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देश के पहले रिएलिटी शो की चैंपियन लड़की की कहानी

‘मेरी आवाज सुनो’ जीतना नहीं बल्कि कुछ और ही था सुनिधि का सपना.

Updated On: Aug 14, 2018 07:30 AM IST

Shivendra Kumar Singh Shivendra Kumar Singh

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देश के पहले रिएलिटी शो की चैंपियन लड़की की कहानी

‘मेरी आवाज सुनो’ जीतना नहीं बल्कि कुछ और ही था सुनिधि का सपना. 9 अक्टूबर 1996 की बात है. हिंदुस्तान के तमाम संगीत प्रेमियों की निगाहें टीवी सेट्स पर थीं. दूरदर्शन का जमाना था. तब न सास बहू का शोर था ना ही न्यूज चैनलों की भरमार. रिएलिटी शो के तौर पर हिंदुस्तान पहली बार किसी के सपनों को पूरा होते देखने को तैयार था. ये सपना था देश की महान गायिका लता मंगेशकर को करीब से देखने का. ये सपना था 11-12 साल की एक छोटी सी बच्ची-सुनिधि चौहान का. जो दूरदर्शन के जबरदस्त लोकप्रिय कार्यक्रम मेरी आवाज सुनो के फाइनल में थी. 11-12 साल की उस बच्ची ने उस कॉम्पटीशन में जीतने के इरादे से हिस्सा लिया भी नहीं था, इरादा तो बस एक था लता जी देखने को मिल जाएं.

सुनिधि याद करके बताती हैं, 'हुआ यूं कि मैंने एक रोज खबर पढ़ी कि टीवी पर एक शो आने वाला है जिसकी जज लता जी होंगी. जो उस शो में जीत जाएगा उसे लता जी के हाथों ट्रॉफी मिलेगी. पापा को ये बात पता थी कि मैं लता जी की कितनी बड़ी ‘फैन’ हूं. हम दोनों को ही लगा कि यही एक मौका है जहां लता जी से मुलाकात हो सकती है. बस मन में इतना ख्याल आया कि इस ‘कॉम्पटीशन’ में हिस्सा लेते हैं. अगर आखिरी दौर तक भी पहुंच गए तो लता जी को देखने का मौका मिल जाएगा. फिर वो दिन भी आया जब मैं मेगा फाइनल में पहुंच गई. मेरे साथ पापा, मम्मी सब लोग गए थे. मुझे उस रोज कुछ समझ नहीं आ रहा था कि अगर मैंने लता जी को देखा तो क्या होगा. मैं उनके सामने खड़ी रह पाऊंगी भी या नहीं? मन में ऐसे ऐसे ख्याल तक आ रहे थे कि कहीं ऐसा तो नहीं होगा कि मैं उन्हें देखकर गिर जाऊं.'

दिलचस्प बात ये भी है कि सुनिधि उस कार्यक्रम में सबसे कम उम्र की प्रतिभागी थीं. कॉम्पटीशन में हिस्सा लेने के लिए कम से कम 16 साल की उम्र तय की गई थी, लेकिन ऑडिशन में सुनिधि ने अपनी गायकी का ऐसा जादू चलाया कि उन्हें शामिल कर लिया गया. मेगा फाइनल में उन्होंने फिल्म ‘रेशमा और शेरा’ का तू चंदा मैं चांदनी गाना गाया था. वो गाना लता जी का ही गाया हुआ था. थोड़ी ही देर में सुनिधि का नाम पुकारा गया. वो कॉम्पटीशन जीत गई थीं. इस जीत के बाद भी सुनिधि को ज्यादा खुशी इस बात की थी कि अब वो करीब से लता जी से मिलेंगी.

उस रोज लता जी ने बहुत प्यार से सुनिधि को ट्रॉफी दी. वो ‘फीलिंग’ ही अलग थी. मेरी आवाज सुनो जीतने के बाद भी सुनिधि के जीवन में सबकुछ सामान्य चल रहा था. दरअसल ये बात कम ही लोग जानते हैं कि दिल्ली की रहने वाली सुनिधि चौहान ने अपने जीवन में संगीत की कोई पारंपरिक ट्रेनिंग नहीं ली थी. छोटी सी थीं तब से दिन भर गुनगुनाती रहती थीं. पिता थिएटर करते थे. उन्होंने 10 साल से भी ज्यादा समय तक दिल्ली में ‘नेशनल लेवल’ पर होने वाली रामलीलाएं की थीं. प्रतिष्ठित श्रीराम सेंटर की ‘रिपेट्री’ में कई सारे नाटक किए थे.

