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बर्थडे स्पेशल: जिसके गानों पर पचास साल पहले भी थिरकते थे युवाओं के पांव, आज भी थिरकते हैं

शमशाद बेगम के गाने आज से 6-7 दशक पहले भी उतने मशहूर हुआ करते थे जितने कि आज हैं

Shailesh Chaturvedi Shailesh Chaturvedi Updated On: Apr 14, 2018 09:47 AM IST

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बर्थडे स्पेशल: जिसके गानों पर पचास साल पहले भी थिरकते थे युवाओं के पांव, आज भी थिरकते हैं

उन्हें तस्वीरें खिंचाना पसंद नहीं था. इसीलिए आप गूगल सर्च करें, तो ज्यादा तस्वीरें नहीं मिल पाएंगी. उन्हें इंटरव्यू देना पसंद नहीं था. उन्हें लोगों से ज्यादा मिलना पसंद नहीं था. उन्हें पार्टियों में जाना पसंद नहीं था. लेकिन उस दौर की जिस गायिका के सबसे ज्यादा गाने पार्टियों में गाए जाते होंगे, उनमें टॉप पर इनका ही नाम है. वो बहुत रूढ़िवादी मुस्लिम परिवार से थीं. लेकिन जो शुरुआती गाना गाया, वो भजन था.

यहां तक कि कहा जाता है कि उस गाने में उनका नाम बदल दिया गया, ताकि संदेश न जाए कि किसी मुस्लिम लड़की ने गाना गाया है. रूढ़िवादी परिवार की थीं, फिर भी तय किया कि दिल की बात सुनेंगी. शादी की गणपत लाल से. चमक-दमक पसंद नहीं थी, इसलिए एक बार फिल्म जगत से किनारा किया, तो किसी को अंदाजा नहीं लगने दिया कि वो क्या कर रही हैं. ऐसा किनारा कि उनकी मौत की अफवाह उड़ी तो परिवार को स्पष्टीकरण देना पड़ा कि वो जीवित हैं. उनकी हमनाम जिस महिला की मौत हुई है, वो अलग हैं.

यह उसी गायिका की की बात है, जिन्होंने कजरा मोहब्बत वाला  गाया.. लेके पहला पहला प्यार  गाया... मेरे पिया गए रंगून, कभी आर कभी पार, सैंया दिल में आना रे, रेशमी सलवार कुर्ता जाली का  ये सभी गाने उसी इंसान के गाए हुए हैं, जिनका नाम शमशाद बेगम था. हिंदी फिल्मों की शुरुआती प्लेबैक गायकों में एक. जलियांवाला कांड होने के अगले रोज यानी 14 अप्रैल 1919 को उनका जन्म हुआ था. शमशाद बेगम का जीवन जिस कदर पारंपरिक था, उनकी आवाज का अधुनातन अंदाज एक विरोधाभास पैदा करता है. वो ऐसी गायिका हैं, जिनके गानों के शायद सबसे ज्यादा रीमिक्स वर्जन आए. यही बताता है कि अपने दौर से कितना आगे थी उनकी गायकी. एक खुली हुई आवाज, जो अलग किस्म का रोमांच और कसक पैदा करती थी.

लव जेहाद के दौर में उस दौर की प्रेम कहानी जानिए

कट्टरवादी परिवार में जन्म लेने वाली शमशाद बेगम ने लव मैरिज की. वो भी अपने धर्म से अलग हिंदू परिवार में. हालांकि अपनी पहचान उन्होंने नहीं बदली. गणपत लाल से उन्हें प्रेम हुआ, जो एक वकील थे. 15 साल की उम्र में शादी हुई. एक मुस्लिम लड़की का हिंदू लड़के से शादी करना इस दौर के लिहाज से ही सोच कर देखिए कि कितना मुश्किल है. उससे अंदाजा लगाइए कि तब कैसा रहा होगा. परंपरा और क्रांति का अद्भुत संगम शमशाद बेगम में मिलता है. शायद वही क्रांतिकारी और आधुनिक सोच उनके गाने में थी. उनकी आवाज के खुलेपन में थी, जो उन्हें बाकियों से अलग करती है.

