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बहादुर शाह ज़फर: क्या दो गज जमीन की तमन्ना कभी पूरी होगी?

क्या हम उनके अवशेष रंगून से दिल्ली लाकर उनकी इस बदनसीबी को दूर नहीं का सकते? जरूर ऐसा कर सकते हैं, लेकिन इसके लिए देशभर से मांग उठनी चाहिए

Updated On: Oct 24, 2017 12:08 PM IST

Nazim Naqvi

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बहादुर शाह ज़फर: क्या दो गज जमीन की तमन्ना कभी पूरी होगी?

देश की राजधानी दिल्ली में, महरौली के इलाके से कौन वाकिफ नहीं. इसे मिहरावली भी कहा जाता था जो गुर्जर सम्राट मिहिरभोज का निवास-स्थान कहलाता था. यही महरौली, जो कभी हिंदू राजाओं की राजधानी था, सल्तनत वंश के शासकों की राजधानी के रूप में भी याद किया जाता है.

इसी महरौली में 'बख्तियार काकी की दरगाह भी है. बख्तियार काकी मोईनुद्दीन चिश्ती (अजमेर वाले) के सबसे प्रिय शिष्य थे और बाबा फरीद के गुरु भी. दिल्ली के हजरत निजामुद्दीन औलिया, बाबा फरीद के शिष्य थे. कुल मिलाकर हिंदुस्तान की सूफी परंपरा के लिए 'महरौली की दरगाह' का एतिहासिक महत्व है.

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इन्हीं बख्तियार काकी की दरगाह में, मुग़ल बादशाह और भारत के स्वतंत्रता-संग्राम के पहले नायक 'बहादुर शाह ज़फर' ने अपनी कब्र के लिए एक जगह का चुनाव किया था. वो जगह आज भी खाली पड़ी है. 1862 में ज़फर की मृत्यु, रंगून में हुई और उन्हें वहीं दफना दिया गया. और वह जगह जिसे ज़फर ने अपनी आखिरी आरामगाह के तौर पर चुना था, 155 साल बाद, आज भी खाली पड़ी है.

The grave spot Zafar earmarked for himself

बख्तियार काकी की दरगाह में खाली पड़ी जगह

शायद इस इंतजार में कि आजाद भारत की लोकतांत्रिक सरकार जब स्वाधीनता-संग्राम के वीरों को याद करेगी तो, हो सकता है कि उस संग्राम के नायक, बहादुर शाह ज़फर की उस ख्वाहिश को पूरा करने का जज्बा भी उसमें पैदा हो और उनके अवशेष रंगून से लाकर दिल्ली की उस दो गज जमीन के सुपुर्द किये जाएं.

ब्रिटिश शासकों को भी बहादुर शाह जफ़र की इस वसीयत का पता था लेकिन उसने अपने शासन-काल में इस बात को तरजीह इस लिए नहीं दी तो सिर्फ इसलिए कि वह भारतीय जनता के दिमाग से भारत की आजादी के इस प्रतीक को मिटा देना चाहते थे.

लेकिन आश्चर्य तो ये है कि 1947 के बाद भी भारतीय लोकतांत्रिक सरकारों ने कभी भी इस मुद्दे को नहीं उठाया. ऐसे में यह सवाल तो पैदा होता ही है कि आखिर इस मुद्दे को सियासी-दलों, नागरिक संगठनों या मीडिया ने कभी कोई तरजीह क्यों नहीं दी?

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दरअसल बहादुरशाह ज़फर सिर्फ एक बदनसीब मुग़ल बादशाह ही नहीं थे जिसकी सल्तनत, उनके जीवन-काल में, सिर्फ शाहजहानाबाद तक सीमित थी, बल्कि वह उन हिंदुस्तानियों की उस एकता का प्रतीक थे जो धार्मिक आधार पर विभाजित नहीं थी.

मेरठ की छावनियों पर कब्ज़ा करके दिल्ली की तरफ कूच करने वाले और बहादुर शाह ज़फर को अपना नायक मानने वाले, विद्रोही, जो ब्रिटिश-भारतीय सेना का हिस्सा थे, उनमें ज्यादातर हिंदू सैनिक थे और उन्हें ज़फर को सम्राट के रूप में घोषित करने में कोई संकोच नहीं था.

