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बर्थडे स्पेशल क्रिस्टोफर नोलन: सात साल की उम्र में ही पकड़ा था कैमरा

क्रिस्टोफर नोलन, एक ऐसा नाम जिसने बचपन में ही खुद को पहचान लिया था

Updated On: Jul 30, 2017 10:43 AM IST

Ankit Pathak

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बर्थडे स्पेशल क्रिस्टोफर नोलन: सात साल की उम्र में ही पकड़ा था कैमरा

दुनिया के महान फिल्मकारों में शुमार क्रिस्टोफर नोलन का आज जन्मदिन है. जन्मदिन के बहाने हम उनके सिनेमाई जीवन के कुछ अनछुए पहलुओं को आपके सामने रख रहे हैं जिसे पढ़कर आप उनकी फिल्में और मजे के साथ देखेंगे.

नोलन का बचपन और फिल्में

क्रिस्टोफर नोलन, एक ऐसा नाम जिसने बचपन में ही खुद को पहचान लिया था. सात साल की उम्र में विज्ञापन कंपनी में काम करने वाले अपने पिता के ‘सुपर 8’ कैमरे से नोलन ने फिल्में बनाना शुरू कर दिया था. नोलन के चाचा जो ‘नासा’ में काम करते थे, उन्होंने नोलन को ‘अपोलो’ रॉकेट लॉन्चिंग की फुटेज दी थी जिसे काट-छांट और रिफिल्मिंग करके नोलन ने ‘स्पेस वार्स’ नाम की एनीमेटेड फिल्म बनाई. अब तक फिल्मों का कीड़ा नोलन को काट चुका था. अपनी उम्र के ग्यारहवें साल तक नोलन एक पेशेवर फिल्मकार बनने की राह पर चल पड़े थे.

कॉलेज के दिन, पढ़ाई, प्यार और फिल्में

नोलन ने यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन में प्रवेश ही इसलिए लिया क्योंकि वहां फिल्म बनाने की सुविधाएं थीं. नोलन को उन्नीसवें साल कॉलेज में ही एक खूबसूरत दोस्त मिली ‘एम्मा थॉमस’ जो आगे चलकर उनकी जीवनसाथी बनीं. दोनों कॉलेज से ही फिल्मों में बराबर रुचि लेते थे. वे साथ-साथ ‘यूनियन फिल्म सोसायटी’ के सदस्य भी थे. उन्होंने मिलकर ‘यूनिवर्सिटी फिल्म क्लब’ के उपकरणों के जरिए ‘टारंटेला’ और ‘लार्सेनी’ जैसी शार्ट फिल्में बनाईं. नोलन ने यहीं पर सीखा कि कोई कहानी कितनी तरह से कही जा सकती है. अंग्रेजी साहित्य में ग्रेजुएट नोलन की फिल्मों में स्टोरीटेलिंग का अंदाज ही आगे चलकर उनकी पहचान बन गया.

संघर्षों के बीच पहली फिल्म ‘फॉलोइंग’

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फॉलोइंग के एक दृश्य में एक्टर जेरेमी थियोबाल्ड

कॉलेज पूरा होने के बाद नोलन के फिल्म करियर में संघर्षों और चुनौतियों का दौर शुरू हो गया. उन्होंने स्क्रिप्ट रीडिंग से लेकर कैमरा ऑपरेटर और कई कंपनियों के लिए विडियो, फिल्म्स निर्देशित करने का काम किया. उनके प्रोजेक्ट्स लगातार फेल होते गए, उन्हें जगह-जगह से रिजेक्शन लेटर मिलता रहा लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी.

लंदन में रहने के दौरान उनकी जिंदगी के अनुभव ही उनकी पहली फिल्म ‘फॉलोइंग’ का जरिया बने. नोलन की पहली फिल्म मात्र तीन हजार यूरो में बनी. इसकी शूटिंग साल भर के शेड्यूल में केवल वीकेंड्स पर होती थी, जिसमें शूटिंग के पहले रिहर्सल किया जाता था जिससे शॉट को एक या दो टेक में ही पूरा कर लिया जाय. इसमें नोलन की मित्रमंडली ही अभिनय करती थी. उनके कॉस्टयूम रोजाना पहने जाने वाले ड्रेस ही होते थे. शूटिंग के दौरान नोलन अपनी मां के हाथ का बना सैंडविच खाकर काम चला देते थे. ‘फॉलोइंग’ एक बेरोजगार नवयुवक लेखक की कहानी कहती है जो अपनी किताब के लिए अपराध की दुनिया में जाने को मजबूर होना पड़ता है.

