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जन्मदिन विशेष: बहुत सम्मान से याद करता हूं श्रोताओं का प्यार- पंडित जसराज

सभी पद्म सम्मानों से सुशोभित हो चुके पंडित जसराज ने कम उम्र में ही पिता को खो दिया था

Updated On: Jan 28, 2018 12:09 PM IST

Shivendra Kumar Singh Shivendra Kumar Singh

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जन्मदिन विशेष: बहुत सम्मान से याद करता हूं श्रोताओं का प्यार- पंडित जसराज

मेवाती घराने के मशहूर शास्त्रीय गायक पंडित जसराज का जन्म 28 जनवरी, 1930 को हरियाणा के हिसार में हुआ था. आपने संगीत की शुरुआती शिक्षा अपने पिता पंडित मोतीराम जी से ली थी. अपने गायन के जरिए अध्यात्म से जोड़ने की कला की वजह से पंडित जसराज को रसराज भी कहा जाता है. आपको 1975 में पद्मश्री, 1990 में पद्मभूषण और 2000 में पद्मविभूषण से नवाजा गया. हाल ही में शिवेंद्र कुमार सिंह ने पंडित जसराज से बात की, बातचीत के अंश-

पंडित जी, अपने बचपन के बारे में बताएं. अपने मां-पिता जी और अन्य परिवार वालों के विषय में बताएं. आपके पिता जी का निधन जल्दी हो गया था. क्या कुछ याद आता है उनके बारे में?

जय हो! मेरे पिताजी का नाम पंडित मोतीरामजी और माताजी का नाम कृष्णाबाई था. आपने सही कहा. जब मैं चार साल का ही था, तब मेरे पिताजी का निधन हो गया पर उस छोटी सी उम्र में ही मैं उनसे गाना सीखना शुरू कर चुका था और फिर वो शिक्षा जारी रही.

पंडित जी हममें से हर इंसान ने बचपन में शैतानियां जरूर की होती हैं, आपकी कौन सी शैतानी है जो ताउम्र याद रहेगी?

बात आप सही कह रहे हैं, शैतानी तो ज्यादातर लोग करते हैं लेकिन मुझे शैतानी करने का तो समय ही नहीं मिला. जब शैतानी करने की उम्र हुई, तब तक पिताजी हमें छोड़ कर जा चुके थे. ऐसे में लगा कि मुझे घर के लिए कुछ करना है. 7 साल की उम्र में तो मैंने अपने मंझले भाई के साथ स्टेज पर तबला बजाना शुरु कर दिया था. पंडित प्रताप नारायण जी ने मुझे तबला बजाना सीखा दिया था. जिस उम्र में बच्चे शैतानी करते हैं, उस उम्र में मैं अपने घर के कामकाज में लग गया था.

अपनी शिक्षा के बारे में बताएं?

मेरी एक ही शिक्षा है, संगीत की. जैसा मैंने कहा- मैं घर के कामकाज में जुट गया था. मेरी पढ़ाई-लिखाई वही खत्म हो गयी.

आपकी संगीत शिक्षा की शुरूआत कैसे हुई?

मैंने बचपन में ही पिताजी से सीखना शुरू कर दिया था. जब वो नहीं रहे तब भी मैंने अपनी साधना जारी रखी. बाद में जब मैं करीब 15 वर्ष का था तब मेरी संगीत की शिक्षा मेरे बड़े भाई पंडित मणिरामजी के साथ शुरू हुई.

आपने बचपन में आर्थिक संघर्ष भी देखे हैं, ऐसा कहा जाता है कि एक बार अपनी मां की दवा के लिए आपको दुकानदार के पास बिना पैसे के जाना पड़ा था. वो किस्सा आप अपने करोड़ों चाहनेवालों से साझा करें.

मैं उन दिनों कलकत्ता (अब कोलकाता) में था. एक बार मैं अपनी मां के लिए डॉक्टर की लिखी दवाओं को लेने केमिस्ट के पास गया. जेब में जितने पैसे थे, निकालकर दे दिए. लेकिन वो काफी नहीं थे. केमिस्ट ने कहा- कभी सुना है कि दवाएं उधार दी गई हों. लेकिन तभी दुकान का मालिक वहां आया. उसने दवाएं दे दीं. दरअसल उसने मुझे पहचान लिया था.

स्टेज पर पहला कार्यक्रम कब और कैसे मिला?

मेरा गाने का पहला कार्यक्रम 1952 में काठमांडू, नेपाल में हुआ. दरअसल रेडियो पर मैं गाया करता था, मेरा गाना सुनकर वहां से बुलावा आया. वहां के राजा त्रिभुवन विक्रम थे. मेरा पहला कार्यक्रम उनके सामने हुआ था. मुझे याद है कि उन्होंने मुझे पांच हजार मोहर का इनाम दिया था.

आप संगीत की जिस महानता पर पहुंच चुके हैं, वहां ईश्वर के साक्षात दर्शन हो जाते हैं गायकी के दौरान, आपके साथ कभी ऐसा हुआ है?

शिवेन्द्रजी, अनुभतियां जरूर होती रहती हैं, मगर दर्शन का दावा नहीं कर सकते.

अपने समकालीन कलाकारों के साथ कैसे रिश्ते रहे? क्या कुछ याद आता है आज भीमसेन जी के बारे में, रविशंकर जी के बारे में, कुमार गंधर्व जी के बारे में और जिसके बारे में आप बताना चाहें?

इन तीनों बड़े कलाकारों से मुझे बहुत प्यार मिला, कुमारजी मुझे हमेशा अपना छोटा भाई मानते थे. वैसे ही पंडित रविशंकरजी मुझे अपना छोटा भाई मानते थे. जहां भाईचारा है, वहां अनबन भी होती है, मनमुटाव होना, खुशियां मिलना स्वाभाविक है, और इन रिश्तों के जरिए खुशियां मिलती रही. इनके आदेश अनुसार चलने की कोशिश करता हूं.

अपने विवाह के बारे में बताएं, कैसे हुई थी शादी?

मैं कलकत्ते में रहता था. प्रोग्राम के लिए मेरा बंबई आना जाना था, पर बहुत सालों में एक-आध बार. उसी दौरान मेरी मुलाकात मधुरा वी शांताराम से हुई, इनको हमारा गाना पसंद आया, बस उसके बाद हमारी शादी हुई.

अपनी बेटी दुर्गा जसराज जी के काम को लेकर आप कितने प्रसन्न रहते हैं.

मैं बहुत खुश हूं. बड़ा अच्छा काम कर रहीं हैं. हमारे संगीत को ऊंचाइयों पर ले जाने की कोशिश कर रहीं हैं, भगवान करें उसे सफलता मिले, क्योंकि वो सिर्फ मेरे लिए नहीं पूरे भारतीय संगीत के लिए कर रहीं हैं.

आपको जो तमाम सम्मान मिले और उसके साथ श्रोताओं का जो प्यार मिला उसे कैसे याद करते हैं?

जो सम्मान मिले हैं, उन्हें सम्मान से याद करता हूं, और जो श्रोताओं का प्यार मिलता है, उसको भी बहुत सम्मान से याद करता हूँ, भगवान को लाख-लाख शुक्राना भेजता हूं.

(तस्वीर साभार- इन्नी सिंह)

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