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मनमोहन सिंह: क्या इतिहास पूर्व प्रधानमंत्री को लेकर नरम रहेगा?

पूर्व प्रधानमंत्री की चुप्पी ने उन्हें इतिहास के युगपुरुष के बजाय कमजोर प्रधानमंत्री का तमगा दिया जिसने कभी भी सच्चाई और इमानदारी के लिए आवाज नहीं उठाई.

Aparna Dwivedi Updated On: Sep 26, 2017 11:53 AM IST

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मनमोहन सिंह: क्या इतिहास पूर्व प्रधानमंत्री को लेकर नरम रहेगा?

मनमोहन सिंह ने एक बार कहा था कि इतिहास उनके साथ थोड़ी नरमी बरतेगा. ऐसे में यह जानना रोचक है कि अब मनमोहन सिंह को कैसे याद किया जा रहा है. उनके जन्मदिन पर उनके कामकाज पर एक नजर-

भारतीय अर्थव्यवस्था की गिरती हालत ने एक बार फिर पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की याद दिला दी. नोटबंदी के बाद उन्होंने चेतावनी दी थी कि इस कदम से देश की जीडीपी में लगभग दो फीसदी की गिरावट आएगी. जीडीपी ग्रोथ के ताजा आंकड़ों ने मनमोहन सिंह की बात सही साबित कर दी. इससे ये तो तय है कि मनमोहन सिंह एक अर्थशास्त्री हैं और देश की आर्थिक नब्ज को समझते हैं. लेकिन बावजूद इसके वो सफल प्रधानमंत्री के रूप में नहीं जाने जाते.

कौन हैं डॉ. मनमोहन सिंह?

पंडित जवाहर लाल नेहरू के बाद लगातार सबसे अधिक समय तक अगर कोई भारत का प्रधानमंत्री रहा है तो वे मनमोहन सिंह ही हैं. 2004 से 2014 यानी दस सालों तक वे देश के प्रधानमंत्री रहे. यह सम्मान सबसे शक्तिशाली मानी जानी वाली प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जी के खाते में भी नहीं है. हालांकि प्रधानमंत्री बनने से पहले उनकी पहचान एक सफल अर्थशास्त्री के रूप में थी.

भारत सरकार की वेबसाइट (PMIndia.gov.in) पर दिए परिचय के अनुसार ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के नेफिल्ड कॉलेज से मनमोहन सिंह ने डी. फिल की. उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय से अपना कामकाजी मुकाम एक शिक्षक के रूप में शुरू किया था. बाद में वे दो साल दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में भी पढ़ाया था. डॉ सिंह ने 1971 में वाणिज्य मंत्रालय में आर्थिक सलाहकार की भूमिका निभाई और महज एक साल में उन्‍हें वित्त मंत्रालय में मुख्य आर्थिक सलाहकार का दायित्व मिल गया था. तब देश में इंदिरा गांधी की सरकार थी.

1985 में राजीव गांधी के शासन काल में भारतीय योजना आयोग का उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया. 1990 में उनको प्रधानमंत्री का आर्थिक सलाहकार बनाया गया. जब पी वी नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री बने, तो उन्होंने मनमोहन सिंह को 1991 में अपने मंत्रिमंडल में सम्मिलित करते हुए वित्त मंत्रालय का स्वतंत्र प्रभार सौंप दिया. वर्ष 1991 से लेकर 1996 तक वह भारत के वित्त मंत्री रहे. अप्रैल 2004 में 72 वर्ष की आयु में वे प्रधानमंत्री बने. उनका कार्यकाल दस साल यानी 2014 तक चला.

आर्थिक सुधारों के जनक

एक अर्थशास्त्री के रूप में उन्होंने कई क्रांतिकारी फैसले लिए. 1991 में जब भारत जबरदस्त आर्थिक संकट से गुजर रहा था. भारत का सारा सोना गिरवी पड़ा था. देश का विदेशी पूंजी भंडार महज एक बिलियन यूएस डालर था. यह वह दौर था, जब भारत को अपना कर्ज उतारने के लिए आईएमएफ के सामने झुकना पड़ा था. उसी दौरान वित्त मंत्री के रूप में उन्होंने कई बड़े फैसले लिए.

भारत से लाइसेंस राज को खत्म कर उन्होंने व्यापार को बढ़ावा दिया. साथ ही उन्होंने उदारवादी अर्थव्यवस्था को अपनाने की घोषणा की. भारत में विदेशी निवेश को बढ़ाने के उपायों के साथ-साथ उन्होंने कई और बड़े निर्णय किए. इसकी बदौलत भारत में विदेशी कंपनियों ने निवेश किया, जिससे देश की आर्थिक हालत में सुधार हुआ. भारत के सुधरते आर्थिक हालतों की बदौलत देश की आईएमएफ से निर्भरता भी कम हुई और भारत में रोजगार के साधन में बढोतरी हुई.

