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गीता दत्त: बड़े धोखे हैं इस राह में.... प्यार में जरा संभलना

पति गुरु दत्त के साथ वहीदा रहमान के अफेयर की खबर से गीता अवसाद में चली गई थीं

Shailesh Chaturvedi Shailesh Chaturvedi Updated On: Nov 23, 2017 09:04 AM IST

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गीता दत्त: बड़े धोखे हैं इस राह में.... प्यार में जरा संभलना

पंडित जसराज की एक दिलचस्प कहानी है. आजादी से पहले की बात है. कलकत्ता में रहते थे. मां बीमार थीं. डॉक्टर को घर बुलाना था. पैसे थे नहीं. घर आने के लिए डॉक्टर की फीस 15 रुपए थी. मजबूरी थी. पंडित जी ने डॉक्टर को बुला लिया. उनसे फीस की बात तो नहीं की. लेकिन इतना जरूर कहा कि आज शाम उनका रेडियो पर प्रोग्राम है. उसे सुनें. डॉक्टर की शास्त्रीय संगीत में कोई रुचि नहीं थी. उन्होंने कहा कि मुझे रुचि नहीं है. वैसे भी मैं शाम को व्यस्त हूं. मुझे अपनी भांजी के घर डिनर पर जाना है.

अगले दिन डॉक्टर फिर घर आया. उसके सुर बदले हुए थे. बहुत खुश था. डॉक्टर ने बताया कि भांजी के घर रेडियो बज रहा था. आपका गाना सुना, सबने बड़ी तारीफ की. इसका फायदा यह हुआ कि डॉक्टर ने 15 रुपए के बजाए फीस ली दो रुपए. डॉक्टर की भांजी का नाम था गीता रॉय. वही गीता रॉय जो आगे चलकर बनीं गीता दत्त. गुरु दत्त की पत्नी. मशहूर गायिका. बगैर जाने उन्होंने एक तरह से पंडित जसराज की मदद की.

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गीता दत्त या गीता घोष रॉय चौधरी या गीता रॉय थीं ऐसी आवाज, जिसे सुनकर लगता है कि गाना कितना आसान है. दरअसल, महानता की यह सबसे बड़ी निशानी है. किसी को अपना काम करते देखिए. अगर लगे कि यह बहुत आसान है, इसका मतलब काम कर रहे व्यक्ति को अपने काम में महारत हासिल है. उसने इसे इतना सहज बना दिया है कि हर किसी को एकबारगी लगता है कि इसे करना क्या मुश्किल है? यही गीता दत्त ने किया. उनके गीत आसान नहीं. लेकिन सुनकर लगता है, जैसे किसी ने यूं ही बैठे-बैठे कुछ गुनगुना दिया हो.

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तमाम रंगों में सिमटी है गीता दत्त की कहानी

गीता रॉय की कहानी में प्यार है, मैलोडी है, दुख है, दर्द है, धोखा है, पछतावा है... और आखिर में ऐसा अंत है, जो दुख के चरम से ही हो सकता है. गीता दत्त की कहानी आजादी और विभाजन से पहले शुरू होती है. 23 नवंबर 1930 को पूर्वी बंगाल में फरीदपुर के जमींदार परिवार में उनका जन्म हुआ था. फरीदपुर अब बांग्लादेश में है.

चालीस के दशक में परिवार जमीन-जायदाद छोड़कर कलकत्ता और असम आ गया. फिर बंबई शिफ्ट हो गए, जहां दादर में एक अपार्टमेंट ले लिया गया. गीता रॉय की मां अमिय देवी कवियत्री थीं. भाई मुकुल रॉय संगीतकार थे. गीता जी ने अपनी मां के लिखे और भाई के संगीतबद्ध गीतों को भी गाया है, जिसका रिकॉर्ड आया था. आज की पीढ़ी के लिए जानना जरूरी है कि उस वक्त सीडी नहीं होते थे. ग्रामोफोन हुआ करते थे, जिसमें एलपी रिकॉर्ड लगाया जाता था. रिकॉर्ड सीडी की तरह ही गोल होता था. लेकिन ये सीडी से बड़ा और काले रंग का होता था.

संगीतकार हनुमान प्रसाद ने गीता को गाते सुना. उन्होंने 1946 में रिलीज हुई फिल्म भक्त प्रह्लाद में गीता से दो लाइनें गाने के लिए कहा. वो दो लाइनें स्टूडियो में मौजूद हर शख्स को पसंद आईं. पहला बड़ा मौका मिला फिल्म दो भाई में. इस फिल्म का एक गाना मेरा सुंदर सपना बीत गया... जबरदस्त हिट हुआ. इसी साल उन्होंने हनुमान प्रसाद जी के लिए कुछ और गाने भी गाए.

गुरु दत्त से हुई दोस्ती और फिर शादी

गीता रॉय की यह खासियत सबको समझ आ गई कि वो भजन से रोमांटिक तक हर गाना ऐसे गाती हैं कि गीत का एक-एक भाव साफ समझ आता है. गुरुदत्त की फिल्म बाजी में उन्होंने गीत गाया तदबीर से बिगड़ी हुई तकदीर बना ले...