तीन हजार यूरो से साढ़े चार मिलियन डॉलर की छलांग

नोलन ने ‘फॉलोइंग’ का निर्देशन क्या किया, उनके दिन बहुर गए. फिल्म समीक्षकों ने नोलन के फिल्मक्राफ्ट की जमकर तारीफ की. फिल्म नुआर (Film Noir) का नया दौर शुरू हो गया था. यहां तक कहा गया कि नोलन की फिल्मों में ‘हिचकॉक’ के क्लासिक्स की आहट है. इस फिल्म से उनका कद इतना बढ़ गया कि न्यू मार्केट ने उनकी दूसरी फिल्म ‘मेमेंटो’ के लिए साढ़े चार मिलियन डॉलर का बजट दिया.

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पहली फिल्म में जहां उनके साथ उनकी पत्नी और कुछ दोस्त थे वहीं इस फिल्म में सौ से अधिक क्रू मेंबर थे. यहीं से नोलन की गाड़ी चल निकली, उन्हें वार्नर ब्रदर्स ने उनकी तीसरी फिल्म ‘इनसोम्निया’ के लिए 46 मिलियन डॉलर का बजट दिया. आगे चलकर उनकी पत्नी एम्मा थॉमस उनकी अनिवार्य प्रोड्यूसर बन गईं. उनकी फिल्में कमाई का रिकॉर्ड बनाने लगीं और फिल्म पुरस्कारों में नवाजी जाती रहीं.

नोलन की फिल्में और सिनेमाई विविध पक्ष

नोलन के फिल्मों में विषय का चयन उनकी अपनी सोच का प्रतिबिम्ब है. वे खुद को एक्स्प्लोर करते हुए क्राइम ड्रामा से लेकर, मिस्ट्रीज, साइंस फिक्शन, थ्रिलर, सुपरहीरो फिल्म और युद्ध फिल्मों तक आते हैं. उनकी फिल्में इंसानी जीवन के फलसफों को अपनी पटकथाओं में शामिल करती हैं. जिस तरह इंसान अपने जीवन में तमाम दुविधाओं से दो चार होता है और अनिर्णय की स्थिति में रहता है उसी तरह नोलन की फिल्मों के किरदार भी, उनकी फिल्में सवाल उठाती हैं, जिसके कंक्रीट जवाब देने की कोशिश नहीं करती.

‘याद्दाश्त’ नोलन की फिल्मों का अनिवार्य हिस्सा है

‘मेमेंटो’ का नायक अम्नेसिया से जूझ रहा है. अपनी याद्दाश्त की सीमाओं के इर्द-गिर्द वह अपनी पत्नी की मृत्यु का बदला लेना चाहता है. नोलन की रुचि यह दिखाने में ज्यादा है कि याद्दाश्त काम कैसे करती है? यह शेप कैसे होती है? इसका सृजन कैसे होता है? जिन्हें हम ‘रियलिटी’ कहते हैं, वह कैसे इन यादों और धारणाओं का परिणाम होती हैं?

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नोलन की ‘इंसेप्शन’ का नायक यादों को किसी और के अवचेतन में डालकर स्वप्नों की एक दुनिया रचता है जिसमें वह अपनी जिंदगी के सवालों को सुलझाने की कोशिश करता है. ‘डार्क नाइट ट्रियोलजी’ के नायक को अपने माता-पिता के मर्डर से जुड़ी यादें तड़पाती हैं और अपराध की दुनिया खत्म करके न्यायपूर्ण और नैतिक दुनिया के लिए प्रेरित करती हैं.

