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अमजद अली खान : तानसेन की परंपरा से तालीम लेने वाले उस्ताद

अमजद अली खान ने 40 राग बनाए हैं जिनमें अपने माता-पिता, महात्मा गांधी, इंदिरा गांधी, पंडित नेहरू को समर्पित राग भी हैं

Updated On: Oct 09, 2017 12:21 PM IST

FP Staff

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अमजद अली खान : तानसेन की परंपरा से तालीम लेने वाले उस्ताद

तहजीब और मौसिकी की ऐसी मिसाल जो ढूंढे से भी नहीं मिलेगी. मनमोहक शख्सियत, हसीन साज, दीवाना कर देने वाला अंदाज. सेनिया बंगश घराने की छठी पीढ़ी के सरताज उस्ताद अमजद अली खान. आज खान साहब का 72वां जन्मदिन है.

खान साहब की बात बाद में करेंगे. पहले सरोद की बात क्योंकि खान साहब और सरोद आज एक दूसरे के पूरक बन चुके हैं. इस साज में कुछ ऐसी गहराई, कुछ ऐसी कशिश, कुछ ऐसा जादू है कि सुनना शुरू कीजिए तो जी करता है बस सुनते ही रहें. रबाब से बना है सरोद. वही रबाब जो पठान लोग बजाते हैं.

याद कीजिए, काबुलीवाला के गीत ‘ऐ मेरे प्यारे वतन’ में रबाब बजा है. जंजीर के ‘यारी है ईमान मेरा’ में प्राण के हाथ में रबाब नजर आता है. बहुत पुराना साज है रबाब. कहते हैं गुरु नानक के शिष्य बाला और मर्दाना में से भाई मर्दाना रबाब बजाते थे और गुरु नानक को रबाब बहुत पसंद था.

आज भी मध्य एशिया, कश्मीर और अफगानिस्तान में रबाब पाया जाता है और फोक म्यूजिक के साथ बजाया जाता है.

अफगानिस्तान से ही आए थे अमजद अली खान के पुरखे. बंगश कहलाते थे. खानदानी पेशा था घोड़ों की तिजारत लेकिन रबाब बड़े शौक से बजाया करते थे. अमजद अली खान कहते हैं कि उनके पुरखों ने ही रबाब को ‘मॉडिफाई’ करके सरोद बनाया.

सरोद फारसी शब्द है, जिसका मतलब होता है मौसिकी, संगीत, तरन्नुम 

amjad ali khan

रबाब में फिंगर बोर्ड लकड़ी का होता था, तार खाल के होते थे. सरोद में ‘फिंगर बोर्ड’ धातु का होता है, तार स्टील के होते हैं और बजाने वाला प्लेक्ट्रम कोकोनट शेल का. मुश्किल चीज ये है कि इसमें गिटार या सितार की तरह फ्रेट या खांचे नहीं होते है. बहुत पक्की सुरीली तबीयत चाहिए सरोद बजाने के लिए.

बताते चलें कि सरोद फारसी का शब्द है, सही उच्चारण है सरूद जिसका मतलब ही होता है म्यूजिक, मौसिकी या तरन्नुम. रबाब बहुत लिमिटेड रेंज वाला साज है, उसमें सिर्फ खड़े-खड़े सुर बजते हैं, जबकि सरोद में मींड के जरिए श्रुतियों का सफर तय किया जा सकता है, बेइंतहा मिठास पैदा की जा सकती है.

तानसेन के घराने से आई तालीम

उस्ताद हाफिज अली खान अपने वक्त के बड़े सम्मानित संगीतकार थे. उन्होंने और उनके पुरखों ने स्वामी हरिदास और तानसेन के परिवार से संगीत की तालीम ली थी. हाफिज अली खान ग्वालियर के सिंधिया राजदरबार में संगीतकार थे.

ग्वालियर में ही 1945 में घर के छठे चिराग के तौर पर आए अमजद अली खान. बचपन में नाम रखा गया- मासूम अली खान था. कई साल बाद एक साधु आए थे घर में, बच्चे का नाम पूछा और फिर नया नाम दे दिया- अमजद अली खान.

हाफिज अली खान बहुत सख्त गुरु थे. बेसुरा बिल्कुल बर्दाश्त नहीं कर पाते थे. एक सुर गड़बड़ लगता तो या तो शागिर्द को भगा देते या फिर खुद उठकर चले जाते. ऐसे पिता और गुरु की छांव में सरोद थामा अमजद अली खान ने और छह साल की छोटी सी उम्र में पहली बार स्टेज परफॉर्मेंस देकर पिता को गौरवान्वित कर दिया.