लिहाजा उन्होंने अपनी बेटी को खूब बढ़ावा दिया. सुनिधि छोटी ही थीं तबसे वो उन्हें लेकर दिल्ली में होने वाले जागरण में ले जाया करते थे. जहां सुनिधि गाती थीं. कई बार वहां से लौटते वक्त देर होती थी तो सुनिधि के पिता टू-व्हीलर पर उसे पीछे बिठाकर मफलर से बांध लेते थे जिससे वो गिर ना जाएं. सुनिधि को टू-व्हीलर पर इस तरह की नींद के झोंके अब तक याद हैं. खैर, इसके कुछ साल बाद सुनिधि के पिता ने अपने थिएटर करियर को छोड़ कर बेटी के करियर के लिए मुंबई जाने का फैसला किया.

sunidhi chauhan

ये फैसला इतना आसान नहीं था लेकिन बेटी का टैलेंट ऐसा था कि उसे देखकर आंख मूंदे रहना भी संभव नहीं था. मेरी आवाज सुनो से पहले भी सुनिधि अपनी गायकी से सबका दिल जीत रही थीं. एक बार एक शो में अभिनेत्री तबस्सुम ने सुनिधि को सुना था. उन्होंने ही कहा था कि सुनिधि को मुंबई आना चाहिए. मुंबई में उन्होंने ही सुनिधि को कल्याण जी के पास भेजा. कल्याण जी को भी सुनिधि की गायकी पसंद आई. उन्होंने सुनिधि को मौका दिया. उन्होंने सुनिधि को अपने ‘ट्रूप’ में जगह दी और सुनिधि की गायकी की शुरुआत भी हो गई. ‘मेरी आवाज सुनो’ से पहले 1994 में सुनिधि अमेरिका के एक ‘टूअर’ पर गई थीं. तब उनके पास अपना कोई गाना भी नहीं था. वो अमिताभ बच्चन का ‘टूअर’ था.

दरअसल अमिताभ कल्याण जी आनंद जी भाई के संपर्क में थे और सुनिधि कल्याण जी-आनंद जी के ग्रुप में थीं. वो ‘लिटिल वंडर्स’ नाम से शो किया करते थे. उसी दौरान अमिताभ बच्चन का एक ‘टूअर’ आया तो कल्याण जी ने सुनिधि को उस ‘टूअर’ के लिए भेजा. उस ‘टूअर’ में अमिताभ थे, अनिल कपूर थे, श्रीदेवी थीं. ‘टूअर’ भी पूरे 45 दिन का था. सुनिधि इस बात से बहुत ‘एक्साइटेड’ थीं कि उन्हें अमेरिका जाना है. वो उस कार्यक्रम की ‘ओपनिंग’ किया करती थीं. उस ‘टूअर’ में वो अकेली गायिका थीं बाकि सभी स्टार थे.

अमिताभ की ‘स्टेज’ पर ‘एंट्री’ से पहले सुनिधि को गाना होता था. लिहाजा फिल्मी गायकी में सुनिधि का भविष्य साफ दिखाई दे रहा था. उनके पिता के पास अपनी बेटी को गायकी से जोड़ने की तमाम वजहें थीं.

मेरी आवाज सुनो जीतने के दो साल बाद 1998 का साल था. सुनिधि को संगीतकार संदीप चौटा ने ‘ब्रेक’ दिया. फिर अगले साल फिल्म उनकी आई-मस्त. फिर फिज़ा का महबूब मेरे और मिशन कश्मीर का बूमरो बूमरो इन गानों ने सुनिधि चौहान के शुरुआती करियर को पंख लगा दिए. सुनिधि एक के बाद एक हिट गाने गाती चली गईं. ‘बीड़ी जलइले’ और ‘शीला की जवानी’ जैसे गाने सुनिधि को लोकप्रियता को बुलंदियों तक ले गए. बीच में एक वक्त ऐसा भी आया था जब उन्हें ‘आइटम सॉन्ग’ की गायिका भर माना जाने लगा, सुनिधि ने इस सोच को तोड़ा.

sunidhi Chauhan

सुनिधि खुद ही बताती हैं, 'अनु मलिक जी को लगता था कि मैं रोमांटिक गाने भी गा सकती हूं. लिहाजा उन्होंने मेरे करियर का पहला रोमांटिक गाना मुझे दिया. फिल्म थी-अजनबी. हालांकि उस फिल्म में मैं गाऊंगी, इसे लेकर अनु मलिक जी को प्रोड्यूसर से काफी संघर्ष करना पड़ा. वो मानने को तैयार ही नहीं थे कि रोमांटिक गाना गा सकती हूं. हालांकि बाद में मैंने वो गाना गाया और उसके बाद लोगों को समझ आया कि मैं रोमांटिक गाने भी गा सकती हूं.

इसके बाद से ही मुझे इंडस्ट्री में हर तरह के गाने मिलना शुरू हो गए. मैं खुद को खुशनसीब भी मानती हूं कि मुझे हर तरह के गानों को गाने का मौका मिला. बातचीत खत्म होने से पहले मैंने पूछा- सुनिधि दिल्ली को मिस करती हैं, जवाब मिला- बिल्कुल दिल्ली के छोले भटूरे बहुत मिस करती हूं. वो भी जो मेरे स्कूल के बाहर एक साइकिल पर मिलते थे. अच्छा मौका मिला तो परंपरागत तरीके से सीखना चाहेंगी, सुनिधि का जवाब- बिल्कुल.

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