फिल्म 1951 में आई थी. गीता बाली पर पिक्चराइज इस गाने ने एक बार फिर  दिखाया कि गीता रॉय की रेंज क्या है. यही फिल्म थी, जहां गीता रॉय और गुरु दत्त की दोस्ती हुई. गुरु दत्त मंगलोर के थे. उनका पूरा नाम पहले वसंत और फिर गुरु दत्त शिवशंकर पादुकोण था. कलकत्ता में कुछ समय रहे थे. इसलिए बांग्ला आती थी और वहां की संस्कृति पसंद थी. दोनों की दोस्ती प्यार में तब्दील हो गई और दोनों ने 26 मई 1953 में शादी कर ली. अब गीता रॉय हो गईं गीता दत्त. इनके तीन बच्चे हुए. तरुण, अरुण और नीना.

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गीता दत्त के गानों की रेंज जानना बहुत जरूरी है. उन्होंने बांग्ला लोक संगीत पर आधारित फिल्म देवदास का गाना आन मिलो श्याम सांवरे गाया. सुजाता का नन्ही कली सोने चली हवा धीरे आना जैसी लोरी गाई. गीता रॉय और एसडी बर्मन की जोड़ी का कमाल सिर चढ़कर बोला. प्यासा में आज सजन मोहे अंग लगा लो... में बंगाली कीर्तन का रंग भरा गीता दत्त ने. दिल मुझे बता दे और वक्त ने किया क्या हसीं सितम भी इस जोड़ी के कमाल को दिखाता है. कागज के फूल का गीत वक्त ने किया कैफी आजमी ने लिखा था. इसके हर शब्द को उसका मतलब देने का काम गीता दत्त ने किया था. फिल्म बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह फेल हुई थी. इसने गुरु दत्त और गीता दत्त को आर्थिक और मानसिक रूप से तोड़कर रख दिया था.

वहीदा रहमान से अफेयर के चर्चे पर गुरु दत्त से बिगड़े रिश्ते

इन सबके बीच गुरु दत्त और वहीदा रहमान के अफेयर की चर्चा होने लगी थी. शादी में समस्याएं खड़ी हुईं. इसकी वजह से गीता दत्त के करियर पर बुरा असर पड़ा. गुरु दत्त उन्हें लेकर एक फिल्म बनाना चाहते थे, जिसका नाम था गौरी. उन्हें गायिका का रोल अदा करना था. कहा जाता है कि पति के अफेयर की खबर से वो इतना नाराज हुईं कि फिल्म पूरी करने से मना कर दिया. कुछ दिन की शूटिंग के बाद फिल्म आगे नहीं बढ़ पाई.

इसमें दूसरा पक्ष भी है. यह भी कहा जाता है कि अगर गुरु दत्त अवसाद का शिकार हुए, तो इसमें गीता दत्त के रवैये का असर था. इतने सालों के बाद नहीं बताया जा सकता कि क्या सही है. लेकिन जो भी गलत हुआ, उसने दो महान कलाकारों को हमसे छीन लिया.

उसी दौर में संगीतकार एसडी बर्मन और लता मंगेशकर के बीच मनमुटाव हो गया था. बर्मन दा चाहते थे कि गीता दत्त उनके गाने गाएं. लेकिन पारिवारिक समस्याओं का उनके गायन पर असर पड़ा. उस तरह वो गायकी पर ध्यान नहीं दे पाईं, जैसा एसडी बर्मन चाहते थे. बर्मन दा ने आशा भोंसले की तरफ रुख कर लिया.

1972 में गीता दत्त ने छोड़ दी दुनिया

बाकी संगीतकार भी उनकी अनुशासनहीनता से परेशान हो गए. वक्त देकर वो नहीं पहुंचती थीं. धीरे-धीरे लोग मुंह मोड़ते गए. 1964 में बेहद शराब पीने और नींद की गोलियां खा लेने की वजह से गुरु दत्त का निधन हो गया. इसे आत्महत्या मानने वालों की भी कमी नहीं है. कहा जाता है कि इसके बाद गीता दत्त नर्वस ब्रेकडाउन का शिकार हो गईं. तीन महीने तक गीता जी अपने बच्चों को नहीं पहचानती थीं. धीरे-धीरे स्वास्थ्य सुधरा, लेकिन आर्थिक तंगी थी. उन्होंने फिर से गाने की कोशिश शुरू की. लेकिन स्वास्थ्य संभला नहीं. 1972 में महज 41-42 साल की उम्र में उनकी मौत हो गई. इससे ठीक पहले उन्होंने बासु भट्टाचार्य की फिल्म अनुभव के लिए वो यादगार गाना गाया था- मेरा जां, मुझे जां न कहो मेरी जां....

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गीता दत्त का एक गीत है, जो उनकी जिंदगी की तरफ इशारा करता है. मजरूह सुल्तानपुरी ने फिल्म आरपार के लिए यह गीत लिखा था- बड़े धोखे हैं, इस राह में.. बाबूजी धीरे चलना, प्यार में जरा संभलना. यह फिल्म 1954 की है. यानी गाना रिकॉर्ड होने का समय शादी के बहुत आसपास रहा होगा. दोनों ने प्यार किया. तमाम लेखों को आधार बनाया जाए, तो दोनों को धोखे की शिकायत रही. लेकिन दोनों प्यार में संभले नहीं. शायद इसी का नतीजा रहा कि फिल्म जगह के दोनों महान कलाकारों को बहुत जल्दी और दुर्भाग्यपूर्ण हालात में दुनिया छोड़नी पड़ी.

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