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जन्मदिन विशेष 2018: अपने जिगरी दोस्तों की नजर में क्या थे ओम पुरी

ओम पुरी का संघर्ष पूरी फिल्म इंडस्ट्री को यह नसीहत देती है कि मेहनत और लगन से बढ़कर कुछ भी नहीं. ‘पैरेलल सिनेमा’ से लेकर कॉमर्शियल सिनेमा तक में उन्होंने खुद को मजबूती से स्थापित किया था

Updated On: Oct 18, 2018 07:06 AM IST

Shivendra Kumar Singh Shivendra Kumar Singh

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जन्मदिन विशेष 2018: अपने जिगरी दोस्तों की नजर में क्या थे ओम पुरी
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आज अभिनेता ओम पुरी का जन्मदिन है. पिछले साल जनवरी में अचानक वो इस दुनिया से चले गए. उनके यूं चले जाने से फिल्मी दुनिया स्तब्ध थी. ओम पुरी का संघर्ष पूरी फिल्म इंडस्ट्री को यह नसीहत देती है कि मेहनत और लगन से बढ़कर कुछ भी नहीं. ‘पैरेलल सिनेमा’ से लेकर कॉमर्शियल सिनेमा तक में ओम पुरी ने खुद को मजबूती से स्थापित किया था. आज उनके जन्मदिन पर फिल्म इंडस्ट्री में उनके सबसे करीबी कलाकार उन्हें याद कर रहे हैं.

नसीरुद्दीन शाह

मेरे जीवन पर जितना अधिकार मेरा है उतना ही ओम पुरी का भी था. अगर कोई यह कहे तो गलत नहीं है. मेरी और ओम की मुलाकात 1970 में हुई थी. वो पटियाला से आया था. मैं अलीगढ़ से आया था. उन दिनों नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (एनएसडी) में हॉस्टल नहीं हुआ करते थे. एक दिन ओम ने मुझे खाने पर बुलाया. मैंने सोचा कि आज तो मुर्गा-शुर्गा खाने को मिलेगा. वहां पहुंचकर मैं हैरान रह गया. मुझे ताज्जुब हुआ जब मैंने देखा कि ओम तो दरअसल उस घर के कॉरीडोर में रहता था. वो चार फुट चौड़ा कॉरीडोर रहा होगा. वहां उसकी एक चारपाई रखी थी. उसकी एक लुंगी टंगी हुई थी. उसका एक स्टोव रखा हुआ था. पास में एक छोटा सा रैक रखा था जिसमें ओम की तीन-चार किताबें रखी हुई थीं. वहां हम लोगों का एक और दोस्त जसपाल भी रहा करता था. मैं हर जगह इस वाकये का जिक्र करता हूं जहां भी अब उसकी याद में बोलता हूं सिर्फ यह बताने के लिए यह आदमी कहां से कहां पहुंचा. वो भी किसी की मदद के बिना. यह इंसानी हिम्मत, मेहनत और खुद पर यकीन करने का नतीजा था.

एक बार मैं, ओम और जसपाल एक ढाबे पर बैठकर खाना खा रहे थे. जसपाल को कुछ ‘सॉइकॉलॉजिकल प्रॉब्लम’ थी. उसे मुझसे कुछ परेशानी सी होने लगी थी क्योंकि मुझे काम मिलना शुरू हो गया था और उसको नहीं. उसने आकर पीठ पर मुझे चाकू मारा, मुझे तो तब तक कुछ नहीं पता चला जब तक ओम चिल्ला कर उठा और उसने जसपाल को पकड़ा नहीं. उस रोज अगर ओम ने जसपाल को पकड़ा नहीं होता तो शायद ही मैं बचता. वो तो ओम ने जसपाल को पकड़ लिया वरना जसपाल मेरे ऊपर दूसरी बार वार करता.

Naseeruddin

नसीरुद्दीन शाह

ओम के साथ बहुत कुछ गुजरा है. कमाल की बात यह कि जब फिल्म इंस्टीट्यूट के लिए ओम का ऑडिशन हुआ तब गिरीश कर्नाड वहां डायरेक्टर थे. मैं भी वहीं बैठा हुआ था हमें वहां ऑडिशन देने के लिए आए बच्चों की मदद करने के लिए बुलाया गया था. मैं वहां बैठा हुआ था जब ओम ऑडिशन देने आया. मुझे अभी भी याद है कि उसने ‘सुनो जनविजय’ नाम के एक नाटक का एक हिस्सा किया था. वहां मौजूद लोग देखते रह गए कि यह कितने कमाल का एक्टर है. लेकिन वहां जो सेलेक्शन बोर्ड था उसमें से एक साहब बोल पड़े कि नहीं इसका चेहरा सिनैमैटिक नहीं है. मुझे लगा कि यार यह तो ओम मारा गया. उसके बाद गिरीश कर्नाड ने उन शख्स को ऐसा लताड़ा, ऐसा लताड़ा कि पूछिए मत. गिरीश कर्नाड ने पूछा कि सिनैमैटिक चेहरे से आपका मतलब क्या है, आपको क्या हर हीरो चॉकलेटी चेहरे वाला चाहिए. उन्होंने ओम पुरी के बारे में कहा कि आप इसका चेहरा देखिए, इसकी आंखे देखिए कितना दर्द है इसकी आंखों में, इसका चेहरा तो पूरा एक लैंडस्कैप है.

