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बर्थडे स्पेशल: गुलज़ार क्यों हैं युवाओं के ऑल टाइम फेवरेट

गुलज़ार के जन्मदिन पर हम ऐसे ही चार नर्म रिश्तों को याद कर रहे हैं, जिन्होंने उन्हें तमाम बाहरी प्रभावों से सुरक्षित रखा

Updated On: Aug 18, 2017 11:27 AM IST

Avinash Dwivedi
लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं

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बर्थडे स्पेशल: गुलज़ार क्यों हैं युवाओं के ऑल टाइम फेवरेट

आपने किसी एंटीक आइटम की पैकिंग देखी है? जिस पैकेट में एंटीक पैक होता है, उसे अक्सर कुछ एयरबैग या उसके जैसी दूसरी नाजुक चीजों से भर दिया जाता है. इस तरह विलक्षण वस्तु को सुरक्षित रखने की कोशिश की जाती है.

पर जब एक शायर का नाजुक मन सुरक्षित रखने की बात हो तो मामला कहीं ज्यादा 'हैंडल विद केयर' वाला हो जाता है. बात कर रहा हूं आज जीवन के 83वें बरस में प्रवेश कर रहे, रेशम से भी रेशमी शायरी बुनने वाले, गुलज़ार साहब के मन की. आखिर ऐसा कौन सा सुकोमल पदार्थ उनके चारों ओर के वातावरण में मौजूद रहा है?

गुलज़ार ने विभाजन की त्रासदी झेली है और सात दशकों में कई बार आस-पास बदतर राजनीतिक प्रहसन और घटिया सामाजिक परिस्थितियों के गवाह भी बने हैं. फिर भी वो किसी 25 साल के युवा से बेहतर माशूका से इश्क भी लड़ा सकते है और आज भी उनका दिल बच्चों जैसा मचल-मचल जाता है. आखिर क्या बात उन्हें इस लायक बनाती है?

दिमाग पर ज्यादा जोर मत डालिए, हम बताते हैं. गुलज़ार के आस-पास के माहौल में स्टफ्ड, वो नर्म चीज हैं, गुलज़ार के रिश्ते. गुलज़ार की कविता को अच्छे से परखने वाले समझते हैं कि उनकी अधिकांश कविताओं की धुरी रिश्ते ही होते हैं.

यकीन के कवि

एक कविता जिसका अंत करते हुए गुलज़ार लिखते हैं- 'चांद से गिरके मर गया है वो, लोग कहते हैं, खुदकुशी की है...' तेजी से भागती दुनिया में भी संवेदना का स्तर बहुत ऊंचा उठाए रखती है. लोगों को किसी की नजरों में गिरना, मरने से बदतर लगे, ये भाव आज भी सभी को खूब जंचता है.

साथ ही ये कविताएं हमें यकीन दिलाती हैं कि हमारी संवेदनाएं न केवल सुरक्षित हैं बल्कि और ज्यादा शक्तिशाली हो चुकी हैं. यहां तक कि संवेदनाओं के मामले में पिद्दी माने जाने वाले मिलेनियल्स (युवाओं) को भी गुलज़ार की ये बातें ना सिर्फ भाती हैं बल्कि बहुत से मूल्य सिखाती भी हैं. यूं ही नहीं गुलज़ार मिलेनियल्स के ऑल टाइम फेवरेट हैं.

उनके जन्मदिन पर हम ऐसे ही चार नर्म रिश्तों को याद कर रहे हैं, जिन्होंने गुलज़ार को तमाम बाहरी प्रभावों से सुरक्षित तो रखा ही, निस्संदेह उनमें बहुत कुछ जोड़ा भी. ये गुलज़ार की जिंदगी के वो रिश्ते हैं, जो मिलेनियल कही जाने वाली पीढ़ी से गुलजार का परिचय कराने का अहम जरिया भी बने. ये चार साथी हैं- आरडी बर्मन, मणिरत्नम, विशाल भारद्वाज और ए आर रहमान.

विशाल भारद्वाज

गुलज़ार की एक बात पर गौर कीजिएगा. काम के साथ समझौते का स्पेस वो नहीं रखते. माने आप उन्हें प्लॉट समझा दें और गुलज़ार साहब उस पर गाना रच देंगे, ऐसा नहीं होता.

