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शायर-ए-इंकलाबः जिसे न मलीहाबाद ने अपनाया, न इस्लामाबाद ने

जोश ने इकबाल के प्रभाव के दौर में भी दुनिया की बात करने वालों को लताड़ लगाई है

Piyush Raj Piyush Raj Updated On: Dec 05, 2017 01:26 PM IST

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शायर-ए-इंकलाबः जिसे न मलीहाबाद ने अपनाया, न इस्लामाबाद ने

‘शब्बीर हसन जोश’ या ‘जोश मलीहाबादी’ को शायर-ए-इंकलाब भी कहा जाता है. तरक्कीपसंद तहरीक और मार्क्सवाद से प्रभावित जोश ने न सिर्फ अपने नाम के अनुकूल जोश से भरी इंकलाब की नज्में और शायरी लिखीं बल्कि भारत की आजादी के आंदोलन में बढ़-चढ़कर शिरकत भी किया था. अपने काम और नारे के बारे में खुद जोश लिखते हैं-

काम है मेरा तगय्युर है मेरा शबाब मेरा नारा ‘इंकिलाबो-इंकिलाबो-इंकिलाब’

जोश का जन्म मलीहाबाद यानी लखनऊ के एक जागीरदार परिवार में हुआ था. इनके पिता बशीर अहमद खां ‘बशीर’ खुद एक शायर थे. इस तरह शायरी और ढेर सारी जायदाद उन्हें विरासत में मिली थी. शुरुआत में सामंती परिवेश में लालन-पालन होने की वजह से जोश थोड़े घमंडी और विलासी हो गए थे. हालांकि पिता की मौत के बाद जायदाद के झगड़े की वजह से उनकी आर्थिक हालत पतली हो गई थी.

जोश अपने आरंभिक जीवन के बारे में कहते हैं-‘मैं लड़कपन में बहुत बदमिजाज था. गुस्से की हालत यह थी कि मिजाज के खिलाफ एक जरा सी बात हुई नहीं कि मेरे रोयें-रोयें से चिंगारियां निकलने लगती थीं. माली हैसियत से वह मेरी इंतहाई फारिग-उल्बाली (संपन्नता) का जमाना था. ’

सिर्फ 9 साल की उम्र से ही जोश ने शायरी शुरू कर दी थी. शुरू में वे प्रकृति प्रेम और धार्मिक कविताएं लिखते थे. जवानी के दिनों में जब हैदराबाद नौकरी करने गए तब शायर-ए-फितरत (प्रकृति का कवि) शायर-ए-शबाब हो गया. यानी वहां जाकर उन्होंने इश्क और हुस्न पर शायरी करनी शुरू कर दी. इसकी वजह यह थी कि हैदराबाद में उन्होंने भारी विलासी जीवन बिताया था. यहां वे सुरा और सुंदरी में डूबे रहते थे. फिराक गोरखपुरी अपनी किताब ‘उर्दू भाषा और साहित्य’ में जोश के जीवन के समय के बारे में लिखते हैं कि जोश ने 18 बार प्रेम किया, जिनमें एक को छोड़कर वे हर बार नाकाम रहे.

बाद में जब जोश को इस बात का इल्म हुआ कि देश गुलाम है और यहां के लोग शोषित-पीड़ित हैं तो उन्होंने इंकलाब की शायरी करनी शुरू कर दी. यानी वे शायर-ए-शबाब से शायर-ए-इंकलाब हो गए. जोश अपनी शायरी में हुए इस बदलाव के बारे में खुद कहते हैं-

अब न तड़पूंगा कभी इश्क के अफसानों पर अब जो रोऊंगा तो रौंदे हुए इंसानों पर. अब तमन्ना पे न अरमान पे दिल धड़केगा अब तो धड़केगा तो इंसान पे दिल धड़केगा.

जोश में हुआ यह बदलाव इतना बड़ा था कि जिन महलों में वे पले थे उस तरह के शोषण के महलों को गिरा देने की बात अपनी शायरी में करने लगे थे-

इन पाप के महलों को गिरा दूंगा मैं इक दिन, इन नाच के रसियों को नचा दूंगा मैं इक दिन. मिट जाएंगे इंसान के सूरत के यो हैवान, भूचाल हूं, भूचाल हूं, तूफान हूं, तूफान.

जोश की शायरी की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि वे किसी अंतरराष्ट्रीयतावाद का शिकार नहीं हुए. जब वे लिख रहे थे तब अल्लमा इकबाल का पैन इस्लामिज्म भी अपने चरम पर था. साथ ही जिस विचारधारा यानी साम्यवादी विचारधारा से वे जुड़े हुए थे, उसके भी अंतरराष्ट्रीयतावाद से अपने आप को जोश ने अलग ही रखा. जोश ने तो बिना भारत की बात किए बगैर दुनिया की बात करने वाले लोगों को अपनी शायरी में लताड़ भी लगाई है-

तेरे लब पर है इराको शामो-मिस्रो रोमो-चीं लेकिन अपने ही वतन के नाम से वाकिफ नहीं सबसे पहले मर्द बन हिंदोस्तां के वास्ते हिंद जाग उट्ठे तो फिर सारे जहां के वास्ते.

जोश ने न सिर्फ अंग्रेजी राज के खिलाफ लिखा बल्कि आजाद हिंदुस्तान में चल रही घूसखोरी पर भी अपनी नाराजगी खुलकर जताई है. वे लिखते हैं-

शैतान एक रात में इंसान बन गए जितने नमक-हराम थे कप्तान बन गए.

आजादी के बाद उन्होंने जिस दुर्दशा का वर्णन अपनी शायरी में किया है वो भारत और पाकिस्तान दोनों के लिए मौजूं था. 1955 में जोश पाकिस्तान चले गए जिस वजह से उन्हें एजेंट और गद्दार तक कहा गया. इससे जोश को काफी धक्का भी लगा. दरअसल उनके लिए भारत और पाकिस्तान में कोई भेद नहीं था. इस वजह से उन्होंने पाकिस्तान जाने के चंद दिनों बाद ही कहा कि- ‘मैंने तन्हाई की जिंदगी बसर करने का फैसला कर किया है ताकि किसी को इल्म न हो सके की मैं जिंदा हूं या मुर्दा, या मैं शायर भी था.’

भारत-पाकिस्तान के झगड़े के बीच जोश फंस गए थे. उनकी यह दुविधा उनके इस शेर में कुछ इस तरह समझी जा सकती है-

कहां ले जाऊं दिल, दोनों जहां में सख्त मुश्किल है इधर परियों का मज़मा है, उधर हूरों की महफिल है.

जिस जोश को भारत में भारत छोड़ने पर गद्दार कहा गया था, जब उन्होंने अपनी आत्मकथा ‘यादों की बारात’ में भारत को छोड़ना एक भारी गलती कहा तो पाकिस्तान सरकार ने इस किताब को बैन करते हुए उन्हें पाकिस्तान का दुश्मन करार कर दिया. यह किताब 1972 में छपी थी. आखिरकार 22 फरवरी, 1982 में इस्लामबाद में इंतकाल के बाद ही जोश जैसे देशप्रेमी शायर को भारत और पाकिस्तान दोनों की हिकारत से मुक्ति मिली.

जोश की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि वे अपने भावों के अनुकूल भाषा को ढाल लेते थे. हालांकि कई जगह वे भावनाओं में इतना बह जाते हैं कि वहां पर उनकी शायरी थोड़ी कमजोर पड़ जाती है. वैसे जोश के लिए भाषा और कला से अधिक महत्व भावना का था-

मैं ए जोश इस दौर में हूं वह शायर अंधेरे में जिस तरह शमअः फरोजां.

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