कि वो दिलीप कुमार नहीं, असली डाकू था. अगर उसकी शक्ल और सूरत दिलीप कुमार से मिलती-जुलती है तो क्या हुआ, अक्सर एक दूसरे से मिलते-जुलते आदमी इस दुनिया में मिल ही जाते हैं.'

मशहूर शायर और कहानीकार जावेद अख्तर का कहना है, 'मैं भी उन करोड़ों लोगों में शामिल हूं जो दिलीप कुमार के फैन थे, फैन हैं और फैन रहेंगे. दिलीप साहब उन शख्सियतों में से हैं कि उन्हें जब कोई अवॉर्ड मिलता है तो उस अवॉर्ड की इज्जत बढ़ जाती है.'

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यूं बने युसूफ खान से दिलीप कुमार 

और अब सवाल पैदा होता है कि दिलीप कुमार खुद दिलीप कुमार के बारे में क्या सोचते या समझते हैं? युसूफ खान क्यों दिलीप कुमार हुए, इस किस्से को तो उनके प्रशंसक जानते हैं कि दरअसल ये देविका रानी के दिमाग की उपज थी. लेकिन 1970 में बर्मिंघम में महेंद्र कौल को दिए एक इंटरव्यू में जब कौल ने उनसे पूछा तो उन्होंने जिस मासूमियत से इसका जवाब दिया वो एक इंसान की पूरी शख्सियत को सामने ले आता है.

कहने लगे, 'हकीकत बताऊं? (नेपथ्य से कौल की आवाज़ आई, जी...) पिटाई के डर से मैंने ये नाम रखा... मेरे वालिद फिल्मों के सख्त खिलाफ थे... पठान थे, बड़े गुसवर किस्म के इंसान थे... तो उनके खौफ की वजह से मैं ये नहीं चाहता था कि उन्हें पता चले कि मैं फिल्मों में काम करने लगा हूं... तो मेरे सामने तीन नामों की तजवीज आई... युसूफ खान, दिलीप कुमार और वासुदेव... मैंने कहा बस युसूफ खान मत रखिए बाकी जो दिल करे तय कर लीजिए... बाद में दो-तीन महीनों के बाद जब मैंने इश्तेहार में अपना नाम देखा तो मुझे पता चला कि मेरा नाम दिलीप कुमार हो गया है.'

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ये है दिलीप कुमार कि शख्सियत जो ‘ज्वार-भाटा-1944’ से लेकर ‘किला-‘1989’ तक अपने 45 साल के सफर में सिर्फ 34 फिल्मों के जरिए दुनिया भर में अपने चाहनेवालों के दिलों में बसी हुई है. ऋषि दा ठीक कहते हैं कि दिलीप कुमार एक्टर नहीं है क्योंकि अगर दिलीप कुमार एक्टर होते तो एक साथ बीस-बीस फिल्मों में काम कर रहे होते. उन्होंने तो 45 साल में बस 34 फिल्में ही कीं.

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'गुदड़ी के लाल' दिलीप कुमार

‘गुदड़ी के लाल’ की ढेरों मिसालें दुनिया में मिलती हैं. अमेरिका के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन या रूस के राष्ट्रपति ख्रुश्चेव जो एक जो एक मामूली किसान के घर पैदा हुए, दूर क्यों जाते हैं हमारे ही यहां नरेंद्र मोदी हुए हैं, जिनका बचपन चाय बेचते हुए बीता.

ऐसे सभी नामवालों के परिवार में क्या कभी किसी ने सोचा होगा कि एक दिन उनके घर का चिराग इतना बड़ा आदमी बनेगा. इन लोगों की तरह ही, पेशावर के एक मामूली फल-फरोश के घर 11 दिसंबर, 1922 को एक लड़के ‘युसूफ’ ने जब जन्म लिया होगा तो कौन जानता होगा कि यही युसूफ एक दिन हिंदुस्तान की फिल्मी-दुनिया का सबसे अज़ीम और काबिले-फख्र हीरो, दिलीप कुमार बनेगा.

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युसूफ जब दिलीप कुमार नहीं बने थे तो देवलाली और बंबई (अब मुंबई) में अपनी तालीम पूरी करने के बाद पूना में, एक मामूली तनख्वाह पर एक मिलिट्री कैंटीन में नौकरी करने लगे. लेकिन किस्मत ने इस नौजवान को एक दिन देविका रानी सामने ला खड़ा किया. और फिर कामयाबी की सारी सीढि़यां दिलीप कुमार अपनी लगन, मेहनत और मिलनसारी के सारे चढ़ते चले गए.

कभी किसी ने उनसे, उनको मिलने वाली शोहरत पर, उनकी प्रतिक्रिया जाननी चाही तो उन्होंने कहा, 'मैं समझता हूं गुरुर और घमंड एक इंसानी बीमारी है जिससे दूर रहना चाहिए. शोहरत और नाम से किसी भी आर्टिस्ट या किसी भी इंसान को दूर रहना चाहिए. मैं जिस घर में पैदा हुआ उसमें मेरा इरादा नहीं शामिल था, मैं जैसे-जैसे यहां या कहीं तक भी पहुंचा हूं उसमें भी मेरा इरादा नहीं है... और जिस दिन मुझे जाना है उसका भी मैंने कोई इंतजाम नहीं किया है. ये शोहरत मेरी नहीं इसका मुझे यकीन है.' इसके साथ ही पूछने वाले को उन्होंने एक शेर सुनाया-

तेरा ख़याल है, तेरा जमाल है, तू है मुझे ये ताबिश-ओ-दानिश कहां कि मैं क्या हूं (ताबिश-ज्योति, दानिश- विवेक)

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