Vishal Bhardwaj

खुद एक इंटरव्यू में गुलजार कहते हैं कि जिस सिचुएशन और किरदार के लिए मुझे गाना लिखने को कहा गया है, मैं उसे पूरा समझना पसंद करता हूं और इसलिए गाना लिखने से पहले पूरी स्क्रिप्ट पढ़ता हूं. साथ ही उन्हें इस बेहतरीन रचना प्रक्रिया के लिए 'किसी अपने' की बहुत ज्यादा जरूरत होती है.

ये अपना एक दौर में उन्हें संगीत निर्देशक विशाल भारद्वाज के रूप में मिल चुका है. जिसके साथ बैठकर उन्होंने ना केवल गीतों की धुनें तैयार कीं बल्कि गीतों की रचना प्रक्रिया पर भी लंबी बहसें कीं.

एक ऐसा ही वाकया गुलज़ार याद करते हैं. जब विशाल भारद्वाज उनके पास आए और बोले, 'मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है' बेहतरीन गीत था. उस तरह का गीत दोबारा नहीं हो पाया. गुलज़ार को उनकी बात समझ आ गई और गुलज़ार ने इसके बाद एक कविता लिखी.

मैं उस कविता को साझा करते हुए जानता हूं कि आप उसे कॉपी-पेस्ट करने वाले हैं. फिर भी अगर आप कलम उठाकर उसे किसी पन्ने पर दर्ज करें या किसी खास के सामने पढ़ने के लिए याद कर लें तो ज्यादा बेहतर होगा-

मुझको इतने से काम पे रख लो जब भी सीने से झूलता लॉकेट उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से सीधा करता रहूं उसको मुझको इतने से काम पे रख लो...

जब गरारे में पांव फंस जाए या दुपट्टा किवाड़ में अटके इक नजर देख लो तो काफी है मुझको इतने से काम पे रख लो...

जब भी आवेज़ा उलझे बालों में मुस्कुरा के बस इतना सा कह दो आह चुभता है ये अलग कर दो मुझको इतने से काम पे रख लो...

इक नजर देख लो तो काफी है बस मुस्कुराने की शर्त पक्की है मुस्कुराहट मुआवजा है मेरा मुझको इतने से काम पे रख लो...

बाद में विशाल भारद्वाज ने इसी तर्ज का एक गीत गुलज़ार साहब से अपने प्रोडक्शन में बन रही फिल्म 'एक थी डायन' के लिए लिखवाया और डायरेक्टर से कहकर गाने को खुद ही फिल्माया भी. गीत था, 'हम चीज हैं बड़े काम की यारम...'

गुलज़ार ने गीत के लिए विशाल भारद्वाज से कहा था कि आज की जिंदगी में भी ऐसी फिजूलियात कम नहीं जिनसे रोमांस निकलकर आता हो, मैं तुम्हें लिखकर देता हूं ऐसा गीत. गाना सुनिए और देखिए किस तरह से मिलेनियल जनरेशन के मिजाज को बखूबी समझा है, 'अपनी ही नज्मों से तकलीक पाए' शायर गुलज़ार ने-

गुलज़ार को विशाल भारद्वाज बेहद पसंद हैं. तभी तो वो अपनी किताब प्लूटो के समर्पण में लिखते हैं, विशाल, विशाल, विशाल को... इसी ट्यूनिंग का फल था कि दोनों कलाकारों ने मिलकर 'जंगल-जंगल बात चली है पता चला है...', 'नैना ठग लेंगे...', 'नमक इश्क का...' और 'डार्लिंग...' जैसे साधारण फिल्मी गीत-संगीत से बिल्कुल अलहदा गाने रचे गए.

अब दोनों का रिश्ता इतना गहरा है चुका है कि विशाल भारद्वाज को गुलज़ार का ‘मानस-पुत्र’ माना जा सकता है. खून के रिश्तों से गहरे होते हैं वैचारिक और भावनात्मक रिश्ते. रचना संसार में इन्हीं रिश्तों का बहुत महत्व होता है.

