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जन्मदिन विशेष: ऐसा गायक, जिसने तमाम विरोधों के बाद भी गर्व से गाया वंदे मातरम

उन्होंने कई जगह कहा है कि इस्लाम में उन्हें शांति मिलती है. वाकई, उनका इस्लाम शांति का ही प्रतीक है. तभी तमाम कट्टरवादियों की नाराजगी के बीच उन्होंने वंदेमातरम् गाया और एल्बम लेकर आए

Updated On: Jan 05, 2019 10:33 PM IST

Shailesh Chaturvedi Shailesh Chaturvedi

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जन्मदिन विशेष: ऐसा गायक, जिसने तमाम विरोधों के बाद भी गर्व से गाया वंदे मातरम

6 जनवरी, 1967... 15 अगस्त, 1992... वो दिन, जब दिलीप शेखर और उनकी मां कस्तूरी एक ज्योतिषि के पास गए थे. किसे दिलीप के जन्म की तारीख माना जाए? चलिए, पहले ज्योतिषि का ही जिक्र किया जाए. दिलीप शेखर के पिता का इंतकाल लंबी बीमारी के बाद हो गया था. परिवार बहुत परेशान था. तंगी थी. एक मुस्लिम पीर के पास परिवार जाता था.

दिलीप की बहन एक बार बहुत बीमार हुई. परिवार फिर पीर के पास गया. पीर कादरी ने जैसे कोई करिश्मा किया. बहन ठीक हो गई. शायद यही वो दिन था, जब मां कस्तूरी ने तय किया कि वे इस्लाम कुबूल कर लेंगी. परिवार ने इस्लाम कुबूल कर लिया. ज़ाहिर तौर पर अब नाम बदला जाना था. परिवार एक ज्योतिषि के पास गया. 80 के दशक की बात है. बल्कि उसके भी दूसरे हाफ की.

दिलीप शेखर बन गए अल्लाह रक्खा रहमान

ज्योतिषि हिंदू था. मां की दिलचस्पी इसमें भी थी कि बहन की शादी के लिए पूछा जाए. लेकिन ज्योतिषि ने जानना चाहा कि यह लड़का कौन है, जो बहुत इंटरेस्टिंग है. दिलीप नाम बदलना चाहते थे. मां ने पूछा कि दिलीप का नाम क्या रख दिया जाए. उसने कहा अब्दुल रहीम या अब्दुल रहमान. लेकिन साथ ही यह भी कहा कि अब्दुल रहीम रहमान भी रखा जा सकता है, क्योंकि एआर रहमान नाम शुभ है. नसरीन मुन्नी कबीर की किताब एआर रहमान द स्पिरिट ऑफ म्यूजिक में रहमान कहते हैं कि एक हिंदू ज्योतिषि ने मुझे मुस्लिम नाम दिया.

रहमान नाम दिलीप को भा गया. लेकिन उन्होंने अब्दुल की जगह उसे अल्ला रखा कर लिया. सवाल यही है कि क्या इस दिन को उनकी जन्मतिथि माना जाए? या 6 जनवरी, 1967 को, जब वो शेखर और कस्तूरी के घर पैदा हुए थे. या फिर तीसरी तारीख, जिसने दुनिया को एआर रहमान दिया. वो तारीख थी 15 अगस्त, 1992.

विश्व संगीत की दुनिया में हुआ रहमान का जन्म

हुआ कुछ यूं था कि एक जिंगल के लिए रहमान को अवॉर्ड मिला था. उस फंक्शन में मणिरत्नम भी थे. मणिरत्नम को रहमान से मिलवाया गया. इतनी तारीफ की गई कि मणिरत्नम का दिल आ गया. उन्होंने रहमान का काम देखा और सुना. उसके बाद तय किया कि वो रहमान को साइन करेंगे. साल था 1991. इससे पहले भी संगीतकार नौशाद उन्हें सलाह दे चुके थे कि फिल्मों में संगीत दो. लेकिन रहमान तय नहीं कर पाए थे. आखिर वो मणिरत्नम को ना नहीं कह पाए. 25 हजार रुपए में उन्होंने फिल्म साइन कर ली.

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फिर वो दिन आया. 15 अगस्त, 1992 का दिन. रोजा रिलीज हुई. इसी के साथ ही 25 साल के युवा संगीतकार को पूरी दुनिया जान गई. महज तमिलभाषी ही नहीं, संगीत की पूरी दुनिया को एआर रहमान का पता चला. यानी दुनिया के लिए एक विलक्षण संगीतकार के मिलने जैसा दिन था. उसे भी तो जन्म ही कहेंगे.

कंप्यूटर संगीत को मैलोडी से जोड़ा रहमान ने

1992 से लेकर अब तक यही समझा जा रहा है कि आखिर रहमान में खास क्या है. यकीनन, वो कंप्यूटर युग के संगीतकार हैं. यकीनन उन्होंने अपने संगीत में तकनीक का सहारा लिया है. लेकिन उस मैलोडी को नहीं छोड़ा, जिसके लिए भारतीय संगीत जाना जाता है. यह रहमान की सबसे बड़ी खासियत है. उनकी हर धुन पर मानो ट्रेडमार्क रहमान लिखा होता है. आपको लगेगा कि यह धुन तो सुनी-सुनी है. लेकिन वो हर धुन से अलग होगी.