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का पहला कार्यकाल

वर्ष 2004 में जब कांग्रेस सबसे बड़े दल के रूप में एक बार फिर उभरी, तब 22 मई 2004 को उन्होंने देश के पहले सिख प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली थी. प्रधानमंत्री पद पर आसीन होने के बाद उन्होंने आर्थिक सुधारों की राह जारी रखी. वर्ष 2008 में जब विश्व की बड़ी-बड़ी अर्थव्यवस्थाएं दिवालियापन की स्थिति में आ गई थीं और बड़े-बड़े बैंक दिवालिया हो गए थे, उस समय भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूती से खड़ी रही.

ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार मुहैया कराने के लिए मनरेगा योजना शुरू की गई. वर्ष 2007 में उनके प्रधानमंत्री पद पर रहते हुए भारत ने नौ फीसदी की जीडीपी वृद्धि दर हासिल की. ऐसा करने वाला भारत दुनिया का दूसरा देश था. कल्याणकारी योजनाओं में भी उनका नाम रहा. उन्होंने किसानों के लिए 80 हजार करोड़ रुपए के कर्ज माफ किए थे. उनके शासन काल में लोगों को सूचना का अधिकार (आरटीआई) जैसे अधिकार मिले और फिर बाद में खाद्य सुरक्षा, उचित मुआवजा और पुनर्वास का अधिकार जैसे कानून उनके प्रधानमंत्री रहते हुए लागू हुए.

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देश में ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए मनमोहन सिंह अमेरिका के साथ परमाणु समझौता किया. ये वो समय था जब सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे वामपंथी दलों के इस मुद्दे पर समर्थन वापस ले लिया लेकिन सिंह इस पर अडिग रहे और इसमें सफलता हासिल की थी. लेकिन ये मुकाम उन्हें अपने दूसरे कार्यकाल में नहीं मिला. जानकार मानते हैं कि प्रधानमंत्री के तौर पर उनका पहला कार्यकाल उनके दूसरे कार्यकाल के मुकाबले बहुत अच्छा था.

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का दूसरा कार्यकाल

अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री के दूसरे कार्यकाल के दौरान महंगाई ने देश को झकझोरकर रख दिया. दूसरे कार्यकाल के दौरान प्रधानमंत्री पहले की तरह साहसिक निर्णय लेते नजर नहीं आए. दूसरे कार्यकाल के दौरान 1.76 लाख करोड़ रुपए के टू जी स्पैक्ट्रम आवंटन और इससे कहीं अधिक राशि के कोयला ब्लॉक आवंटन घोटाले ने डॉ. सिंह के प्रथम कार्यकाल के दौरान अर्जित सफलताओं को बट्टा लगाया. महंगाई के लगातार बढ़ने से भी वे लगातार विपक्ष के निशाने पर रहे. अर्थव्यवस्था की हालत यह है कि वह 2006-07 के 9.6 प्रतिशत की तुलना में 2012-13 में आधे से भी कम 4.5 प्रतिशत रह गई.

दूसरे कार्यकाल में वो कमजोर प्रशासक के रूप में ज्यादा नजर आए. कोयला मंत्रालय उनके अंतर्गत रहते हुए उसी विभाग में हुए घोटालों को रोक पाने में वे बुरी तरह नाकाम साबित हुए. आज भी लोग यह मानते हैं कि उस समय लगातार सामने आ रहे घोटालों में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भले ही खुद शामिल नहीं रहे हों लेकिन उन्होंने इन्हें रोकने के लिए कोई तत्परता भी नहीं दिखाई. कुछ लोग इसके लिए उनके राजनीतिज्ञ नहीं होने को जिम्मेदार ठहराते हैं तो कुछ लोग इसे सोनिया गांधी और गठबंधन राजनीति का दबाव मानते हैं.

लेकिन उठे हैं बहुत से सवाल

पर उनके धुरविरोधी सवालिया निशान लगाते हैं कि क्या मनमोहन सिंह सचमुच इतने निरीह और अनजान थे? टू जी स्पेक्ट्रम, कोयला खान आवंटन घोटालों, हेलीकॉप्टर खरीदी में भ्रष्टाचार के आरोप आने पर क्या कभी उन्होंने दबावों के विरुद्ध और सामूहिक उत्तरदायित्व के नाते अपनी नाराजगी के साथ इस्तीफा देने की पेशकश की? हर बड़े फैसले के समय मंत्रिमंडल की बैठक में उन्होंने कभी कोई आपत्त‌ि क्यों नहीं व्यक्त की? यदि वो कांग्रेस पार्टी के शीर्ष नेताओं और सलाहकारों से भयभीत थे तो प्रधानमंत्री के शक्तिशाली पद पर रहते हुए उन्होंने कभी कोई असहमति व्यक्त क्यों नहीं की?

