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जन्मदिन विशेष पं. मल्लिकार्जुन मंसूर: वो महान कलाकार जिसे देर से मिली पहचान पर जब मिली तो दुनिया जान गई

मंसूर की गायकी में तीन घरानों, तीन परंपराओं का संगम मिलता है क्योंकि बचपन में उन्होंने कर्नाटक संगीत सीखा, जवान हुए तो ग्वालियर घराने के विद्वानों से सीखा और आखिरकार जयपुर-अतरौली घराने से जुड़ गए

Updated On: Jan 01, 2018 08:34 AM IST

Shivendra Kumar Singh Shivendra Kumar Singh

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जन्मदिन विशेष पं. मल्लिकार्जुन मंसूर: वो महान कलाकार जिसे देर से मिली पहचान पर जब मिली तो दुनिया जान गई

वो पूरी जिंदगी संगीत में जीते रहे. एक गुरु से दूसरे गुरु, दूसरे से तीसरे गुरु के चरणों में बैठकर स्वरों की साधना करते रहे. अलग-अलग घराने, अलग-अलग अंदाज के रंग सीखते रहे और जब तक संगीत जगत ने उनकी प्रतिभा को सलाम किया तब तक वो जीवन के 60 बसंत देख चुके थे. यानी जब तक संगीत की दुनिया में उन्हें पहचान मिली उनकी उम्र 60 बरस हो चुकी थी.

जाहिर है पहचान देर से मिली, लेकिन जब मिली तो ऐसी मिली कि हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के धुरंधरों में उनका नाम शुमार हो गया. मसलन- भारत सरकार ने उन्हें पद्म श्री, पद्म भूषण, पद्म विभूषण से नवाजा. ऐसे थे जयपुर-अतरौली घराने के गायक पंडित मल्लिकार्जुन भीमारायप्पा मंसूर. आज उन्हीं मल्लिकार्जुन मंसूर की सालगिरह पर हम उन्हें याद कर रहे हैं.

वैसे कुछ जगहों पर उनका जन्मदिन 31 दिसंबर भी दर्ज है. उनके संगीत के सफर पर बात करने से पहले आपको उनकी गायकी की बानगी सुनाते हैं.

दरअसल, मल्लिकार्जुन मंसूर की गायकी में बिल्कुल अलग कैफियत है. सबसे अलग. नशे में डूबी मतवाली सी आवाज. एक स्वर से दूसरे स्वर की यात्रा कैसे पूरी होती है, आंदोलित होते हुए वो कब मंद्र स्वर से तार सप्तक की ओर बढ़ जाते हैं पता ही नहीं लगता. हल्की भर्राई सी आवाज लेकिन एक खास तरह का सम्मोहन और मस्ती. ताल के साथ लगातार लयकारी का खेल ऐसे चलता रहता है जैसे आप ऊंट पर बैठकर आंखें मूंदें हिचकोले खा रहे हों. इस वीडियो को देखिए आप इस बात को महसूस करेंगे.

कर्नाटक के धारवाड़ जिले से 5 किलोमीटर पश्चिम में एक गांव है मंसूर. इसी गांव में 1 जनवरी, 1911 को मल्लिकार्जुन पैदा हुए थे. परिवार में संगीत का माहौल पहले से था. पिता भीमारायप्पा गांव के सरपंच थे. यूं तो वो खेती-किसानी करते थे लेकिन संगीत से बहुत लगाव था, कन्नड़ संगीत नाटकों से भी जुड़े हुए थे. बड़े भाई बासवराज का अपना थिएटर ग्रुप था. 8 साल की उम्र में मल्लिकार्जुन ने स्कूल छोड़ दिया और सिंगर-ऐक्टर के तौर पर भाई का ग्रुप ज्वाइन कर लिया था.

बचपन में ध्रुव और प्रह्लाद जैसी भूमिकाएं निभाने की वजह से उन्हें खूब सराहना मिली. उनके सबसे पहले गुरु बने अप्पैय्या स्वामी जो कर्नाटक शैली के गायक, और वॉयलिन वादक थे. बड़े भाई बासवराज अप्पैय्या स्वामी के पास गाना सीखने जाते थे, उन्हीं के जरिए मंसूर को भी मौका मिला. अप्पैय्या स्वामी ने मंसूर को कर्नाटक संगीत की बुनियादी तालीम दी. थिएटर ग्रुप के साथ दौरे करते हुए मल्लिकार्जुन को ग्वालियर घराने के लिए दिग्गज गायक नीलकंठ बुआ अलूरमठ के सामने परफॉर्म करने का मौका मिला. गुरु नीलकंठ बुआ मल्लिकार्जुन को सिखाने को तैयार हो गए. 12 साल से लेकर 18 साल तक उनकी ट्रेनिंग अलूरमठ से हुई. इसके बाद आगे की राह और अगला गुरु खोजते हुए मंसूर बॉम्बे (मुंबई) पहुंच गए.