उस्ताद हाफिज अली खान बहुत अच्छा गाते थे, गा-गाकर ही सिखाते भी थे. उनका मानना था कि सरोद में गायकी सुनाई देनी चाहिए, इंसानी जज्बात जाहिर होने चाहिए. उनकी वो तालीम अमजद अली खान के सरोद में साफ दिखती है. खान साहब सरोद को बजाते नहीं, सरोद के जरिए गाते हैं. पिता ने सिखाया कि सरोद तुम्हारा पेशा नहीं है, ये इबादत है, जिंदगी जीने का सलीका है.

मुकम्मल तालीम के लिए अमजद अली खान को उन्होंने गायकी सीखने गवैयों के पास भेजा, तबला सीखने तबलियों के पास भेजा. सबसे खास बात कि उन्होंने मौसिकी के साथ तहजीब और तमीज पर बहुत जोर दिया जो अमजद अली खान की शख्सियत का नायाब पहलू है.

हाफिज अली खान बहुत ही सादा तबीयत सच्चे संगीतकार थे.

अमजद अली खान बताते हैं कि हाफिज अली खान को पद्म भूषण दिया गया तो उन्हें देश के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद से मिलने का मौका मिला. राजेंद्र बाबू ने पूछा- ‘खान साहब आप ठीक तो हैं ना, बताइए हम आपके लिए क्या कर सकते है?’

हाफिज अली खान ने कहा- ‘राग दरबारी की शुद्धता खतरे में है, तानसेन का बनाया राग है, आजकल लोग उसकी शुद्धता पर ध्यान नहीं दे रहे, इसके लिए कुछ कीजिए.’  राजेंद्र बाबू उनके भोलेपन पर मुस्कुरा कर रह गए.

ग्वालियर में उस्ताद हाफिज अली खान के पुश्तैनी घर को म्यूजियम बना दिया गया है. नाम है- सरोद घर. वहां पुराने उस्तादों के साज रखे हैं, अनगिनत दुर्लभ तस्वीरें रखी हैं. अमजद अली खान ने अपने पिता और उनके समकालीन संगीतकारों पर एक किताब भी लिखी है My Father, Our Fraternity.

अमजद अली खान मानते हैं कि स्वर ही ईश्वर है. स्वर की इबादत ही ईश्वर की इबादत है. खान साहब मानते हैं कि सच्चा संगीत बेहतर इंसान बनाता है, इंसान को इंसान से जोड़ता है. उन्होंने जानी मानी भरतनाट्यम डांसर शुभलक्ष्मी बरुआ से प्रेम विवाह किया. शुभलक्ष्मी बेहतरीन डांसर थीं, लेकिन परिवार के लिए उन्होंने अपना डांसिंग करियर छोड़ दिया.

खास बात ये है कि मुस्लिम घर में रहते हुए भी शुभलक्ष्मी हिंदू रीति रिवाज के मुताबिक पूजा पाठ करती हैं. खान साहब के दोनों बेटे अमान और अयान आज देश के स्थापित सरोद वादक बन चुके हैं.

नेहरू और इंदिरा के नाम से भी बनाया राग 

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आज भी अमान और अयान की पहली गुरु के तौर पर खानसाहब अपनी पत्नी शुभलक्ष्मी जी का नाम लेते हैं. अमजद अली खान के संगीत सफर और पारिवारिक जिंदगी पर गुलजार ने एक डॉक्यूमेंट्री बनाई जिसे 1990 में फिल्मफेयर अवॉर्ड मिला.

जैसा कि हमने शुरू में भी कहा था कि अमजद अली खान आज सरोद का दूसरा नाम बन चुके हैं. दुनिया के कोने-कोने में उनके चाहने वाले मौजूद हैं. बड़े-बड़े म्यूजिशियंस, बड़े-बड़े इंटरनेशनल ऑर्केस्ट्रा के साथ वो प्रोजेक्ट करते रहते हैं. खान साहब के हाथों करीब 40 रागों का अवतरण हुआ है जिनमें से ज्यादातर उन्होंने किसी न किसी को समर्पित किए हैं.

मसलन- पिता के लिए राग हाफिज कौंस, मां के लिए राग राहत कौंस, महात्मा गांधी के लिए राग बापू कौंस, पत्नी के लिए राग शुभलक्ष्मी, भगवान गणेश के लिए राग गणेश कल्याण, इंदिरा के लिए राग प्रियदर्शिनी और नेहरू के लिए राग जवाहर मंजरी. दुनिया के बड़े-बड़े सम्मान के अलावा देश में खान साहब पद्मश्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण से नवाजे जा चुके हैं.

संगीत के क्षेत्र में अमजद अली खान के योगदान और उनकी उपलब्धियों का फलक इतना बड़ा है कि उसे शब्दों में समेटा नहीं जा सकता. आज उनके जन्मदिन पर यही दुआ है कि वो दीर्घायु हों, सेहतमंद रहें और बरसों बरस अपने सरोद के रस से सबको अभिसिंचित करते रहें हैं.

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