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एक इंटरव्यू में गुलजार ने कहा था, ‘रहमान ने मुखड़ा-अंतरा-मुखड़ा की परंपरा को ही बदल दिया. परंपरागत धुनों को पूरी तरह अलग किस्म की धुनों में तब्दील कर दिया. वो दो अलग गानों की एक जैसी धुन बना सकते हैं. लेकिन जब आप इसे सुनेंगे, तो बिल्कुल अलग लगेंगी.’ कई संगीतकार इसे मान चुके हैं कि कीबोर्ड पर एक ही की से रहमान वैसी आवाज ले आते हैं, जैसी वे लोग नहीं ला पाते. यह रहमान की खासियत है.

जाहिर है, रहमान हिंदू परिवार में जन्मे थे. पिता भी संगीतकार थे. लेकिन बीमारी ने घर के हालात बिगाड़ दिए. पिता की मौत हुई, तो रहमान या दिलीप नौ साल के थे. वहां से सब बदला. रहमान ने कई इंटरव्यू में इसका जिक्र किया है कि पिता के स्वास्थ्य के लिए कैसे घर में पूजा-पाठ होता था. हर धर्म की मदद ली गई. इस्लाम की भी, लेकिन तब तक काफी देर हो गई थी. उन्होंने कई जगह कहा है कि इस्लाम में उन्हें शांति मिलती है. वाकई, उनका इस्लाम शांति का ही प्रतीक है. तभी तमाम कट्टरवादियों की नाराजगी के बीच उन्होंने वंदेमातरम् गाया और एल्बम लेकर आए थे.

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आज रहमान अपने आप में एक इंडस्ट्री की तरह हैं. दुनिया में भारतीय संगीत के सबसे बड़े नाम में शुमार होते हैं. अपनी शर्तों पर संगीत देते हैं. उसके बावजूद अपनी जमीं से जुड़ाव वैसा ही है. कौन भूल सकता है, जो उन्होंने ऑस्कर लेते हुए कहा था. उन्होंने दीवार फिल्म के डायलॉग को याद किया था कि मेरे पास मां है. यह उनकी भारतीयता को दर्शाता है. उन जड़ों को दिखाता है, जिससे वो जुड़े हुए हैं.

रात में ही गानों की रिकॉर्डिंग करना पसंद है रहमान को

रहमान के लिए संगीत का वक्त रात का वक्त है. एक कार्यक्रम में अलका याज्ञनिक ने फिल्म ताल का किस्सा सुनाया था कि कैसे उन्होंने अपना गाना ताल से ताल मिला रिकॉर्ड किया. अलका याज्ञनिक और सुभाष घई चेन्नई गए थे. उन्होंने कहा, ‘हम पूरे दिन होटल में खाली बैठे रहे. सुभाष जी लगातार कहते रहे, वो करेगा फोन... वो थोड़ा देर से काम शुरू करता है. आखिर देर रात फोन आया. स्टूडियो गए, तो वहां बाहर लॉन में बिठाया गया. लगातार इडली, वडा, डोसा खिलाया जाता रहा. आखिर रात दो बजे रिकॉर्डिंग शुरू हुई.’

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यहां पर भी रहमान एक कलाकार का ध्यान रखते हैं. वो हैं लता मंगेशकर. लता जी हमेशा सुबह गाना पसंद करती हैं. फिल्म दिल से में लता मंगेशकर ने पहली बार रहमान के लिए गाया. रहमान ने सुबह गाना रिकॉर्ड किया. सिर्फ इसलिए, क्योंकि लता जी सुबह गाने में कंफर्टेबल थीं. महज 40 मिनट मे जिया जले रिकॉर्ड हो गया. यह किस्सा भी बताता है कि उन्हें अपनी जड़ों से कितना लगाव है. उन्हें पता है कि किसी सीनियर का सम्मान कैसे किया जाता है. तभी उनके साथ हर कोई काम करना चाहता है. हर सीनियर को वो सम्मान मिलता है. हर नए गायक को रहमान में उम्मीद दिखती है... और रहमान को नए गायकों में. इसीलिए रहमान ने जितने नए लोगों को आजमाया है, उतना शायद ही किसी ने किया होगा.

इस सबके बीच रहमान के जन्मदिन पर उन्हें याद करते हुए यह सवाल तो बना ही रहेगा कि उनकी जन्मतिथि किसे माना जाए. उस रोज, जब वो दुनिया में आए. उस रोज जब उन्होंने दिलीप से रहमान का सफर तय किया, जिसे वो अपनी असली पहचान पाना कहते हैं. या उस रोज जब दुनिया ने सुना कि रहमान का संगीत क्या है.

(ये लेख इससे पहले 6 जनवरी 2018 को प्रकाशित हो चुका है, इसे आज दोबारा प्रकाशित किया गया है)

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