ए आर रहमान

गुलज़ार और रहमान का रिश्ता, 'दो सितारों का जमी पर है मिलन' सरीखा है. रहमान के बारे में गुलज़ार कहते हैं, 'वे हिंदी सिनेमा में मील के पत्थर हैं.उस अकेले इंसान ने फिल्मों में म्यूजिक की शक्ल ही बदल कर रख दी है. उन्होंने मुखड़ा-अंतरा-मुखड़ा का ट्रेंड तोड़ दिया. वे दो अलग-अलग गानों से मिलती-जुलती धुन निकाल नया गाना बना सकते हैं, तब भी सुनने वाले को यह ट्यून बिल्कुल नई लगेगी. जरूरी नहीं कि उनके गानों का कोई फिक्स फॉरमेट हो, यह किसी दोहे की तरह भी हो सकता है और फिर भी सबसे प्रभावशाली.'

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गुलज़ार ही रहमान से प्रभावित नहीं है. रहमान भी गुलज़ार की प्रतिभा से अभिभूत रहते हैं. यही वजह है कि फिल्मी संगीत में अक्सर ये जोड़ी साथ काम करते सुनी जा सकती है.

गुलज़ार रहमान की सारी जरूरतें समझते हैं और रहमान को आसानी होती है, जब इतने बड़े कद का इंसान भी मीन-मेख निकालने की जगह अक्सर सहयोग करने को तैयार रहता है ताकि भारतीय फिल्मी संगीत रचने वाले दो अद्वितीय महारथी कालजयी संगीत सिनेप्रेमियों के लिए रच सकें.

इनके रिश्ते के बारे में बाकी सारी बातें बेहतरीन गीत, 'दिल से रे...', 'चल छैंया, छैंया...', जिया जले जां जले...'और 'जय हो...' समझा देते हैं. जितनी बार भी दोनों महान कलाकार साथ आते हैं, लोगों की उम्मीदें आकाश चूमने लगती हैं.

मणिरत्नम

सिनेमा एक ऐसी कला है जिसके रचने में हजारों लोगों की मेहनत शामिल होती है. इसमें हर कलाकार अपना ही डिपार्टमेंट नहीं देखता बल्कि उसके काम से जुड़े दूसरे कलाकारों का सहयोग भी करता है. कहा जाता है, ये सामंजस्य जितना प्रेमपूर्ण होगा, फिल्म भी उतनी ही मक्खन होगी. इस बात को अनुभवी डायरेक्टर्स बखूबी समझते हैं.

ऐसे ही एक डायरेक्टर हैं मणिरत्नम. अक्सर अपनी फिल्मों की पटकथा भी स्वयं ही लिखने वाले मणिरत्नम ने गुलज़ार की रचना संभावनाओं को अपनी फिल्मों में 90 के दशक से तब जगह दी. जब फिल्मी संगीत अपने सबसे खराब दौर से गुजर रहा था.

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इलैय्याराजा के बाद मणि सर को रहमान का साथ फिल्मों के संगीत के लिए मिल चुका था. 'जोड़ का तोड़' उन्हें गुलज़ार के रूप में मिला. फिर जो हुआ वो परीकथा जैसा है. और इस तिकड़ी ने जो रचा वो 90 के दशक के आखिरी से 21वीं शताब्दी के पहले दशक में आए कालजयी फिल्मी गीतों में बड़ा शेयर रखता है.

मजे की बात ये कि गुलज़ार और मणिरत्नम के बीच उम्र में 20 वर्ष का फासला है लेकिन इसके बावजूद गुलज़ार उन्हें 'मणि सर' कहकर बुलाते हैं. फिल्म 'रावण' के म्यूजिक लांच पर गुलज़ार ने कहा था, 'मणि मुझे कुछ अधूरा सा लगता है. मेरे लिए यह अपूर्ण है और यही कारण है कि मैं उन्हें मणि सर कहकर पुकारता हूं. फिल्म जगत में हर कोई उन्हें इसी नाम से पुकारता है. यही कारण है कि मैंने भी उनके लिए यही संबोधन चुना.'

फिल्म 'स्लमडॉग मिलियनेयर' के लिए ऑस्कर जीत चुके गुलज़ार को खुशी इस बात से होती है कि उन्हें 'रोजा', 'बाम्बे', 'दिल से' और 'गुरु' जैसी प्रसिद्ध फिल्में बनाने वाले मणिरत्नम के साथ उनका रिश्ता कायम हुआ. उन्होंने कहा, 'मणि सर' एक जादूगर हैं. उनके साथ काम करना एक सुखद अहसास है. मैंने उनके साथ काम करके हमेशा खुशी हासिल की है. मैं उनके साथ लगातार काम करते रहना चाहता हूं.

