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दुष्यंत कुमार: जिसने ग़ज़ल को सल्तनत के खिलाफ बयान बना दिया

दुष्यंत कुमार इमरजेंसी के दौर में सरकारी कर्मचारी होने के बावजूद ग़ज़लों को सरकारी विरोध के लिए इस्तेमाल करते थे.

Updated On: Sep 01, 2017 01:55 PM IST

Animesh Mukharjee Animesh Mukharjee

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दुष्यंत कुमार: जिसने ग़ज़ल को सल्तनत के खिलाफ बयान बना दिया

दुष्यंत कुमार अगर आज होते तो 84 साल के होते. मगर बड़ा सवाल ये है कि अगर आज वो होते तो क्या कह रहे होते? इमरजेंसी के दौर में जब बड़े लेखक और कवि सरकार की तारीफ में बिछे जा रहे थे. आकाशवाणी भोपाल का ये सरकारी कर्मचारी सीधे सरकार को निशाने पर रखकर ग़ज़लें कह रहा था. वो भी कुछ इस अंदाज़ में कि 'एक गुड़िया की कई कठपुतलियों में जान है, आज शायर यह तमाशा देखकर हैरान है'

इस शेर में गुड़िया तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के लिए है. इसी ग़ज़ल में दुष्यंत कह जाते हैं कि 'कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए, मैंने पूछा नाम तो बोला कि हिंदुस्तान है.'

अगर ये शेर आज कहा गया होता तो तय करना मुश्किल है कि ये दुष्यंत पहले ट्रोल होते, पहले उन पर टीवी चैनल विवादास्पद बयान का पैकेज करते या उन पर देशद्रोह का आरोप लगता.

खैर, दुष्यंत अपनी किताब ‘साए में धूप’ की 52 ग़ज़लों में जो कह गए वो मौजूं था है और रहेगा. शायद इसीलिए क्रांतिकारी होने का दावा करने के दौर में अरविंद केजरीवाल ‘हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए, इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए’' हर सभा में गाते थे.

हिंदी ग़ज़ल के पहले शायर

दुष्यंत हिंदी ग़ज़ल के पहले शायर कहे जाते हैं. ऐसा नहीं है कि दुष्यंत से पहले हिंदी में किसी ने ग़ज़ल नहीं कही. बलवीर सिंह रंग, गोपाल दास नीरज और सूर्यकांत त्रिपाठी निराला तक ने अलग-अलग नामों के साथ ग़ज़ल को हिंदी में लाने की कोशिश की थी, लेकिन इन सबकी मूल प्रवृत्ति उर्दू ग़ज़ल की तरह ‘माशूक की ज़ुल्फों के पेंचोखम सुलझाने’ की ही थी. जबकि भाषा के स्तर पर दुष्यंत कहीं से भी हिंदी के खेमे खड़े नहीं दिखते हैं.

उनका शेर पढ़िए ‘कहां तो तय था चरागां हर घर के लिए, कहां चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए’ चरागां दीपावली के लिए इस्तेमाल होने वाला फारसी शब्द है जो हिंदी वालों के लिए बिलकुल अनजाना है. साथ ही साथ इस पूरे शेर में कोई ऐसा शब्द नहीं जिसे हिंदी के चलन से जोड़ कर देखा जा सकता है. फिर सवाल उठता है कि दुष्यंत कैसे हिंदी ग़ज़ल के पुरोधा कहे जा सकते हैं?

दुष्यंत के बहाने ग़ज़ल में तीन बदलाव हुए इनसे जो नए किस्म की ग़ज़ल बनी वो हिंदी ग़ज़ल कहलाई. सबसे पहला बदलाव विषय का था. परंपरागत तबके के लिए ग़ज़ल का मतलब इश्क, मोहब्बत की बातें करना था. दुष्यंत की ग़ज़लों में समाज का दर्द और सत्ता से विद्रोह है. ये विद्रोह भी इतना तीखा है कि पढ़ने वाले को अंदर तक छीलकर रख देता है. सरकार की ज़्यादतियों के बाद भी उनका समर्थन करने वाली जनता के लिए कहा गया उनका शेर पढ़िए, ‘न हो कमीज़ तो घुटनों से पेट ढक लेंगे, ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफर के लिए.

