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नंबूदरीपाद ने पहली वामपंथी सरकार बनाकर लहराया था लाल झंडा

नंबूदरीपाद की सरकार देश की पहली गैर-कांग्रेसी सरकार थी और वो पहले गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री

Updated On: Jun 13, 2018 04:10 PM IST

Piyush Raj Piyush Raj
कंसल्टेंट, फ़र्स्टपोस्ट हिंदी

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नंबूदरीपाद ने पहली वामपंथी सरकार बनाकर लहराया था लाल झंडा

आज जब देश में वामपंथी और समाजवादी विचारधारा के सिमटने की बात कही जा रही है और यह कहा जा रहा है कि देश में वामपंथ या समाजवाद जैसी विचारधारा की जरूरत खत्म हो चुकी है वैसे में ईएमएस नंबूदरीपाद का नाम जरूर याद आता है. लाख मतभेदों और आलोचनाओं के बावजूद अगर देश के सुदूर दक्षिण में एक चुनी हुई वामपंथी सरकार आज देखने को मिल रही है तो इसमें इस व्यक्ति का सबसे महत्वपूर्ण योगदान है. देश के सबसे बड़े कम्युनिस्ट नेताओं में शुमार एलमकुलम मनक्कल शंकरन यानी ईएमएस नंबूदरीपाद का जन्म 13 जून 1909 को केरल के वर्तमान मलाप्पुरम जिले में हुआ था. उनका जन्म उच्च जाति के नंबूदरी ब्राह्मण परिवार में हुआ था.

भारत के मार्क्सवादियों पर यह आरोप लगता है कि वे भारतीय स्थिति में भी वर्ग पर जोर देते हैं और भारतीय समाज की सबसे बड़ी सच्चाई जाति व्यवस्था को दरकिनार कर देते हैं. ऐसे लोगों को ईएमएस नंबूदरीपाद के बारे में जानकर यह हैरानी होगी कि तथाकथित उच्च जाति उसमें से भी ब्राह्मण होने के बावजूद उन्होंने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत जाति-प्रथा के खिलाफ आंदोलन से की थी.

जाति और भाषा के सवाल से जूझने वाला कम्युनिस्ट

यही नहीं नंबूदरीपाद ने बकायदा केरल में जाति और वर्ग के आपसी संबंधों पर उन्होंने अपनी पहली किताब 'केरला : मलयालीकालुडे मातृभूमि' (1948) में यह दिखाया कि सामाजिक संबंधों पर ऊंची जातियां हावी हैं और उत्पादन संबंधों पर जन्म से उंचे माने जाने वाले जाति के जमींदारों का अधिकार है और प्रशासन की बागडोर नेदुवाझियों यानी स्थानीय प्रभुओं के कब्जे में है. ईएमएस की नजर में केरल की अधिकांश जनता की गरीबी और पिछड़ेपन का कारण यही सामाजिक ताना-बाना था.

ईएमएस ने जोर दे कर कहा था कि जातिगत शोषण ने केरल की नंबूदिरी जैसी शीर्ष ब्राह्मण जाति तक का अमानवीयकरण कर दिया है. उन्होंने ‘नंबूदरी को इंसान बनाओ’ का नारा देते हुए ब्राह्मण समुदाय के लोकतंत्रीकरण की मुहिम चलाई. यह तथ्य इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वे खुद इसी जाति से आते थे.

नंबूदरीपाद ने 1952 में 'द नेशनल क्वेश्चन इन केरला' में जाति आधारित संबंधों की विवेचना तो की ही साथ ही उन्होंने भाषा के आधार पर एकीकृत केरल राज्य की मांग जोर दिया. नंबूदरीपाद ने भाषा को राष्ट्रीय एकता के लिए महत्वपूर्ण माना. बाद में भारत में भाषायी आधार जो राज्यों का पुनर्गठन की मांग का आंदोलन हुआ, उसमें नंबूदरीपाद के विचारों की एक अहम भूमिका थी.

जननेता ईएमएस

नंबूदरीपाद न सिर्फ एक विचारक और विश्लेषक थे बल्कि एक जननेता भी थे. उन्होंने मार्क्सवादी विचारों को जमीन हकीकत देने का काम किया. यही वजह थी कि 1957 में उनके नेतृत्व में बनी सरकार रिपब्लिक ऑफ सान मैरिनो के बाद विश्व में दूसरी ऐसी कम्युनिस्ट सरकार थी जो बहुदलीय चुनावी लोकतंत्र में चुनी गई थी. नंबूदरीपाद की सरकार देश की पहली गैर-कांग्रेसी सरकार थी और वो पहले गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री. इस सरकार द्वारा भूमि और शिक्षा क्षेत्र में किए गए सुधारों सहित अन्य सुधारों से तत्कालीन केंद्र सरकार इतना हिल गई थी कि इसे 1959 में संविधान की धारा 356 का दुरुपयोग करते हुए बर्खास्त कर दिया गया. 1967 में फिर से वे केरल के मुख्यमंत्री बने.

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केरल में अगर आज सबसे अधिक साक्षरता दर है तो इसमें नंबूदरीपाद की पहली सरकार द्वारा किए गए शिक्षा सुधारों की अहम भूमिका है. केरल में जमींदारी प्रथा के उन्मूलन के लिए इस सरकार ने कानून बनाया.

आजादी से पहले नंबूदरीपाद किसान आंदोलन और समाजवादी आंदोलन से जुड़े हुए थे. जिस समय नंबूदरीपाद बी. ए. में थे, तब वे 1932 में 'सविनय अवज्ञा आन्दोलन' से जुड़ गए. उन्हें गिरफ्तार कर तीन वर्ष की सजा सुनाई गई, किंतु उन्हें 1933 में रिहा कर दिया गया. सन् 1937 में ईएमएस नंबूदरीपाद कांग्रेस के टिकट पर मद्रास विधान परिषद में चुने गए. 1936 में बने अखिल भारतीय किसान सभा के वे संस्थापक सदस्यों में शामिल थे. वे 1934 में कांग्रेस के भीतर बने कांग्रेस समाजवादी पार्टी के भी सदस्य थे. यहीं से उनका झुकाव मार्क्सवादी विचारधारा से हुआ. नंबूदरीपाद न सिर्फ राजनीतिक आंदोलनों से जुड़े थे बल्कि साहित्य और कला के आंदोलन से भी जुड़े हुए थे. राजनीति और कला उनके लिए अलग-अलग विषय नहीं थे.

नंबूदरीपाद 1962 में एकीकृत कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव बने और बाद में सन् 1964 में सीपीआई-सीपीएम के विभाजन के बाद वे वर्ष 1977 में वे सीपीएम के महासचिव बने और 1992 तक इस पद पर बने रहे. वे एक समर्पित कम्युनिस्ट कार्यकर्ता के तौर पर आखिरी दिनों तक सक्रिय रहे और 1998 के लोकसभा चुनावों में सघन प्रचार किया. 19 मार्च, 1998 को उनका निधन हो गया.

(तस्वीर सीपीएम की वेबसाइट से साभार)

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