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जन्मदिन विशेष: सारंगी को पंडित रामनारायण कहें या पंडित रामनारायण को सारंगी...बात एक ही है

पंडित रामनारायण को सारंगी को सिर्फ कोठे पर बजने वाले वाद्ययंत्र की पहचान से बाहर निकालने का श्रेय जाता है

Shivendra Kumar Singh Shivendra Kumar Singh Updated On: Dec 25, 2017 08:24 AM IST

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जन्मदिन विशेष: सारंगी को पंडित रामनारायण कहें या पंडित रामनारायण को सारंगी...बात एक ही है

1930 के दशक की बात है. राजस्थान के उदयपुर के पास ही बसे एक गांव में संगीतकारों के परिवार में जन्मा एक बच्चा अपने बचपने की बदमाशियों के बीच खुद से चलना, बोलना और हसंना मुस्कराना सीख रहा था. बच्चे के घर में संगीत का माहौल था. पिता दिलरूबा बजाते थे. बड़े भाई तबला बजाते थे.

बच्चे की उम्र करीब पांच साल की हुई होगी जब उसे धीरे धीरे घर का माहौल समझ में आना शुरू हुआ. एक रोज घर में इधर से उधर दौड़ते भागते इस बच्चे की नजर एक वाद्ययंत्र पर पड़ी. उस वाद्ययंत्र को कोई बजाता नहीं था. बच्चे ने जिज्ञासा में पूछा तो पता चला कि वो वाद्ययंत्र सारंगी है. उस वाद्ययंत्र की कहानी भी बच्चे को पता चली. पता चला कि उसके जन्म से पहले एक साधु महाराज घर आया करते थे. वो जब कभी घर आते थे इसी साज को बजाकर गाते थे.

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एक बार वो अपना साज यहीं छोड़कर चले गए. इसके बाद जाने क्या हुआ वो कभी अपना साज लेने नहीं आए. ये शायद नियति ही थी कि उस 5 बरस के बच्चे का दिल उस सारंगी पर आ गया. इसके बाद की सारी कहानी अब इतिहास बन चुकी है. उस बच्चे को आज पूरी दुनिया सारंगी के सम्राट पंडित रामनारायण के नाम से जानती है. आज उन्हीं महान कलाकार पंडित रामनारायण का 90वां जन्मदिन है.

सारंगी का जुनून

पंडित रामनारायण का जन्म 25 दिसंबर 1927 को हुआ था. पांच बरस की उम्र से ही सारंगी का जुनून ऐसा चढ़ा कि थोड़ा बड़े होने पर पंडित रामनारायण स्कूल भी नहीं गए. कहते हैं कि एक दिन स्कूल जाने के बाद ही उन्हें समझ आ गया कि स्कूल के साथ उनका रिश्ता लंबे समय तक नहीं चलेगा. उसी समय उन्हें ये भी समझ आ गया था लंबा रिश्ता संगीत के साथ चलेगा. लिहाजा संगीत की परंपरागत शिक्षा शुरू हो गई.

परिवार में सदियों से संगीत की परंपरा चली आ रही थी. पिता जी से सीखा, फिर गुरू उदयलाल जी के पास सीखा. पंडित महादेव प्रसाद और किराना घराने के अब्दुल वहीद खान ने भी संगीत की बारीकियां सीखाईं. हुनर देकर ऊपर वाले ने भेजा था और बड़े कलाकारों की शोहबत मिली जिसका असर ये हुआ कि 14 बरस की उम्र तक पहुंचते पहुंचते पंडित रामनारायण को ऑल इंडिया रेडियो के लाहौर सेंटर में नौकरी मिल गई. बिना संघर्ष किए कलाकार कैसा, पंडित रामनारायण के लिए संघर्ष था सारंगी को  बतौर साज एक नई पहचान दिलाना.