‘टाइम’ नोलन की अपनी घड़ी का होता है

नोलन की फिल्में ‘टाइम’ के साथ खेलती और छेड़छाड़ करती नजर आती हैं. वे फिल्मों के स्थापित पैटर्न ‘बिगिनिंग’, ‘मिडिल’ और ‘इंड’ को नहीं मानते. उनकी फिल्मों में एक साथ कोई दो दृश्य ऐसे भी हो सकते हैं जो एक-दूसरे को फॉलो न करते हों. जैसे फिल्म ‘मेमेंटो’ में दो ट्रैक एक साथ चलते हैं जिसमें एक कहानी आगे की ओर चलती है और दूसरी पीछे की ओर.

यहां फिल्मकार और दर्शक के बीच कहानी ‘टाइम’ के झूले में नृत्य करती प्रतीत होती है. ‘समय’ के साथ नए तरीके का ट्रीटमेंट नोलन की हालिया फिल्म ‘डन्कर्क’ में देखने को मिलता है. इसमें समय के तीन स्तर देखने को मिलते हैं और दो चरित्रों के लिए समय अलग-अलग तरह से आगे बढ़ता है.

सिनेमाई मसीहा का निर्माण और बैटमैन

नोलन की बैटमैन सीरीज सिनेमाई मसीहा के निर्माण का उदाहरण मात्र है. अस्तित्व संकट से जूझ रहे समाज पर जब जब खतरा मंडराया है कोई न कोई महानायक पैदा हुआ है. गीता की सूक्ति चरितार्थ हर देश काल में हुई- ‘यदा यदा हि धर्मस्य...’! नोलन की डार्क नाइट ट्रियोलजी इसी लॉजिक का परिणाम है कि गोथम शहर को वहां के नागरिक नहीं, वहां की लाचार हो चुकी कानून व्यवस्था नहीं बल्कि ‘बैटमैन’ आकर बचाएगा.

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इस तरह के सुपरहीरोज हॉलीवुड ही नहीं बल्कि आज दुनियाभर के सिनेमा का हिस्सा बन चुके हैं. पॉपुलर सिनेमा इसी तरह समस्याओं का निदान करता है और हर समाज को किसी मसीहा के हवाले कर देता है. चूंकि सिनेमाई और राजनीतिक विमर्श ओवरलैप करते हैं इसलिए यह मसीहावाद राजनीति में भी देखा जाता है.

सिनेमेटिक एडवांसमेंट और नोलन की विशिष्टता

नोलन की फिल्में एक खास तरह की ‘अर्बन सेटिंग’ में फिल्माई जाती हैं. वे फिल्मों में नए तरह के प्रयोगों के लिए जाने जाते हैं. नोलन कहते हैं कि फिल्म को एक ‘कॉम्लेक्स आर्ट फॉर्म’ समझा जाय. इसलिए वे जितनी रुचि फिल्म की कहानी को शेप करने में लेते हैं उतना ही स्क्रीनप्ले, साउंड और फिल्म के अन्य हिस्सों में.

इन सब से ज्यादा नोलन की फिल्मों का संवाद और उनका साउंड ट्रैक कहानी का अभिन्न हिस्सा रहता है. खासकर फिल्म ‘डार्क नाइट’ में. फिल्म ‘इंटरस्टेलर’ की थियेटर स्क्रीनिंग के समय साइनबोर्ड लगाए गए थे जिसमें लिखा था- ‘फिल्म के संवाद न समझ आएं तो नोलन से शिकायत करिए, थियेटर के उपकरण ठीक काम कर रहे हैं.'

लेकिन नोलन ने कम से कम संवादों का सहारा लेकर ‘डन्कर्क’ बनाई जिसमें बंदूक और हवाई जहाज की आवाज एक तरह का संवाद रचती हैं. वे ‘सिनेमा वेरिते’ तकनीक का प्रयोग सिनेमेटिक रियलिटी को और ज्यादा ‘रियल’ बनाने के लिए करते हैं.

समय और समाज के साथ अपनी फिल्मों के जरिए संवाद करने वाले क्रिस्टोफर नोलन को हम आज उनके जन्मदिन पर बधाई देते हैं और उनकी हालिया फिल्म ‘डन्कर्क’ देखने चलते हैं.

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