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परवीन शाकिर: मैं सच कहूंगी मगर फिर भी हार जाऊंगी, वो झूठ बोलेगा और लाजवाब कर देगा

परवीन शाकिर की याद में सालाना कार्यक्रम होते हैं. उनकी याद में एक पोस्टल स्टैंप जारी किया गया है. सिर्फ 42 साल की उम्र में इतनी लोकप्रियता हासिल करने वाली परवीन शाकिर के शेर अब भी लोगों की जुबां पर होते हैं

Updated On: Nov 24, 2018 09:17 AM IST

Shivendra Kumar Singh Shivendra Kumar Singh

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परवीन शाकिर: मैं सच कहूंगी मगर फिर भी हार जाऊंगी, वो झूठ बोलेगा और लाजवाब कर देगा

साल 2004 में पाकिस्तान जाने का मौका मिला था. भारतीय क्रिकेट टीम 14 साल के बाद पाकिस्तान के ऐतिहासिक दौरे पर जा रही थी. मुझे उस सीरीज को कवर करना था. उन दिनों भारत-पाकिस्तान के रिश्तों में नर्माहट थी. यहां तक की उस सीरीज का नाम भी दोस्ती सीरीज रखा गया था. उस सीरीज की कवरेज के दौरान मंटो की कब्र को देखने का मौका मिला था. अगली बार जब 2006 में पाकिस्तान गया तो फिर क्रिकेट सीरीज की ही कवरेज करनी थी.

पाकिस्तान के इन दौरों को एक और कलमकार से और करीबी परिचय कराया. उस कलमकार का नाम है परवीन शाकिर. उर्दू शायरी की बेहद अजीम शख्सियत के बारे में वहां के कुछ लोगों से बातचीत भी हुई. ऐसे ही लोगों में पूर्व दिग्गज क्रिकेटर जहीर अब्बास भी शामिल हैं. ये भी सच है कि 2006 तक मैंने परवीन शाकिर के चंद बेहद पॉपुलर शेरों को ही सुना था. जिसमें लंबे समय तक याद रह जाने वाले दो शेर थे-

मैं सच कहूंगी मगर फिर भी हार जाऊंगी

वो झूठ बोलेगा और लाजवाब कर देगा

मैं फूल चुनती रही और मुझे ख़बर न हुई,

वो शख़्स आ के मिरे शहर से चला भी गया

पाकिस्तान से लौटने के बाद उनका लिखा जो कुछ हिंदी में मौजूद था वो पढ़ा. एक और संयोग 2013 के आस पास हुआ. किसी कार्यक्रम में हिस्सा लेने के लिए पाकिस्तान की बड़ी लेखिका फहमीदा रियाज भारत आई थीं. उन दिनों पाकिस्तान के संस्मरणों पर मेरी किताब ‘ये जो है पाकिस्तान’ आई थी. जाहिर है मेरी बड़ी इच्छा थी कि मैं वो किताब फहमीदा रियाज को दूं. बाद में जब उस किताब का इंग्लिश और उर्दू में अनुवाद हुआ तो वो अनुवाद भी मैंने फहमिदा रियाज को भेजा था. बल्कि इंग्लिश अनुवाद के लिए उन्होंने भूमिका भी लिखी थी. फहमीदा रियाज बताती थीं कि परवीन शाकिर का पाकिस्तान में क्या कद था. परवीन शाकिर ने बहुत कम उम्र में लिखना शुरू किया था. उर्दू के अखबारों और इंग्लिश मैगजींस में उनकी कलम का जादू पूरे मुल्क पर छाया हुआ था. परवीन शाकिर का जन्म बंटवारे के बाद का है. लिहाजा उनकी कलम का अंदाज भी अलग है. परवीन शाकिर के कुछ शेर देखिए.