आर डी बर्मन

गुलज़ार और आर डी बर्मन की कलात्मक दोस्ती का जिक्र कई बार हुआ है पर गुलज़ार की रचना प्रक्रिया को समझने के लिए एक बहुउद्धृत किस्से को फिर से उद्धृत करना बहुत जरूरी है.

किस्सा यूं है कि एक बार गुलज़ार और आर डी राजकमल स्टूडियो में मिले. वहां 'पंचम' इतने व्यस्त थे कि उन्हें बात तक करने का समय नहीं था. गुलज़ार ने अपनी जेब से कागज का एक टुकड़ा निकाला और कहा, 'यह एक गाने का मुखड़ा है, इसकी धुन बन जाने के बाद मुझे सुना देना.'

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फिल्म परिचय के लिए ये गीत पंचम दा ने कम्पोज किया था. इसकी दिलचस्प कहानी कई पुस्तकों में दर्ज है. इस फिल्म के निर्माण के दौरान गुलज़ार एक होटल में रह रहे थे. आरडी ने गाने की धुन बनाई और रात के एक बजे होटल पहुंच गए. गुलज़ार को जगाया. अपनी कार में बैठाया और जुहू, बान्द्रा की सुनसान सड़कों पर कार दौड़ाते रहे. बीच-बीच में गाड़ी रोक कर डैश बोर्ड का ठेका जमाते और गुलजार को वो गाना सुनाते.

आर डी के काम करने के अनोखे तरीके पर बात करते हुए अक्सर गुलज़ार अभिभूत हो जाते हैं. जानते हैं. गुलज़ार की अद्वितीय रचना 'मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है...' की धुन तैयार करने से आर डी बर्मन ने इनकार कर दिया था.

उनका मानना था कि ये गीत चल ही नहीं सकता पर गुलज़ार के जोर देने पर उन्होंने रचना की धुन तैयार कर दी. /जाहिर है आर डी ने आधे मन से काम नहीं किया होगा क्योंकि गाने के बोल थामिए, दिमाग में वो धुन बिना किसी प्रयास के आप सुन सकते हैं. बाद में गुलज़ार को इस गीत के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला.

तो पाठको, ये चंद रिश्ते ही हैं जो गुलज़ार के 'शबनम से भी शबनमी' भावों पर जमाने की धूप का असर नहीं होने देते. हमने यहां फिल्म 'मेरे अपने' के लिए यादगार गीत लिखने वाले गीतकार के चंद रिश्तों का ही जिक्र किया है. गुलज़ार ऐसे और भी लोगों से घिरे हैं और उनके जन्मदिन पर यही दुआ है कि आजीवन यूं ही घिरे रहें.

बात रही मिलेनियल्स के साथ जुड़ाव की, तो ये बात दिमाग में रखें कि गुलज़ार वो शायर और गीतकार हैं जो पूरे आनंद के साथ बिमल रॉय, सलिल चौधरी, हेमंत कुमार और आरडी बर्मन के बारे में बातें करते हैं पर उनके मुंह से किसी ने ये कहते नहीं सुना कि वो जमाना तो कुछ और ही था ये जमाना उसके सामने कुछ नहीं है.

इस जमाने में भी वो साथ काम करने के लिए विशाल भारद्वाज और ए. आर. रहमान को ढूंढ लेते हैं या यूं कहें कि एक जैसे लोग खुद एक-दूसरे की ओर खिंचे चले आते हैं.

यहां तक कि काम करने के तरीके में भी पहले के गीतकारों की तरह गीत लिखकर बाद में बड़े गीतकारों जैसे उन्हें गीत लिखकर धुनें बनवाने का कोई गुरूर नहीं है.

गुलज़ार स्वयं स्वीकारते हैं, 'मैं बनी-बनाई धुन पर गीत लिखना ज्यादा पसंद करता हूं.' इस बात पर रहमान के काम करने का तरीका भी मुहर लगाता है. साथ ही दोनोंं 'रिश्ते निभाने के साथ ही प्रोफेशनलिज्म भी कैसे बनाए' रखें, ये भी सिखाते हैं, बिल्कुल मिलेनियल्स की तरह.

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