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जन्मदिन विशेष: जो पहलवान नहीं बन पाया, ‘कृष्ण’ बन गया

पद्म विभूषण पंडित हरि प्रसाद चौरसिया 79 साल के हो गए हैं

Shailesh Chaturvedi Shailesh Chaturvedi Updated On: Jul 01, 2017 03:15 PM IST

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जन्मदिन विशेष: जो पहलवान नहीं बन पाया, ‘कृष्ण’ बन गया

बांसुरी की आवाज गूंजती है, तो कृष्ण याद आते हैं. एक मीठी सी तान सुनाई देती है, तो लगता है कि अब इस माहौल से बाहर न आएं. जिस तरह भगवान कृष्ण के साथ बांसुरी की संगत याद आती है. उसी तरह आज के जमाने में जब भी बांस से बने इस छोटे से संगीत यंत्र का नाम लें, तो हरि याद आते हैं. हरि यानी हरि प्रसाद चौरसिया.

भगवान के बाद अगर अगला नाम किसी का आता हो, तो उसकी अहमियत समझी जा सकती है. उसकी मकबूलियत समझी जा सकती है. उसका विराट व्यक्तित्व समझा जा सकता है. अपना कला में उसकी महारत को समझा जा सकता है.

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शास्त्रीय संगीत से जुड़ाव न रखने वाले लोग भी हरि प्रसाद चौरसिया का नाम अच्छी तरह जानते हैं. अगर कोई बांसुरी पर तान छेड़ रहा हो, तो अक्सर सुनाई देता है कि खुद को हरि प्रसाद चौरसिया समझते हो क्या? इस तरह के ताने दरअसल, एक संगीतज्ञ के संगीत को मान्यता देने वाले ही हैं.

जो लोग फिल्म संगीत के शौकीन हैं, वो भी हरि से दूर नहीं रह सकते. संगीतकार शिव-हरि की जोड़ी के हरि यानी हरि प्रसाद चौरसिया. यश चोपड़ा की फिल्मों में शिव-हरि का संगीत कोई कैसे भूल सकता है. सिलसिला, चांदनी, लम्हे और तमाम फिल्में.

पहलवान पिता से छिपकर सीखी बांसुरी 

हरि प्रसाद चौरसिया का जन्म 1 जुलाई 1938 को उत्तर प्रदेश इलाहाबाद में हुआ था. पिता पहलवान थे. छह साल के थे, जब मां की मौत हो गई. पिता को लगा कि सौतेली मां पता नहीं इन बच्चों को वैसा प्यार दे पाएगी या नहीं. इसलिए शादी नहीं की. हरि पिता से छुपकर संगीत सीखते थे, क्योंकि पिता तो उन्हें पहलवान बनाना चाहते थे.

पिता का मानना था कि संगीत या तो राजाओं के दरबार में होता है या भीख मांगने के लिए गाया और बजाया जाता है. पिता बहुत सख्त रवैये वाले इंसान थे. कई बार हरि प्रसाद की बुरी तरह पिटाई भी हुई. कुछ समय उन्होंने अखाड़े में पहलवानी सीखी भी. लेकिन उनका मन संगीत से जुड़ चुका था. अपने दोस्त के घर में वो संगीत सीखते थे. हालांकि वो कहते हैं कि पहलवानी सीखने से जो ताकत आई और स्टेमिना बढ़ा, उसका फायदा बांसुरी बजाने में भी मिलता है.

अपने पड़ोसी पंडित राजाराम से हरि प्रसाद चौरसिया ने गायन सीखना शुरू किया. तब वो नौ साल के थे. पंडित जी को पता था कि हरि प्रसाद के पिता को संगीत पसंद नहीं है. इसलिए उन्होंने भी सब छुपा के रखा.

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ऐसे हुआ बांसुरी से प्यार 

15 साल की उम्र में हरि प्रसाद चौरसिया ने पहली बार रेडियो पर बांसुरी वादन सुना. उन्होंने एक इंटरव्यू में बताया कि उसी दिन उन्हें बांसुरी से प्यार हो गया. वो बांसुरी वादन पंडित भोलानाथ का था. हरि उनके घर पहुंचे. उनसे सीखने लगे. भोलानाथ जी शादी शुदा नहीं थे. उनके लिए अच्छा था कि एक शिष्य मिल गया, जो संगीत सीखने के बदले में सब्जी काट देता था और मसाला पीस देता था.

एक बार घर में वो बांसुरी बजा रहे थे. पिता ने सुन लिया. हरि प्रसाद ने बहाना बनाया कि वो तो सीटी बजा रहे थे. लेकिन सीटी बजाना पिता की नजर में और बड़ा गुनाह था. बुरी तरह पिटाई हुई.