1857 revolt in india

प्रतीकात्मक तस्वीर

विदेशी औपनिवेशिक शक्ति के खिलाफ संघर्ष में, विभिन्न धर्मों के लोगों की यह एकता अपने आप में पहली मिसाल थी. इसका अंदाजा ब्रिटिश राजनेताओं को भी था जिसमें विपक्ष की भूमिका निभाने वाले तत्कालीन नेता, बेंजामिन डिज़रायली भी शामिल थे.

1857 का वह संग्राम, किसी धर्म या मज़हब की बुनियाद पर नहीं हुआ था. यह संग्राम, साझा आकांक्षाओं के लिए आम-संघर्ष था जिसमें हर धर्म के लोग शामिल थे.

यह वह धर्मनिरपेक्षता नहीं थी जहां समुदाय, एक-दूसरे को 'बर्दाश्त' करने, या एक-दूसरे को बाहरी तौर पर अपनाने का दिखावा करते हैं. इसी सकारात्मक धर्मनिरपेक्षता के नायक का नाम है बहादुर शाह ज़फर. क्या हमें अपने उस प्रतीक को देश में वापस लाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए?

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बहादुर शाह ज़फर के अलावा, बर्मा या रंगून के साथ हमारा एक और रिश्ता है. यह रिश्ता भी औपनिवेशिक यातनाओं से जुदा हुआ है. 7 अक्टूबर 1858 को सुबह चार बजे, एक बैलगाड़ी पर बहादुर शाह ज़फर की सवारी रंगून (यांगून) के लिए रवाना हुई. उसी तरह बर्मा के राजा रत्नागिरी को भी ब्रिटिश शासकों ने कैदी बनाया और उन्हें निर्वासन के लिए महाराष्ट्र लाया गया.

रंगून में चार साल बाद बहादुर शाह ज़फर की मौत (1862) हुई. उसी तरह रत्नागिरी की मृत्यु भी महाराष्ट्र में हुई. हाल ही में म्यांमार के अधिकारियों ने अपने राजा के अवशेष लौटाने की मांग भारत से की थी.

क्या हमें भी ऐसी ही मांग नहीं करनी चाहिए. इसके लिए किसी लंबी-चौड़ी रुपरेखा बनाने की जरूरत नहीं है. इसके लिए बस इतना करना है कि रंगून में बनी उनकी कब्र से एक मुट्ठी मिट्टी को लाया जाय और उस खली पड़ी जगह की मिट्टी में मिला दिया जाय.

2013 में इस तरह की एक मुहीम की शुरुआत वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नय्यर, सईद नकवी और पूर्व-जस्टिस राजेंद्र सच्चर ने मिलकर की थी. लेकिन इस बार भी बदनसीबी ने ज़फर का साथ नहीं छोड़ा. देश की सत्ता बदल गई और फिर इस मांग को नई सरकार के सामने लाने की कोई कोशिश नहीं हुई.

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हालांकि 2013 में जब यह मांग की गई थी तो वर्तमान विदेश-मंत्री सुषमा स्वराज ने इसका स्वागत किया था. पिछले दिनों प्रधानमंत्री मोदी जब म्यांमार की अपनी यात्रा पर गए तो उन्होंने भी बहादुर शाह ज़फर की समाधी पर जाकर अपनी श्रद्धांजलि दी थी.

Modi at Bahadur Shah zafar's Mazar in Myanmaar

हम आज फिर, बहादुर शाह ज़फर की 242वीं सालगिरह के मौके पर, भारत की विदेश मंत्री से क्या ये फरियाद नहीं कर सकते हैं कि वह आगे आकर भारत के स्वाधीनता संग्राम के उस पहले नायक की आखिरी ख्वाहिश को पूरा करें. बहादुर शाह ज़फर जो बादशाह होने के साथ ही साथ एक शायर भी थे, ने अपनी इस ख्वाहिश का इजहार अपने एक शेर में भी किया था –

कितना है बदनसीब ज़फर, दफ़न के लिए,

दो गज जमीन भी न मिली कु-ए-यार में

क्या हम उनके अवशेष रंगून से दिल्ली लाकर उनकी इस बदनसीबी को दूर नहीं का सकते? जरूर ऐसा कर सकते हैं, लेकिन इसके लिए देशभर से मांग उठनी चाहिए.

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