दुष्यंत ने ग़ज़ल का सब्जेक्ट ही नहीं बदला, शेर-ओ-शायरी के रूपक भी बदल दिए. परंपरागत जहां ग़ज़लों में शमा के बाद परवाना और शीशे के बाद पत्थर आना लगभग तय होता है. दुष्यंत ग़ज़ल में गंगा और हिमालय जैसे प्रतीक इस्तेमाल किए. ये प्रतीक नए होने के साथ-साथ हिंदुस्तान की आत्मा से जुड़े हैं जिनका आप शब्दानुवाद नहीं कर सकते. जब वो पत्नी के लिए कहते हैं, ‘तुमको निहारता हूं सुबह से ऋतंबरा, अब शाम हो रही है मगर मन नहीं भरा’ तो ऋतंबरा के मेटाफर को समझने के लिए आपको हिंदी पट्टी की संस्कृति को समझना पढ़ेगा.

दुष्यंत के बाद हिंदी-उर्दू के लगभग सभी शायरों ने इसे बखूबी इस्तेमाल किया. अदम गोंडवी का शेर पढ़िए ‘गलतियां बाबर की थीं, तो जुम्मन का घर फिर क्यों जले’ पता चल जाएगा कि ये दुष्यंत की ही ज़मीन पर कही गई बात है. इसके साथ-साथ दुष्यंत ने ग़ज़ल कहने के लिए उर्दू स्क्रिप्ट आने की मजबूरी को खत्म किया. आज के समय में ऐसे बहुत से शायर हैं जो देवनागरी में ही ग़ज़ल कहते हैं.

सिर्फ ग़ज़ल नहीं कह गए दुष्यंत

मंच की लोकप्रियता भुनाने के लिए कई चर्चित कवि दुष्यंत को अक्सर ‘कठिन अतुकांत कविताओं के सामने सरल हिंदी में बात कहने वाला कहते हैं’. ये गलत है. दुष्यंत की भाषा सरल ज़रूर है मगर उनके कंटेंट में सिर्फ जनता को लुभाने वाली तुकबंदी नहीं है. साथ ही साथ दुष्यंत ने अपनी 42 साल की छोटी सी ज़िंदगी में ग़ज़लों से इतर कविताएं, नाटक, उपन्यास कहानियां बहुत कुछ लिखा.

‘सूर्य का स्वागत’ की उनकी कविताएं उस दौर की नई कविता के सभी मानकों पर खरी उतरती हैं. हालांकि इस बात में कोई शक नहीं कि ग़ज़लों ने दुष्यंत को उस मुकाम तक पहुंचाया जहां कई लोग कई-कई महाकाव्य लिखकर भी नहीं पहुंच पाते हैं.

2015 में आई फिल्म ‘मसान’ का एक गाना दुष्यंत के शेर से शुरू होता है, ‘तू किसी रेल सी गुज़रती है, मैं किसी पुल सा थरथराता हूं’ इस एक शेर से आगे की लिरिक्स वरुण ग्रोवर ने लिखी हैं और बहुत खूब लिखी हैं. लेकिन जिस ग़ज़ल से ये लिया गया है, उसका मतला (पहला शेर) दुष्यंत की ग़ज़लों की पूरी प्रवृत्ति को ज़ाहिर कर देता है, ‘मैं जिसे ओढ़ता बिछाता हूं, वो ग़ज़ल आपको सुनाता हूं.’

जाते-जाते दुष्यंत की प्रसिद्ध ग़ज़ल को सुनते जाइए-

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