S M L

मोरारजी देसाई ही कर सकते थे अमेरिकी राष्ट्रपति जाॅन एफ.कैनेडी को निरुत्तर

अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी के सवालों के मोरार जी देसाई ने दिए थे बेहतरीन जवाब

Updated On: Mar 01, 2018 11:05 AM IST

Surendra Kishore Surendra Kishore
वरिष्ठ पत्रकार

0
मोरारजी देसाई ही कर सकते थे अमेरिकी राष्ट्रपति जाॅन एफ.कैनेडी को निरुत्तर

जाॅन एफ.कैनेडी- आप गुट निरपेक्ष हैं.आपके साथ सभी के मित्रतापूर्ण संबंध हैं. पर आप सोवियत संंघ के प्रति विशेष पक्षपात का व्यवहार रखते हैं. इससे आपको यह नहीं लगता कि उसकी ओर आपका ज्यादा झुकाव है ?

मोरारजी देसाई - यह आप किस आधार पर कह रहे हैं ?

कैनेडी- हमारी कोई गलती मालूम पड़ने पर तो आप उसकी कटु आलोचना करते हैं, पर सोवियत रूस की गलती होने पर उसके प्रति आप सौम्य भाषा का प्रयोग करते हैं. उसकी आलोचना करने से आप कतरारते हैं. इसमें आपको पक्षपात मालूम नहीं पड़ता ?

मोरारजी देसाई- 'सोवियत रूस साम्यवादी अधिनायकवादी प्रणाली वाला देश है. जबकि आप और हम लोकतांत्रिक शासन प्रणाली वाले हैं. यह तो स्पष्ट है कि सोवियत रूस लोकतंत्र की रीति से नहीं चलेगा. इसलिए जब वह कोई गलती करे तो उसे दोष देकर या उसकी आलोचना करके हम उसे नहीं बदल सकते .मैत्री भावना से समझा कर उसमें परिवर्तन की कोई आशा रखी जा सकती है. उन्हें उसी तरह समझाना ठीक है. क्या आपको ऐसा नहीं लगता ?

आप या हम लोकतंत्र की दृष्टि से कोई गलती करें, तब उसके विरुद्ध कड़ा रुख अपना कर ही उसे दुरुस्त किया जा सकता है. और तभी सोवियत संघ से कुछ कहने का हमारा अधिकार ज्यादा प्रभावकारी हो सकता है. क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि यही नीति व्यावहारिक है ?'

युवा राष्ट्रपति कैनेडी बुजुर्ग मोरारजी देसाई की बातों को ध्यान से सुन रहे थे. कैनेडी ने कहा कि ‘यदि यही बात हो तो हमें इस बारे में आपको कुछ नहीं कहना.’

याद रहे कि तब कैनेडी 44 साल के थे और मोरारजी देसाई 65 साल के. मोरारजी जवाहरलाल नेहरू मंत्रिमंडल के वित्त मंत्री थे. 1961 में दोनों की मुलाकात वाशिंगटन में हो रही थी. कैनेडी 1960 में राष्ट्रपति बने थे और 1963 में उनकी हत्या कर दी गई.

जॉन एफ केनेडी

जॉन एफ कैनेडी

प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू के कैनेडी से सद्भावपूर्ण संबंध नहीं थे. हालांकि जब चीन ने 1962 में भारत पर आक्रमण किया तो उसी राष्ट्रपति से जवाहर लाल नेहरू ने कई बार मदद मांगी थी. इस पृष्ठभूमि में मोरारजी देसाई कैनेडी से मिले थे. तब इस देश में सक्रिय मजबूत सोवियत लाॅबी यह प्रचार कर रही थी कि मोरारजी अमेरिका परस्त हैं.

मोरारजी देसाई ने उस मुलाकात में कैनेडी से यह भी कहा था, ‘हमें यह इच्छा तो अवश्य रखनी चाहिए कि उनकी (सोवियत संघ की) शासन प्रणाली भी लोकतांत्रिक हो जाए ,लेकिन जोर जबरदस्ती से ऐसा नहीं किया जा सकता. लोकतांत्रिक तरीके से हम अच्छी तरह काम करते रहें तभी उसके अच्छे परिणाम सामने आ सकते हैं. उनकी समझ में यह बात आ जाए कि हमारा व्यवहार अच्छा है , तभी उनमें कुछ परिवर्तन हो सकता है. क्या आप नहीं समझते कि उनके लिए यही सच्चा मार्ग है ?

ये भी पढ़ें : एक मामूली हैसियत से भारत के सबसे ऊंचे ओहदे पर पहुंचे राजेंद्र बाबू

कैनेडी से हुई उस बातचीत का जिक्र मोरारजी ने अपनी जीवनी ‘मेरे जीवन वृतांत’ में किया है. मोरारजी ने लिखा है कि ‘कैनेडी ने इस तथ्य को स्वीकार किया, ऐसा मुझे लगा.’

दुनिया के अन्य अनेक नेताओं के विपरीत मोरारजी के दिलो-दिमाग पर कैनेडी ने इस मुलाकात के बाद सकारात्मक छाप छोड़ी थी. मोरारजी देसाई के शब्दों में ‘कैनेडी बहुत विशाल दृष्टि वाले व्यक्ति थे. मेरे ऊपर उनका ऐसा असर पड़ा कि पूरी दुनिया में शांति स्थापना के लिए जो श्रम जरूरी हो, उसे करने को वे आतुर थे. अमेरिका की शक्ति का उपयोग वे दूसरे को दबाने के लिए नहीं ,बल्कि दूसरे देशों की रक्षा करने के लिए करना चाहते थे. सभी देश मिलजुल कर मित्रतापूर्वक रहें,यही उनकी आकांक्षा थी.’

इसीलिए जब चीन के बारे में बात चली तो मोरारजी ने कैनेडी से कहा कि मुझे लगता है कि चीन को यू.एन.ओ. में शामिल नहीं करने में भारी भूल हुई है. न सिर्फ मंत्री और प्रधानमंत्री के रूप में बल्कि सरकारी सेवक के रूप में भी मोरारजी देसाई ने अधिकतर मामलों में जो उचित समझा, वही कहा और किया.

सन 1930 में राज्य प्रशासनिक सेवा से इस्तीफा देने का भी कुछ ऐसा ही कारण था. मोरारजी ने अपने अंग्रेज बाॅस के गलत आदेश को मानने से इनकार कर दिया था. उससे दोनों के बीच तनाव बढ़ा. अंततः मोरारजी ने नौकरी से इस्तीफा दे दिया. फिर तो वे स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हो गए. यह घटना तब की है जब मोरारजी गोधरा में तैनात थे.

Mahatma Gandhi

जब वहां एक सांप्रदायिक दंगा हुआ तो एकपक्षीय रपट तैयार करने का मोरारजी देसाई पर ऊपरी दबाव पड़ा था. मोरारजी ने अपनी जीवनी में लिखा है कि ‘महात्मा गांधी ने जब से इस देश में असहयोग और सत्याग्रह का युग प्रारंभ किया, तभी से बहुत से अंग्रेज अफसर खासकर कांग्रेस के खिलाफ मुसलमानों को उकसाने और उनका पक्ष लेने में लगे थे.’

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
Jab We Sat: ग्राउंड '0' से Rahul Kanwar की रिपोर्ट

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi