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शालीन हंसी और चुटीले व्यंग्यों से संसद को जीवंत बनाए रखते थे पीलू मोदी

1960 में स्थापित स्वतंत्र पार्टी के संस्थापकों में एक पीलू मोदी राज गोपालाचारी के करीबी थे और दिल्ली के ओबराय होटल की वास्तु रचना उन्होंने ही की थी

Surendra Kishore Surendra Kishore Updated On: Nov 14, 2017 09:08 AM IST

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शालीन हंसी और चुटीले व्यंग्यों से संसद को जीवंत बनाए रखते थे पीलू मोदी

बात उस समय की है जब पीलू मोदी भारतीय लोक दल में थे. संभवतः वे दल के राष्ट्रीय महासचिव थे. उसके नेता चौधरी चरण सिंह थे और बिहार के पूर्व मुख्य मंत्री कर्पूरी ठाकुर भी उसी दल में थे. पीलू मोदी पटना आए थे. भारतीय लोक दल के राज्य कार्यालय में मोदी एक आराम कुर्सी पर बैठे थे. बगल की एक कुर्सी पर बैठकर कर्पूरी ठाकुर उनसे बातचीत कर रहे थे.

कर्पूरी जी ने कहा कि ‘मोदी साहब, यदि आप बिहार पार्टी के लिए एक हेलिकाॅप्टर का प्रबंध कर दें तो हम विधानसभा की आधी सीटें जीत जाएंगे.’ इस पर बिना देर किए मोदी ने कहा कि ‘दो का प्रबंध कर देता हूं. पूरी सीटें जीत जाओ. अरे भई, चुनाव हेलिकाॅप्टर से नहीं जीते जाते.’ हंसी में बात आई-गई हो गई.

सदाबहार व्यक्तित्व के धनी थे पीलू

देर तक पास में बैठकर मैं उन दोनों दिग्गजों की बातें सुनता रहा था. उस संवाद के जरिए मुझ पर पीलू मोदी ने एक छाप छोड़ दी. उनके बारे में अधिक जानने की कोशिश करने लगा. जाना भी. उनके साथ सबसे बड़ी बात यह थी कि वे सदाबहार व्यक्तित्व के धनी थे.

उनके समकालीन पत्रकार शरद द्विवेदी ने उनके बारे में लिखा है कि ‘पीलू मोदी की भाषण कला, अंग्रेजी भाषा पर अद्वितीय अधिकार, वाक्पटुता और सुलझे हुए विचार सभी को आकर्षित करते थे. कटाक्ष करने में वह माहिर थे. उनके कटाक्ष और हाजिरजवाबी सुनने वालों को हंसा देते थे. जिसकी भाषा ऐसी होती थी कि कटाक्ष के शिकार भी उनका आनंद लेते थे. लेकिन कभी किसी के लिए बुरी भावना उनके मन में नहीं थी.'

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पत्रकार सी.एस.पंडित के अनुसार उस घटना को शायद ही कोई भूल सकता है जब एक दिन संसद के केंद्रीय हाल में पीलू मोदी अपने गले में एक पट्टा पहनकर आए जिस पर लिखा था ‘ मैं सी.आई.ए.का एजेंट हूं.’ यह उस आलोचना का जवाब था जो संसद में कुछ दिन पहले सत्तारूढ़ दल की ओर से की गई थी. पीलू मोदी, सर होमी मोदी के पुत्र थे जो संयुक्त प्रांत के गवर्नर रह चुके थे. पीलू मोदी के भाई रूसी मोदी टिस्को के चेयरमैन थे.

आर्किटेक भी थे मोदी

पीलू ने कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में वास्तु शिल्प की पढ़ाई की थी. वहां पीलू मोदी जुल्फिकार अली भुट्टो के रूममेट थे. पीलू की एक चर्चित किताब है ‘जुुल्फी माई फ्रेंड.’ वह 1973 में लिखी गई.

14 नवंबर 1926 को जन्मे पीलू मोदी का 29 जनवरी 1983 को निधन हो गया. तब वे राज्यसभा के सदस्य थे. उससे पहले पीलू मोदी 1967 और 1971 में गोधरा से लोकसभा के लिए चुने गए थे. पर वे 1977 में हार गए थे.

1960 में स्थापित स्वतंत्र पार्टी के संस्थापकों में एक पीलू मोदी राज गोपालाचारी के करीबी थे. कम ही लोग जानते हैं कि दिल्ली के ओबराय होटल की वास्तु रचना पीलू मोदी ने ही की थी. पर वे देश में जिस नई राजनीति की रचना करना चाहते थे, वह काम वे पूरा नहीं कर सके. वे कहा करते थे कि इस देश के 50 हजार बदमाश विभिन्न तरह की ताकत की कुर्सियों पर बैठ कर अपनी स्वार्थ सिद्धि कर रहे हैं. उनको सबक सिखाने के लिए हम 5 लाख युवक-युवतियों की फौज बनाना चाहते हैं.

इस सिलसिले में वे करीब डेढ़ लाख नाम एकत्र भी कर चुके थे. पर इस बीच उनका निधन हो गया. यानी सदाबहार व्यक्तित्व के स्वामी पीलू लोगों को हंसाने के अलावा गंभीर काम में भी लगे रहते थे. वे एक पत्रिका भी निकालते थे.

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जब शराब पीने की वजह से नहीं मिला अध्यक्ष पद

वे बाहर-भीतर से एक थे. एक बार उन्हें जनता पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने का प्रयास कुछ लोगों ने किया था. पर उस राह में शराब बाधक बन गई. जनता पार्टी से जुड़े किसी बड़े गांधीवादी नेता ने मोदी से पूछा कि क्या आप शराब भी पीते हैं? पीलू ने बिना देर किए कह दिया हां, अवश्य पीता हूं. इसी आधार पर उनका नाम कट गया. पर उन्हें इसकी कोई चिंता नहीं थी.

इस संबंध में पीलू के एक समकालीन सांसद ने लिखा है कि हम सब जानते हैं कि पीलू का पीना महीने में एकाध बार ही होता है. फिर भी पीलू ने कह दिया था कि ‘मैं जो खाऊं, जो पीऊं, वह मेरा अधिकार है. इसमें कोई हस्तक्षेप नहीं मानूंगा.’

चौथी लोकसभा में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के डा.राम मनोहर लोहिया ने लोकसभा में एक निजी विधेयक पेश किया था. लोहिया का प्रस्ताव था कि किसी भी व्यक्ति का खर्च प्रति माह 15 सौ रुपए से अधिक नहीं होना चाहिए. स्वतंत्र पार्टी के एक सांसद ने उस विधेयक का सदन में मजाक उड़ाया.

सांसद का कहना था कि लोहिया का मजाक उड़ाने का निदेश उनकी पार्टी ने दिया था. पर पीलू मोदी ने इसे लोहिया का अपमान माना. उस सांसद को लेकर पीलू लोहिया के आवास पर गए. सांसद ने लोहिया के सामने अपने किए पर अफसोस प्रकट किया. लोहिया ने उस सांसद से कहा कि ‘तुमने तो यह असंभव मांग कर दी कि मैं लोगों की मनोवृत्ति बदलूं. अरे भई, मैं संन्यासी तो हूं नहीं. राजनीति का खिलाड़ी हूं.’

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