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अन्नू कपूर: चाय, लॉटरी और चूरन के नोट बेचने से लेकर एक लोकप्रिय कलाकार बनने तक की कहानी

संघर्षों से भरे बचपन से कामयाबी की जमीन तलाशने वाले अन्नू कपूर के जन्मदिन पर विशेष

Shivendra Kumar Singh Shivendra Kumar Singh Updated On: Feb 20, 2018 08:27 AM IST

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अन्नू कपूर: चाय, लॉटरी और चूरन के नोट बेचने से लेकर एक लोकप्रिय कलाकार बनने तक की कहानी

ये कहानी शुरू होती है मध्य प्रदेश में थिएटर कंपनी चलाने वाले मदनलाल और उनकी पत्नी कमल से. मदनलाल के लिए उन दिनों हालात चुनौती भरे थे. वो खुद ना तो कलाकार थे, ना ही लेखक या निर्देशक लेकिन उन्हें थिएटर कंपनी चलाने का शौक था. लिहाजा वो वही काम किया करते थे. ये उस दौर की बात है जब थिएटर चलाना या करना अच्छा भी नहीं माना जाता था. लोगों को इस तरह के काम वक्त की बर्बादी लगते थे.

पैसों की किल्लत भी रहती थी. थिएटर कंपनी कभी चली तो पैसे आए. नहीं चली तो पैसे नहीं आए. हालात कभी कभी ऐसे भी हुए कि उनके परिवार को भूखे पेट सोना पड़ा. ऐसे वक्त में घर चलाने की जिम्मेदारी मदनलाल की पत्नी ने उठाई. उन्होंने एक बालवाड़ी में नौकरी की, वहां तक जाने आने के लिए उन्हें कुल मिलाकर करीब 15 किलोमीटर का सफर तय करना होता था, लेकिन परिवार की जिम्मेदारी थी इसलिए वो रोज 15 किलोमीटर का सफर पैदल तय करती थीं. इसी परिवार में 20 फरवरी 1956 को एक लड़के का जन्म हुआ. नाम रखा गया- अनिल.

अनिल ने अपने बचपन में परिवार के संघर्ष को देखा. तकलीफों को देखा लेकिन उन तकलीफों का रोना रोने की बजाए उसने अपने माता-पिता से संस्कार सीखे. मां ने शादी के बाद तमाम भाषाएं सीखी थीं, उन्हें दूसरे धर्मों को जानने समझने का भी शौक था. ये लक्षण बच्चे में भी आए. उसने कम उम्र में ही वेद, उपनिषद, कुरान, बाइबिल तक सब पढ़ डाली. साहित्य में उस बच्चे ने कबीर सूर से लेकर चार्ल्स डिकेंस तक को पढ़ा. इन किताबों का असर उस बच्चे के दिमाग पर पढ़ना स्वाभाविक था.

इस वजह से आजतक नहीं देखी संगम फिल्म

अनिल जब थोड़ा बड़ा हुआ तो उसे तमाम आर्थिक संघर्षों के बाद भी स्कूल में दाखिला दिलाया गया. पिता जी शहर-शहर घूमते रहे. परिवार भी इधर-उधर होता रहा. जिंदगी की इस आपाधापी में बच्चे ने शुरुआती पढ़ाई पूरी कर ली. पढ़ने में अव्वल रहने वाले अनिल ने कभी अपने मां-बाप की बात को नहीं काटा. आज्ञाकारी इतना कि मां ने जिस बात के लिए मना कर दिया वो काम फिर नहीं किया.

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ये किस्सा दिलचस्प है दरअसल अनिल जब आठ नौ साल का था तब राज कपूर की फिल्म आई थी संगम. अनिल की मां को लगा कि वो फिल्म उनके बेटे को नहीं देखनी चाहिए. उन्होंने अपने बच्चे से कहा कि वो संगम फिल्म नहीं देखेगा. अनिल ने आजतक संगम फिल्म नहीं देखी. यूं तो एक फिल्म का ना देखना भर इतनी बड़ी बात नहीं है लेकिन जिस अनिल की हम बात कर रहे हैं, उसका लोकप्रिय नाम जानने के बाद आपको ताज्जुब होगा कि उन्होंने संगम जैसी हिट फिल्म सिर्फ इसलिए नहीं देखी क्योंकि उनकी मां ने उन्हें मना किया था.

दरअसल, 1956 में पैदा हुए उस अनिल कपूर को ही आज दुनिया अन्नू कपूर के नाम से जानती है. एक बेजोड़ अभिनेता, एक शानदार एंकर और एक रेडियो शो के जरिए एक लाजवाब किस्सागो.

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खैर, आज के अन्नू कपूर और बचपन के अनिल कपूर की बदकिस्मती रही कि उन्हें पढ़ाई का ज्यादा मौका नहीं मिला. शुरुआती पढ़ाई के बाद आर्थिक तंगी की वजह से उनकी पढ़ाई छूट गई. अन्नू अपने देश की सेवा करना चाहते थे. उन्होंने सपना देखा था आईएएस बनने का जो दम तोड़ गया. हां, लेकिन जिस रोज उन्होंने स्कूल छोड़ा उस रोज उनके एक दोस्त ने कहा था- अनिल आज भगवान तुझसे पढ़ने का मौका छीन रहा है लेकिन देखना एक रोज तुझे दुनिया जानेगी.

इस वजह से याद है अन्नू को न्यूटन का दूसरा नियम

उससे पहले स्कूल का अन्नू कपूर का एक किस्सा बड़ा दिलचस्प है जो कम लोगों को ही पता है. हुआ यूं कि अन्नू अपने टीचरों में बेहद लोकप्रिय थे. एक बार फिजिक्स के टीचर ने क्लास के सभी बच्चों से न्यूटन का दूसरा नियम पूछा.

पहला और तीसरा नियम तो सभी को याद था, परेशानी ये थी कि दूसरा नियम किसी को याद नहीं था. एक-एक करके सारे बच्चों को खड़ा कर दिया गया. जब अन्नू की बारी आई तो टीचर ने बड़े आत्मविश्वास से घोषणा करते हुए कहा कि अब अनिल न्यूटन का दूसरा नियम बताएगा. वो नियम अन्नू को भी नहीं आता था.

जब उन्होंने टीचर को ये बात बताई तो जवाब में गाल पर एक झन्नाटेदार तमाचा मिला. टीचर ने कहा कि अन्नू ने उनका विश्वास तोड़ दिया. अन्नू कपूर कहते हैं- उस दिन के बाद से लेकर अभी न्यूटन का दूसरा नियम ऐसा याद हुआ कि अब उनकी चिता के साथ ही जाएगा.

पढ़ाई छोड़ने के बाद अन्नू ने पिता की थिएटर कंपनी को ज्वाइन कर लिया. शहर-शहर घूम कर नाटक करने लगे. इस सफर को और पंख लगे जब अन्नू कपूर का राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में दाखिला हो गया. केके रैना, अनिल चौधरी, नसीरूद्दीन शाह, पंकज कपूर जैसे दिग्गज कलाकारों के संपर्क में अन्नू कपूर आए.

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यूं पहुंचे मुंबई

इसके बाद अन्नू के मुंबई पहुंचने की कहानी भी दिलचस्प है. हुआ यूं था कि एक रोज अन्नू ने एक नाटक किया, जिसमें उनके अभिनय की बहुत तारीफ हुई. जाने-माने अभिनेता पंकज कपूर ने अन्नू कपूर को सलाह दी कि वो श्याम बेनेगल को चिट्ठी लिखें, पंकज कपूर को कहीं से पता चला था कि श्याम बेनेगल को भी अन्नू कपूर का अभिनय पसंद आया है.

पंकज कपूर की सलाह पर अन्नू कपूर ने श्याम बेनेगल को चिट्ठी लिखी और यहीं से किस्मत का पलटना शुरू हुआ. श्याम बेनेगल ने ना सिर्फ अन्नू कपूर को चिट्ठी का जवाब दिया बल्कि अपनी फिल्म मंडी के लिए साइन कर लिया. इसके बाद अन्नू कपूर का सफर शुरू हो गया. इस सफर में ढेरों फिल्में करने वाले अन्नू कपूर को अपने किए गए काम में केतन मेहता की फिल्म की सरदार, सुजीत सरकार की विकी डोनर और सुभाष कपूर की जॉली एलएलबी-2 पसंद आती है.

कॉमर्शियल फिल्मों में किस फिल्म से अन्नू कपूर नोटिस हुए, इसके जवाब में वो कहते हैं कि बेताब फिल्म में उनके रोल को कुछ जानकार लोगों ने देखा था. फिल्मी दुनिया से अलग अन्नू कपूर की पहचान अंताक्षरी जैसे लोकप्रिय टीवी शो से हुई. करीब एक दशक से ज्यादा समय तक उन्होंने संगीत के इस बेहद लोकप्रिय कार्यक्रम को होस्ट किया. किसी प्रतिभागी ने उनका मनपसंद गाना गाया तो उन्होंने भी साथ में गुनगुनाया. उनकी इसी आदत से दर्शकों को पता चला कि दरअसल वो एक बेहतरीन गायक भी हैं. उन्हें संगीत की शानदार समझ है.

अन्नू इस बात का ‘क्रेडिट’ अपनी मां को देते हैं. पिछले लंबे समय से अन्नू रेडियो पर भी एक लोकप्रिय कार्यक्रम को होस्ट करते हैं. जिसमें वो लोगों को फिल्मी दुनिया के अनसुने किस्से बताते हैं. मायानगरी के अपने करीब 36 साल के सफर को याद करके अन्नू कपूर कहते हैं कि उनका काम जिस स्तर पर नोटिस होना चाहिए था वैसा नहीं हुआ फिर भी दर्शकों से जो प्यार मिला उसका आभार. संतोष इस बात का है कि बचपन के संघर्षों को गरीबी को कभी ‘ग्लोरीफाई’ करके नहीं बताया और अपने संस्कारों और परंपराओं ने कभी गलत रास्ते पर चलने नहीं दिया.

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