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जन्मदिन विशेष: जब भी हास्य कलाकारों की बात होगी, असरानी का नाम लिया जाएगा

उम्र के सातवें दशक में भी असरानी उतने ही सक्रिय दिखते हैं और पिछले नवंबर में ही नवोदितों को अभिनय के गुर सिखाने के लिए और FTII के अपने अनुभव बांटने के लिए असरानी एक्टिंग स्टूडियो की नींव रखी

Updated On: Jan 01, 2018 03:03 PM IST

Satya Vyas

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जन्मदिन विशेष: जब भी हास्य कलाकारों की बात होगी, असरानी का नाम लिया जाएगा

फिल्म उद्योग बनी बनाई लीक पर चलता है. एक परिपाटी जो सफल हो जाती है उसका आंख मूंदकर अनुकरण किया जाता है. ऐसी एक परिपाटी हास्य कलाकारों के नाम को लेकर रही है. श्वेत श्याम फिल्मों में हास्य कलाकार अंनत बलवंत धूमल का काम इतना सराहा गया कि लोग उन्हें उपनाम धूमल से ही जानने लगे. यह परिपाटी ने असरानी, मुकरी, पेंटल, तिवारी इत्यादि कलाकारों से उनका नाम छीन लिया.

1 जनवरी 1941 को जयपुर में जन्मे गोवर्धन असरानी फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया से प्रशिक्षित होने वाले शुरूआती कलाकारों में से एक थे. वह भी तब जब असरानी गुजराती फिल्मों का एक पहचाना चेहरा थे.

मगर प्रशिक्षित होना और काम मिलना दो अलग-अलग चीजें थीं. असरानी के लिए यही प्रशिक्षण गले की हड्डी की थी. ऐसा कहा जाता था की अदाकारी को प्रशिक्षण की जरूरत नहीं होती. अशोक कुमार, दिलीप कुमार जैसे लोगों ने कौन सा प्रशिक्षण लिया था?

भारी संघर्ष के दिनों में असरानी हार कर लौट आए और फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट में ही काम शुरू किया मगर हिंदी फिल्मों में काम न कर पाने की खलिश कचोटती रही.

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उन्हीं दिनों ऋषिकेश मुखर्जी अपनी फिल्म 'गुड्डी' के लिए अभीनेत्री तलाश करने एफटीआईआई आए हुए थे. असरानी से परिचय होने के कारण उन्होंने अभिनेत्री जया भादुड़ी के बारे में असरानी से ही पूछा. असरानी ने जय को ऋषिकेश मुखर्जी से मिलवा तो दिया और साथ ही अपने बारे में भी ऋषि दा से बात कर ली. काम नहीं था मगर फिर भी ऋषि ने फिल्म में एक छोटा सा किरदार असरानी को दिया. उनका 'जरा दस रुपए देना' वाली संवाद अदायगी लोगों को आजतक गुदगुदा देती है.

फिर तो बस असरानी जीवनपर्यंत ऋषि दा की फिल्मों का हिस्सा बने रहे. गुलजार ने भी जब अपनी पहली फिल्म 'मेरे अपने' बनाई तो असरानी को याद किया.

70 के दशक में कुछ फिल्में करने के बाद ही असरानी समझ चुके थे कि उन्हें खुद के लिए नायक और खलनायक के अतिरिक्त एक तीसरा खाका तैयार करना होगा. उन्होंने अपने लिए तीसरा खाका तैयार किया, हास्य कलाकार का. उछलकूद कर, आड़े-टेढ़े चेहरे बनाकर, पहलवानों, खलनायकों, चरित्र अभिनेत्रियों के पिटपिटाकर भी दर्शको को हंसाने का चरित्र. और इन्हीं मुश्किलों के साथ विगत पांच दशकों में उन्होंने हास्य में जो मुकाम हासिल कर लिया, वह बिरला है.

1970 के दशक में उनकी महत्वपूर्ण हास्य भूमिकाओं में आज की ताज़ा खबर, रोटी, प्रेम नगर, चुपके चुपके, छोटी सी बात, रफू चक्कर, शोले, बालिका वधू, फकीरा, अनुरोध, चरस, फांसी, दिल्लगी, हीरालाल पन्नालाल, पति पत्नी और वो और हमारे तुम्हारे इत्यादि हैं.

80 के दशक में हिंदी फिल्मों का एक बड़ा भाग दक्षिण भारत की ओर रुख करने लगा तब भी चरित्र अभिनेताओं में असरानी पहली पसंद बने उन्होंने दक्षिण भारतीय फिल्मों की हिंदी रीमेक में खूब काम किया. ऋषि दा की तरह ही असरानी डी.रामानायडू की फिल्म का भी जीवन पर्यंत हिस्सा बने रहे.

ऐसा नहीं है कि असरानी ने स्वयं को केवल हास्य चरित्र तक ही सीमित रखा. असरानी ने कभी खलनायक के किरदार भी निभाए तो कभी नायक के किरदार में भी हाथ आजमाए.

सत्तर और अस्सी के दशक में गुजराती फिल्मों में इन्हें वही एजाज हासिल हुआ जो उस वक्त की हिंदी फिल्मों में अमिताभ बच्चन को था. मगर फिल्म उद्योग अभिनेता को एक खाके में बांध देता है. असरानी भी बंधे और वृहद कैनवास पर हास्य अभिनेता ही मान लिए गए.

90 का दशक आते-आते जब कॉलेजप्रधान प्रेम-कहानियों वाली फिल्मों का बोलबाला हो गया तो असरानी ने अपने किरदार उम्र के लिहाज से बदल लिए. अब वह हंसोड़ प्रिंसिपल, मूर्ख मकान मालिक या अगंभीर मैनेजर की भूमिका में दिखने लगे.

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हां! मगर फिल्मों के काम हो जाने के कारण भी उन्होंने अन्य साथी कलाकारों की तरह कामुक भूतही फिल्मों की तरफ रुख नहीं किया. उससे बेहतर उन्होंने गुजराती फिल्में निर्मित करना शुरू किया जो 1996 तक जारी रही.

असरानी ने कुल 6 फिल्मों का निर्देशन भी किया जिसमें 'चला मुरारी हीरो बनने' को आंशिक अफलता मिली मगर अपने व्यस्त अभिनय करियर के कारण असरानी निर्देशन को गंभीरता से वक्त न दे सके. उनकी आखिरी निर्देशित फिल्म 90 के दशक में आई 'उड़ान' थी

एक फिल्मी-क्रिकेट मैच में आदित्य पंचोली से हुए विवाद के अलावा असरानी का नाम कभी किसी विवाद में नही सुना गया.

उम्र के सातवें दशक में भी असरानी उतने ही सक्रिय दिखते हैं और पिछले नवंबर में ही नवोदितों को अभिनय के गुर सिखाने के लिए और FTII के अपने अनुभव बांटने के लिए असरानी ने एक्टिंग स्टूडियो की नींव रखी.

हिंदी फिल्मों में जब भी हास्य कलाकारों की बात चलेगी, असरानी का नाम अग्रगण्य रहेगा.

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