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इस बीच उन्हें यूपी सरकार में नौकरी मिल गई, क्लर्क की. फिर ऑफर आया कटक रेडिया से स्टाफ आर्टिस्ट बनने का. वो दिन था, जब पिता को उनके संगीत प्रेम का पता चला. उनके लिए पहला सदमा था कि संगीत सीखा. दूसरा कि संगीत से कमाई करने जा रहा है. तीसरा, जिस पिता ने बच्चों की परवरिश के लिए दूसरी शादी नहीं की, उनको अकेला छोड़ा जा रहा है. पिता ने रोकने की कोशिश की. लेकिन हरि प्रसाद चौरसिया नहीं रुके.

फिल्मी सफर और अन्नपूर्णा देवी की शागिर्दी  

1957 में आकाशवाणी से जुड़े और कटक चले गए. वहां धीरे-धीरे उनकी लोकप्रियता बढ़ने लगी. पंडित जी के शब्दों में ही कहा जाए तो तमाम लड़कियां उन पर मरने लगीं. फिर हरि प्रसाद चौरसिया का ट्रांसफर कर दिया गया. वो मुंबई आ गए. तनख्वाह थी 250 रुपए महीना. मुंबई उन्हें पसंद नहीं आया, लेकिन मुंबई को वो पसंद आ गए. रेडियो पर उनका बांसुरी वादन फिल्म संगीतकार मदन मोहन और रोशन ने सुना. उन्हें फिल्मों के लिए काम मिलने लगा. फिर रेडियो छोड़ दिया.

पंडित हरि प्रसाद चौरसिया को अन्नपूर्णा देवी से भी शिक्षा मिली, जो बाबा अलाउद्दीन खां की बेटी और पंडित रवि शंकर की पत्नी थीं. बचपन में अलाउद्दीन खां ने उन्हें इलाहाबाद में बांसुरी बजाते सुना था. उन्होंने कहा था कि मैहर आ जाओ, मैं तुम्हें सिखाऊंगा. हरि प्रसाद ने पिता के डर से मना कर दिया. इस पर बाबा अलाउद्दीन खां ने कहा कि घर छोड़कर आना चाहो, तो भी आ जाओ, मैं पूरा ध्यान रखूंगा. अगर अभी नहीं आ सकते, बाद में आना चाहो, तो मेरे मरने के बाद भी मेरी बेटी से सीख सकते हो.

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ये बात हरि प्रसाद चौरसिया के दिमाग में थी. अन्नपूर्णा जी बंबई (अब मुंबई) में रहती थीं. वो सुरबहार बजाती थीं. फिल्मी संगीतकारों के लिए उनके दिमाग में अच्छी इमेज नहीं थी. हरि प्रसाद चौरसिया सीखने पहुंचे, तो उन्होंने मना कर दिया. घर से निकाल दिया. हरि प्रसाद दोबारा पहुंचे, तो पुलिस बुलाने की धमकी दी. तीन साल कोशिश के बाद वो तैयार हुईं. उन्होंने हरि प्रसाद से कुछ बजाकर सुनाने को कहा.

उन्होंने कहा कि सीखना है, तो जीरो से शुरू करना पड़ेगा. उन्हें अपनी गंभीरता साबित करने के लिए हरि प्रसाद चौरसिया ने दाएं के बजाय बाएं हाथ से बजाना शुरू किया. उसके बाद मानो हरि प्रसाद चौरसिया की जिंदगी बदल गई. अन्नपूर्णा जी उनके लिए गुरु ही नहीं, मां जैसी थीं.

ऐसे बनी शिव-हरि की जोड़ी 

शास्त्रीय संगीत के साथ-साथ हरि प्रसाद चौरसिया ने फिल्मों में भी संगीत दिया है. संतूर वादक पंडित शिव कुमार शर्मा के साथ उन्होंने जोड़ी बनाई शिव-हरि. यूथ फेस्टिवल में उनकी मुलाकात हुई थी. वो 50 का दशक था. उसके बाद 1961 में दोनों बंबई में मिले. उसके बाद यश चोपड़ा और शिव-हरि के साथ की कहानी हम सब जानते ही हैं.

हरि प्रसाद चौरसिया ने बांसुरी वादन को लोगों में फैलाने की पूरी कोशिश की है. मुंबई और भुवनेश्वर जैसी जगहों पर वृंदावन गुरुकुल है, जहां बांसुरी वादन सिखाया जाता है. पद्म विभूषण पंडित हरि प्रसाद चौरसिया 79 साल के हो गए हैं. उनकी बांसुरी की तान अब भी वैसा ही सम्मोहन पैदा करती है. शुक्र है, वो पहलवान नहीं बने. वरना संगीत दुनिया इस ‘आधुनिक कृष्ण’ से महरूम रह जाती.

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