शबाना आजमी

मुझे याद है कि एक बार मैं नसीर (नसीरुद्दीन) के घर गई थी तो उनके बोर्ड पर उनकी और ओम पुरी की एक पुरानी तस्वीर लगी थी. वो तस्वीर उनके संघर्ष के दिनों की थी, जब उन्होंने नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा ज्वाइन ही किया था. मैंने उस तस्वीर को देखकर कहा कि मैं आप लोगों के कॉन्फिडेंस की दाद देती हूं कि इस तरह की शक्ल लेकर आप लोगों ने कैसे तय किया कि आप लोग एक्टिंग करेंगे. जोक्स एपार्ट, ओम पुरी कमाल के अभिनेता थे. जब हम लोग ‘सुस्मन’ में साथ काम कर थे तो ओम पुरी को उसमें एक बुनकर का रोल करना था. उस रोल के लिए वो बुनकरों के बीच जाकर रहे. वो उस रोल में इतना खो गया था, वो इंट्रोस्पेक्टिव किस्म का आदमी था. उसने उस दौरान हम लोगों से बात तक करना बंद कर दिया था. अपने कैरेक्टर के साथ इतनी सच्चाई से काम करते थे. वहां उन्होंने मेरे लिए एक दुपट्टा भी बनाया आज तक वो दुपट्टा मेरे पास है. ऐसे ही जब हम ‘मंडी’ कर रहे थे तो मैं श्याम बेनेगल को ‘कॉस्ट्यूम्स’ में भी मदद कर रही थी. हम लोग हैदराबाद के एक पुराने इलाके में कपड़े लेने गए थे. अचानक मुझे एक आदमी बड़ी ही बेढंगी शर्ट पहने दिखा. मैंने वो शर्ट उससे ली और बाद में आकर ओम पुरी को दी थी. जो उसने फिल्म में पहनी भी है.

शबाना आजमी

शबाना आजमी

दीप्ति नवल

ओम पुरी  ने बतौर अभिनेता मुझे बहुत प्रभावित किया. उनको मैं हमेशा ओम जी कहती थी. इसकी वजह यह थी कि स्मिता पाटिल उनको हमेशा चिढ़ाती थीं और ओम जी ही कहती थी. मुझे ओम पुरी से यही कहकर ‘इंट्रोड्यूस’ भी कराया गया था कि यह ओम पुरी हैं लेकिन स्मिता उनको ओम जी कहकर छेड़ती थी तो मैंने भी उन्हें ओम जी कहना शुरू कर दिया. ओम पुरी का हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में योगदान इतना बड़ा है कि उनके बारे में कहां से बात की जाए यह सोचना होगा. बहुत मुश्किल है उनके बारे में कुछ भी बोलना. ओम पुरी मेरे पड़ोसी भी थे. मेरी और उनकी बिल्डिंग में सिर्फ एक सड़क भर का फासला था. सड़क पार किया तो ओम जी का घर आ जाता था. जब मैंने उनकी फिल्म आक्रोश देखी तो मुझे लगा कि क्या कमाल का सिनेमा है. तब तक मैंने शायद फिल्में करना शुरू भी नहीं किया था.

deepti naval

दीप्ति नवल

उस दौर में मैंने स्मिता की फिल्म भूमिका देखी थी और ओम जी की ‘आक्रोश’. मैं ऐसा ही सिनेमा करना चाहती थी. मैं ऐसी ही कलाकार बनना चाहती थी. बाद में हीरोइनों में स्मिता पाटिल, शबाना आजमी और फिर उसमें मैं जुड़ गई तो यह तिकड़ी शबाना, स्मिता और दीप्ति हो गई और उधर ओम पुरी, नसीरूद्दीन शाह और फारूख़ शेख़ हो गए. उनकी जिंदगी में कुछ भी चल रहा हो वो अपने काम में जूझे रहते थे. हम लोगों का रिश्ता ऐसा था कि उनके घर पर जब भी यार-दोस्त आते थे तो वो मुझे जरूर बुलाते थे. अचानक ही फोन कर के कहते थे कि शाम को नसीर आ रहा है, मीता वशिष्ठ आ रही हैं तुम भी आ जाओ. काम के लिहाज से देखा जाए तो मैं ओम पुरी साहब के साथ और फिल्में करना चाहती थी. अफसोस, मेरी वो ख्वाहिश पूरी नहीं हो पाई.

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