थिएटर के दिनों से ही मल्लिकार्जुन मंसूर ने जयपुर-अतरौली घराने के उस्ताद अल्लादिया खां के बारे में खूब सुना था. उनका बहुत मन था कि वो उस्ताद अल्लादिया खां से गाना सीखें. अल्लादिया खां के पास पहुंचे तो खां साहब ने मल्लिकार्जुन को अपने बेटे मंजी खान के हवाले कर दिया. मल्लिकार्जुन मंसूर की जयपुर-अतरौली घराने की विधिवत तालीम शुरू हो गई. हालांकि 2 ही साल बाद 1937 में मंजी खान का इंतकाल (निधन) हो गया. इसके बाद 10 साल तक मल्लिकार्जुन ने मंजी खान के भाई भुर्जी खान से सीखा.

जयपुर-अतरौली घराने के ध्रुपद स्टाइल खयाल गायकी में मल्लिकार्जुन की मास्टरी हो गई. मल्लिकार्जुन मंसूर ने कहीं खुद कहा है कि भुर्जी खान से तालीम पूरी होते-होते उन्होंने 125 राग तैयार कर लिए थे. मंसूर की गायकी में तीन घरानों, तीन परंपराओं का संगम मिलता है क्योंकि बचपन में कर्नाटक संगीत सीखा, जवान हुए तो ग्वालियर घराने के विद्वानों से सीखा और आखिरकार जयपुर-अतरौली घराने से जुड़ गए. हालांकि जयपुर-अतरौली घराने के खान बंधुओं की तालीम की उनकी शैली पर अमिट छाप दिखाई देती है.

मल्लिकार्जुन मंसूर की खासियत थी वो बड़े ही अप्रचलित राग गाते थे जैसे- शुद्ध नट, शिवमत भैरव, हेम नट, लाजवंती, संपूर्ण मालकौंस, रामदास मल्हार, बिहारी वगैरह. आपको भी उनके गाए ये राग सुनाते हैं.

शुरू-शुरू में मल्लिकार्जुन मंसूर घर चलाने के लिए संगीत से जुड़ी नौकरियां करते रहे. ऑल इंडिया रेडियो में गाते थे, एचएमवी में प्रोड्यूसर रहे, एआईआर धारवाड़ में 10 साल तक संगीत सलाहकार भी रहे. 1969 में उन्हें बॉम्बे में गाने का मौका मिला जिसके बाद वो तेजी से मशहूर हुए. मंसूर का संगीत सुननेवालों पर फौरन असर करता है. उन्हें माहौल बनाने के लिए ज्यादा वक्त नहीं चाहिए होता था. बचपन में थिएटर करने की वजह से भी वो अपने श्रोताओं से कनेक्ट फौरन बना लेते थे.

मल्लिकार्जुन मंसूर को वर्ष 1970 में पद्मश्री, 1976 में पद्म भूषण और 1992 में पद्म विभूषण दिया गया. 1982 में उन्हें संगीत नाटक अकादमी की फेलोशिप भी मिली. पत्नी गंगम्मा ने उन्हें 7 बेटियां और एक बेटा दिया. पुत्र राजशेखर मंसूर और पुत्री नीला कोडली आज जाने-माने शास्त्रीय गायक रहे. 12 सितंबर, 1992 को 81 साल की उम्र में पंडित जी ने आखिरी सांस ली.

अपनी संगीतमय यात्रा को लेकर उन्होंने कन्नड़ में एक किताब लिखी- नन्ना रसयात्रे. उनके पुत्र राजेशखर मंसूर ने इस किताब को ‘माय जर्नी इन म्यूजिक’ नाम से अंग्रेजी में अनुवाद किया. धारवाड़ के मंसूर गांव में जहां पंडित मल्लिकार्जुन मंसूर जन्मे, उस घर को अब मेमोरियल में तब्दील कर दिया गया है.

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