दिलचस्प बात ये है कि मनमोहन सिंह और उनके समर्थक सलाहकार अपने दस साल के कार्यकाल की आर्थिक सफलताओं को गौरव के साथ गिनाते हैं, लेकिन गड़बडियों और घोटालों की गूंज होने पर मासूमियत से मौन हो जाते हैं.

कांग्रेस में अब भी उनकी पहचान सोनिया गांधी के विश्वस्त पढ़े-लिखे नेता की ही है. राजनीतिक मामलों या फैसलों में पार्टी न उन्हें प्रधानमंत्री बनने से पहले शामिल करती थी और न ही प्रधानमंत्री पद से हटने के बाद उन्हें शामिल करना चाहती है. लेकिन जिस तरह से कांग्रेस अपनी राजनीतिक निर्णय प्रक्रिया में दस सालों तक देश के प्रधानमंत्री रहने वाले व्यक्ति को भूल गई है, क्या वैसे ही इतिहास भी मनमोहन सिंह को भूल गया है?

A worker installs hoarding at Congress party's headquarters in Jammu

साल 2014 में जनवरी में एक पत्रकार वार्ता में डॉ. मनमोहन सिंह ने कहा था कि मेरा मूल्यांकन इतिहास करेगा. उनके साथ रहे मीडिया सलाहकार संजय बारू ने प्रधानमंत्री की तुलना भीष्म पितामह से की है, जिन्होंने सिंहासन की रक्षा करने की अटूट शपथ ली थी. उनका कहना था कि राजवंश के प्रति बेलौस वफादारी किसी राजतंत्र में भीष्म पितामह का दायित्व रही होगी, लेकिन मनमोहन के लिए यह बहुत खतरनाक भूल साबित हुई. महान उदारवादी से वे घोटालों से घिरे कमजोर और कठपुतली प्रशासक बन गए, जिसने अपनी और सर्वशक्तिमान प्रधानमंत्री कार्यालय की साख डुबो दी.

सफल अर्थशास्त्री लेकिन कमजोर प्रशासक

इतिहास उन्हें एक सफल अर्थशास्त्री के रूप में देखेगा लेकिन साथ ही एक ऐसे राजनेता के रूप में भी देखेगा जिसने निजी तौर से कभी भी खतरा नहीं उठाया. फिर चाहे वो 2009 में लोकसभा चुनाव में चुनाव ना लड़ना या फिर अपने साथियों और मातहतों की गड़बडियों पर नकेल कसना.

डॉ सिंह के काम के तरीके से हमें यही लगता था कि वो सोनिया गांधी के लिए काम कर रहे हैं और इसी लिए वो 10 जनपथ से लिए गए फैसले का ना विरोध करते थे और न ही खुद को जवाबदेह मानते थे. उन्हें कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व से उम्मीद थी कि वो उनकी सरकार के दागियों पर कार्रवाई करेगा. इसी तरह वे सहयोगी दलों से चाहते थे कि वे अपने दागियों से निबटें. लेकिन देश के सबसे शक्तिशाली पद पर बैठने के बावजूद सार्वजनिक तौर से विरोध का एक शब्द भी उनके मुंह से नहीं निकला.

सबसे बड़ा सवाल ये भी है कि जब उन्हें यह एहसास हो गया था कि अपनी सरकार पर उनका नियंत्रण नहीं रहा तो उन्होंने इस्तीफा क्यों नहीं दिया? कांग्रेस के प्रति निष्ठा या सोनिया से किए वादे से ऊपर उठने की उनकी नाकामी भी तो काम नहीं आई. न ही उसे पुरस्कृत किया गया. उनकी चुप्पी ने उन्हें इतिहास के युगपुरुष के बजाय कमजोर प्रधानमंत्री का तमगा दिया जिसने कभी भी सच्चाई और इमानदारी के लिए आवाज नहीं उठाई. एक ऐसे व्यक्ति जो निजी तौर पर बहुत ही सच्चे व्यक्ति थे लेकिन प्रधानमंत्री के तौर पर कमजोर और शक्तिहीन प्रशासक साबित हुए.

( लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं )

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