ये वो दौर था जब सारंगी बजती तो थी लेकिन लोग उसे संगत का वाद्ययंत्र ही मानते थे. पंडित रामनारायण को शुरूआती कार्यक्रमों में इस संघर्ष का सामना करना पड़ा. उन्हें सुनने में श्रोताओं की दिलचस्पी कम ही थी. 1947 में बंटवारे के बाद वो हिंदुस्तान चले आए. दिल्ली में रहे, मुंबई गए. 1956 में पंडित राम नारायण ने बॉम्बे के एक संगीत समारोह में पहली बार सारंगी की सोलो परफॉर्मेंस दी. साथ साथ उस्ताद अमीर खां, गंगूबाई हंगल, पंडित ओंकारनाथ ठाकुर, केसर बाई, बड़े गुलाम अली खां के साथ उन्होंने सारंगी संगत की. सबकुछ कर लिया लेकिन सारंगी का साथ नहीं छोड़ा और अपनी सोच नहीं बदली कि इस वाद्ययंत्र को सिर्फ कोठे पर बजने वाले वाद्ययंत्र की पहचान से बाहर लाएंगे.

रंग लाई मेहनत

आखिरकार लंबी समय की मेहनत रंग आई और उस्ताद विलायत खां के साथ उनका रिकॉर्ड आया. इसके बाद तो अचानक संगीत की दुनिया में सारंगी की साख बढ़ गई. चूंकि पंडित रामनारायण बॉम्बे में थे इसलिए फिल्मी दुनिया में भी उनकी सारंगी की गूंज पहुंच चुकी थी. संगीतकार ओपी नैय्यर ने उनसे कई फिल्मों में सारंगी बजवाई. फिल्म कश्मीर की कली, मुगल-ए-आजम, मधुमती, मिलन जैसी फिल्मों में पंडित रामनारायण की सारंगी के सुर बिखरे.

फिर वो समय भी आया जब यहूदी मैनुहिन जैसे महान कलाकार ने कहाकि पंडित रामनारायण ही सारंगी की पहचान हैं. पंडित रामनारायण अपनी इस कामयाबी की श्रेय अपनी पत्नी को देते हैं. जिन्होंने उन्हें घर की जिम्मेदारी से हमेशा इस भरोसे के साथ मुक्त रखा कि घर वो संभाल लेंगी. अपनी पत्नी की मौत के बाद पंडित रामनारायण अकेले जरूर पड़े लेकिन उस वक्त भी सारंगी उनके साथ रही. ये उनके संघर्ष, लगन, काबिलियत और साधना का ही नतीजा है कि आज लोगों को समझ आ गया है कि सारंगी एक ऐसा वाद्य है, जिसमें सुख है, दुख है, खुशियां हैं, दया है.

जीवन के तमाम रंग समेटती है सारंगी. जिस तरह शास्त्रीय कलाकार आलाप लेते हैं, उस तरह का आलाप सारंगी में है. मींड है, गमक है. आसान भाषा में कहा जाए तो आप गले से जो भी गाएं सारंगी उसे सजाती है. कोई कह रहा था, अतीत का ‘सारिंदा’ सारंगी बन गया. राजस्थानी लोकवाद्य ‘रावणहत्था’ से भी इसे अक्सर जोड़ा जाता है.

सारंगी का जादू

पंडित रामनारायण जब सारंगी बजाते हैं तो ऐसा लगता है कि पूरे संसार का सार समझा रहे हों. आज उनके पास वो तजुर्बा भी है जो संगीत के साथ साथ दुनियादारी सीखा सके. संगीत की विरासत उनके परिवार में आज भी कायम है. बेटे बृजनारायण सरोद और बेटी अरुणा सारंगी बजाती हैं. उनके नाम पर बना फाउंडेशन ऐसे कलाकारों को वजीफा देती है जो सारंगी सीखना चाहते हैं.

पंडित रामनारायण का सपना आज भी वही है कि सारंगी को वो पहचान मिले जिसकी वो हकदार है. कुछ बरस पहले तक अपने कार्यक्रमों से उन्हें जो रकम मिलती थी उस पैसे से वो नए नए कलाकारों की मदद किया करते थे. भारत सरकार ने 1991 में पंडित रामनारायण को पद्मभूषण से सम्मानित किया.

इसके बाद 2005 में उन्हें देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मविभूषण से भी सम्मानित किया गया. आज उनके 90वें जन्मदिन पर यही दुआ है कि वो और लंबा जीवन जीएं. सारंगी को आज जो मुकाम पंडित रामनारायण ने दिलाया है उस पर उर्दू के बड़े शायर मुनव्वर राना का शेर याद आता है. मां पर लिखे गए मुनव्वर राना के तमाम शेर काफी पसंद किए जाते हैं.

मामूली एक कलम से कहां तक घसीट लाए. हम इस ग़ज़ल को कोठे से मां तक घसीट लाए..

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