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जन्मदिन विशेष: आज के दौर में क्यों बहुत याद आते हैं प्रेमचंद!

प्रेमचंद के लेखों को पढ़ने पर ऐसा लगता है जैसे वे अपने समय की नहीं हमारे समय की बात कर रहे हों

Updated On: Jul 31, 2018 07:23 AM IST

Piyush Raj Piyush Raj
कंसल्टेंट, फ़र्स्टपोस्ट हिंदी

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जन्मदिन विशेष: आज के दौर में क्यों बहुत याद आते हैं प्रेमचंद!

आज यानी 31 जुलाई को प्रेमचंद की 138वीं जयंती है. आम लोगों के बीच प्रेमचंद कहानीकार और उपन्यासकार के रूप में ही अधिक प्रसिद्ध हैं. साहित्य और प्रेमचंद में रुचि रखने वालों के अलावा बहुत कम ही लोग यह जानते हैं कि प्रेमचंद ने कई वैचारिक लेख भी लिखे हैं.

जिस तरह आज किसानों की आत्महत्या की खबरें सुनकर ‘गोदान’ के होरी, ‘प्रेमाश्रम’ या ‘सवा सेर गेंहूं’ की याद आती है या दलितों पर अत्याचार की खबर सुनकर ‘कफन’ और ‘ठाकुर का कुआं’ की याद आती है. ठीक उसी तरह उनके द्वारा लिखे गए लेखों को पढ़ने पर ऐसा लगता है जैसे प्रेमचंद अपने समय की नहीं हमारे समय की बात कर रहे हों.

प्रेमचंद के विचारों की ताकत

अक्टूबर 1931 में प्रेमचंद ने ‘हिंदू-मुस्लिम एकता’ नामक लेख लिखा था. इस लेख में प्रेमचंद लिखते हैं, ‘हमें अख्तियार है, हम गऊ की पूजा करें, लेकिन हमें यह अख्तियार नहीं है कि हम दूसरों को गऊ-पूजा के लिए बाध्य कर सकें. हम ज्यादा से ज्यादा यही कर सकते हैं कि गौमांस-भक्षियों की न्यायबुद्धि को स्पर्श करें.’

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अगर यह किसी को न बताया जाए कि यह किसने और कब लिखा तो ऐसा लगेगा कि यह पंक्ति आज के समय में गौरक्षा के नाम पर हो रही ‘मॉब लिंचिंग’ की घटनाओं के विरोध में किसी ने लिखी है. प्रेमचंद के विचारों की यही ताकत उन्हें आज के समय में भी मौजूं बनाती है.

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प्रेमचंद इस लेख में यहीं नहीं रुकते हैं बल्कि वे गौरक्षा और गौमांस के नाम पर हिंदू-मुस्लिम के बीच भेद पैदा करने वालों आईना भी दिखाते हैं. प्रेमचंद आम जनता को सावधान करते हुए लिखते हैं, ‘लेकिन आज कौल-कसम लिया जाए तो शायद ऐसे बहुत कम राजे-महाराजे या विदेश में शिक्षा प्राप्त करने वाले हिंदू निकलेंगे जो गौमांस न खा चुके हों. उनमें से कितने ही आज हमारे नेता हैं और हम उनके नामों पर जयघोष करते हैं.’

गौहत्या नहीं है हिंदू-मुस्लिम भेद की वजह 

इसी तरह गौहत्या के नाम पर हिंदू-मुस्लिम भेद को बेकार बताते हुए प्रेमचंद लिखते हैं, ‘फिर मुसलमानों में अधिकतर गौमांस वही लोग खाते हैं, जो गरीब हैं, और गरीब अधिकतर वही लोग हैं, जो किसी जमाने में हिंदुओं से तंग आकर मुसलमान हो गए थे. वे हिंदू समाज से जले हुए थे और उसे जलाना और चिढ़ाना चाहते थे. वही प्रवृत्ति उनमें अब तक चली आती है...इसलिए यदि हम चाहते हैं कि मुसलमान भी गौभक्त हों, तो उसका उपाय यही है कि हमारे और उनके बीच घनिष्ठता हो, परस्पर ऐक्य हो. तभी वे हमारे धार्मिक मनोभावों का आदर करेंगे.’ बहरहाल इस जाति-द्वेष का कारण गौ-हत्या नहीं है.’

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प्रेमचंद ने इस लेख में हिंदू-मुस्लिम के बीच द्वेष के कारणों को बताते हुए यह कहते हैं कि एक-दूसरे के प्रति गलतफहमियों की वजह से यह भेद है. वे इस द्वेष के लिए अप्रत्यक्ष रूप से अंग्रेज इतिहासकारों द्वारा फैलाए गए गलत इतिहास को दोषी बताते हैं. प्रेमचंद इस तरह के इतिहास का विरोध करते हुए हिंदू-मुस्लिम एकता के कुछ ऐतिहासिक उदाहरण देते हुए हैं, ‘असली हिंदू-मुस्लिम लड़ाई तो वास्तव में कभी हुई ही नहीं.’

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साझी विरासत के लेखक 

इसी तरह इस्लाम के तलवार के दम पर फैलने वाली बात को खारिज करते हुए इसके लिए हिंदू धर्म की जाति-व्यवस्था को दोषी ठहराते हुए प्रेमचंद लिखते हैं, ‘तलवार के बल से कोई धर्म नहीं फैलता, और कुछ दिनों के लिए फैल भी जाए, तो चिरजीवी नहीं हो सकता. भारत में इस्लाम के फैलाने के कारण ऊंची जातिवाले हिंदुओं का नीची जातियों पर अत्याचार था.’

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प्रेमचंद हमारी गंगा-जमुनी तहजीब के अगुआ साहित्यकार हैं. वे जितने हिंदी के हैं उतने ही उर्दू के भी. उन्होंने ‘ईदगाह’ और ‘रामलीला’ जैसी कहानियां लिखकर असली हिंदुस्तान की तस्वीर रखी है. जहां जात-पात और महजबी भेदभाव से ऊपर होकर इंसानियत को तरजीह दी गई है.

प्रेमचंद के लिए इंसानियत सबसे अहम है. प्रेमचंद हर धर्म के भीतर इसी की तलाश करते हैं. जहां उन्हें बुराई दिखती है वे उसका कड़ाई से बिना कोई मुरौव्वत के विरोध करते हैं जो उन्हें अच्छाई दिखती है उसकी जमकर सराहना भी करते हैं.

प्रेमचंद सिर्फ ऐसे कथाकार ही नहीं बल्कि ऐसे विचारक भी हैं जिनकी जरूरत हर तरह की सामाजिक बुराई के खिलाफ आवाज उठाने के दौरान शिद्दत से महसूस होती है.

(यह लेख पूर्व में प्रकाशित हो चुका है)

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