जो लोग गांव में रहे हैं, वे जरा मन में एक तस्वीर बनाएं या याद करें. घर, सामने बरामदा, बीच में आंगन... कच्चे बरामदे या आंगन को सुबह नानी या दादी लीपती थीं, ताकि दोपहर में मिट्टी न उड़े. कुछ पेड़, जिसमें खासतौर पर नीम, जिस पर छलांग लगाती गिलहरियां. अपना गांव याद आया ना? इस याद के साथ एक गाने की कुछ पंक्तियां याद कीजिए, ‘बूझ मेरा क्या नाम रे, नदी किनारे गांव रे.. पीपल झूमे मोरे आंगना, ठंडी-ठंडी छांव रे.’ यह एक और विरोधाभास है. आधुनिकता के साथ अपनी जड़ों का अहसास भी शमशाद बेगम की आवाज की पहचान थी.

साढ़े 12 रुपए प्रति गाने का था पहला कॉन्ट्रैक्ट

लाहौर के एक मुस्लिम परिवार में उनका जन्म हुआ था. कई जगह अमृतसर में जन्म का जिक्र है. लेकिन उनकी बेटी के मुताबिक जन्म लाहौर में हुआ था. पिता मैकेनिक थे और मां गृहिणी. आठ भाई-बहन थे. शमशाद थोड़ी बड़ी हुईं, तो धार्मिक और सामाजिक समारोहों में गाने लगीं. उनके चाचा अमीरुद्दीन उन्हें लेकर मास्टर गुलाम हैदर के पास गए. एक इंटरव्यू में शमशाद बेगम ने बताया था कि मास्टर साहब को आवाज पसंद आई. उसी दिन उन्होंने कॉन्ट्रैक्ट पर साइन करने को कहा. जानते हैं कि कॉन्ट्रैक्ट कितने का था? 12 गाने गाने थे और हर गाने के साढ़े 12 रुपए शमशाद बेगम को मिलने थे. 12 साल की उस बच्ची के लिए उस दौर में यह बहुत बड़ी रकम थी.

गाने गाए, लेकिन परंपरावादी परिवार की वजह से नहीं की एक्टिंग

गाना शुरू किया तो कुछ समय बाद एक्टिंग के भी ऑफर आए. लेकिन रूढ़िवादी परिवार को ध्यान में रखते हुए शमशाद बेगम ने उन्हें ठुकरा दिया. बंटवारे के समय वह बंबई आ गईं. उसके बाद उन्होंने शायद ही कोई प्रख्यात संगीतकार नहीं होगा, जिसके लिए न गाया हो. यहां तक कि जब लता मंगेशकर और ओपी नैयर मे कथित तौर पर तनातनी हुई और दोनों ने एक दूसरे के साथ न काम करने का फैसला किया, तो नैयर साहब मुश्किल में पड़ गए. तब शमशाद बेगम उनके लिए गाने को तैयार हुईं.

पति की मौत के बाद शमशाद बेगम ने बेटी के साथ रहना शुरू कर दिया. हालांकि उसके बाद भी उन्होंने गाने गाए. लेकिन धीरे-धीरे गाना कम कर दिया और फिर दुनिया से अलग-थलग जैसी हो गईं. 80 के दशक में उन्होंने कुछ इंटरव्यू जरूर दिए, लेकिन यह साफ हो गया कि उन्हें लाइम-लाइट पसंद नहीं है. 23 अप्रैल 2013 को उन्होंने दुनिया छोड़ दी. 94 साल की जिंदगी में उन्होंने जो भी गाया, खुले गले से गाया. जो भी जिंदगी जी, अपने मुताबिक जी. उनके गाने अब भी ताजगी का अहसास देते हैं. उनकी जिंदगी बताती है कि कैसे एक तरफ इंसान घोर पारंपरिक और दूसरी तरफ मॉडर्न हो सकता है. ये दोनों बातें साथ-साथ चल सकती हैं.

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