जुगनू को दिन के वक़्त परखने की ज़िद करें

बच्चे हमारे अहद के चालाक हो गए

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या खुदा अब तो कोई अब्र का टुकड़ा बरसे

बच्चियां लाई हैं गुड़ियों को जलाने के लिए

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कुछ तो तिरे मौसम ही मुझे रास कम आए

और कुछ मिरी मिट्टी में बग़ावत भी बहुत थी

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कमाल-ए-ज़ब्त को ख़ुद भी तो आज़माऊंगी

मैं अपने हाथों से उस की दुल्हन सजाऊंगी

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परवीन शाकिर ने अंग्रेजी साहित्य और भाषाशास्त्र में एमए किया था. मैनेजमेंट की डिग्री उनके पास थी. वो टीचर रहीं. फिर सिविल सर्विसेस में भी गईं. ये बातें जान लेने से आप उनके अनुभवों का अंदाजा लगा सकते हैं. जो आपको उनके शेरों में भी दिखाई देगा. तमाम मुशायरों में परवीन शाकिर की गजलों को आप भी सुन सकते हैं. जिन्हें सुनने के बाद आपको उनकी शायरी के अलग अलग रंग समझ आएंगे. 1976 में जब उनकी पहली किताब ‘खुशबू’ आई तो वो सिर्फ 24 साल की थीं. इस किताब के लिए उन्हें बड़ा नाम सम्मान मिला. जिसमें पाकिस्तान का प्रतिष्ठित सम्मान ‘प्राइड ऑफ परफॉर्मेंस’ शामिल है.

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परवीन शाकिर की अगली किताब भी चार साल में ही आ गई. लेकिन इसके बाद उन्होंने किताब पूरी करने में काफी वक्त लिय़ा. इस दौरान वो पाकिस्तान की चहेती शायरों में शरीक हो चुकी थीं. उनकी शायरी में वो रंग था जो मोहब्बत की नई तस्वीर गढ़ता था. इस नई तस्वीर को गढ़ने के लिए उन्होंने जिन शब्दों का इस्तेमाल किया वो भी बाकमाल थे.

इस दौरान परवीन शाकिर ने एक डॉक्टर से शादी की. उन्हें एक बेटा भी हुआ लेकिन इसके बाद ये रिश्ता ज्यादा समय तक नहीं चला. परवीन शाकिर और उनके शौहर डॉक्टर नसीर अली अलग हो गए. ये वही वक्त था जब परवीन शाकिर ने शेरो शायरी के अलावा कुछ टेलीविजन कार्यक्रमों में भी काम किया. वो 26 दिसंबर 1994 की तारीख थी. इस्लामाबाद में परवीन शाकिर की कार का एक्सीडेंट एक बस से हुआ. कहा जाता है कि एक्सीडेंट के वक्त सड़क पर सिग्नल काम नहीं कर रहा था. ये तारीख परवीन शाकिर की जिंदगी की आखिरी तारीख थी. इस दुर्घटना में उनकी मौत हो गई. बाद में उस सड़क का नाम परवीन शाकिर के नाम पर ही रखा गया.

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परवीन शाकिर की याद में सालाना कार्यक्रम होते हैं. उनकी याद में एक पोस्टल स्टैंप जारी किया गया है. सिर्फ 42 साल की उम्र में इतनी लोकप्रियता हासिल करने वाली परवीन शाकिर के शेर अब भी लोगों की जुबां पर होते हैं. पाकिस्तान की अपनी यात्राओं में मुझे उनके कुछ मुरीद मिले हैं. जो उन्हें और उनके शेरों को‘कोट’करते हैं. उनके कुछ और शेर देखिए.

कल रात जो ईंधन के लिए कट के गिरा है

चिड़ियों को बहुत प्यार था उस बूढ़े शजर से

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घर आप ही जगमगा उठेगा

दहलीज़ पे इक क़दम बहुत है

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दिल का क्या है वो तो चाहेगा मुसलसल मिलना

वो सितमगर भी मगर सोचे किसी पल मिलना

वां नहीं वक़्त तो हम भी हैं अदीम-उल-फ़ुर्सत

उस से क्या मिलिए जो हर रोज़ कहे कल मिलना

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