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नूरजहां: हिंदुस्तान और पाकिस्तान की अवाम के दिलों में बसे एक कलाकार की दास्तां

नूरजहां उन चुनिंदा कलाकारों में से रहीं जिन्हें सरहद के दोनों ओर खूब इज्जत और शोहरत मिली.

Updated On: Sep 21, 2018 08:40 AM IST

Shivendra Kumar Singh Shivendra Kumar Singh

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नूरजहां: हिंदुस्तान और पाकिस्तान की अवाम के दिलों में बसे एक कलाकार की दास्तां

1925 में पैदा हुई एक बच्ची का जन्म ही शायद कलाकार के तौर पर खूब शोहरत बटोरने के लिए हुआ था. उस बच्ची ने पटियाला घराने के महान कलाकार बड़े गुलाम अली खान से बाकायदा संगीत की तालीम हासिल की. इसके बाद जब फिल्मों में अभिनय का दौर शुरू हुआ तो लोग उनकी अदाकारी के दीवाने होते चले गए. उस दौर में एक से बढ़कर एक फिल्म और एक से बढ़कर एक गाने. आज उसी अल्लाह रखी वसई को हम उनके जन्मदिन पर याद कर रहे हैं. नहीं समझ आया? हम मलिका-ए-तरन्नुम की बात कर रहे हैं, जिनका मां-बाप ने नाम रखा था अल्लाह रखी. लेकिन हम सब और पूरी दुनिया उन्हें नूरजहां के नाम से जानती है.

ये नाम उन्हें तब मिला जब बचपन में ही वो स्टेज से जुड़ गईं. बाद में नूरजहां ने फिल्म संगीत में बड़ा नाम कमाया लेकिन गजल गायिका के तौर पर भी उनकी उपलब्धियां कम नहीं हैं. ये नूरजहां की आवाज की कशिश ही थी कि पूरा जमाना लता मंगेशकर को सुनना चाहता है लेकिन लता जी जिस गायिका को सुनना चाहती थीं वो नूरजहां हैं. अफसोस, 1947 के बंटवारे ने हिंदुस्तान से कई बड़े फनकार भी छीन लिए थे. इस बंटवारे और बेदखली की सियासत का दर्द अब भी लोग महसूस करते हैं. ऐसी ही एक फनकार थीं नूरजहां जो बंटवारे के बाद पाकिस्तान चली गईं.

21 सितंबर 1926 को जिस परिवार में नूरजहां का जन्म हुआ, वो संगीत से जुड़ा था. पंजाब के कसूर में उनका जन्म हुआ. मदद अली और फतेह बीबी की 11 संतानों में वो एक थीं. माता-पिता चाहते थे कि उनकी बेटी भी संगीत में आए. हालांकि नूरजहां को फिल्मों में काम करने का ज्यादा शौक था. पांच या छह साल की उम्र में ही नूरजहां ने लोक संगीत गाना शुरू कर दिया था. वो थिएटर से भी जुड़ गई थीं. उनकी मां ने उन्हें सीखने के लिए उस्ताद बड़े गुलाम अली खां साहब के पास भेजा. नौ साल की उम्र में उन्होंने गजल गाना शुरू किया.

अब तक उनका नाम अल्लाह रखी ही था. कलकत्ता में उन्हें बेबी नूरजहां नाम मिला. उन्हें फिल्मों में काम शुरू किया और जल्दी ही बड़ी स्टार बन गईं. उन्होंने शौकत हुसैन रिजवी से शादी कर ली. आज की पीढ़ी को शायद इन गानों की ‘पॉप्युलैरिटी’ को समझने के लिए अपने बाबा-दादी से पूछना पड़ेगा लेकिन ‘आजा मेरी बर्बाद मोहब्बत के सहारे’, ‘जवां है मोहब्बत हसीं हैं जमाना’, ‘आवाज दे कहां है’, ‘मेरे बचपन के साथी’ जैसे करीब दर्जन भर गीत हैं जो नूरजहां को हिंदुस्तानी फिल्मी संगीत में अमर कर गए.

नौशाद साहब के साथ नूरजहां का जलवा ये होता था कि एक बार एक फिल्म निर्देशक ने रिहर्सल के दौरान आकर गाने में बदलाव का कुछ सुझाव दे दिया था कहते हैं कि अगले दिन नौशाद साहब ने अगले दिन स्टूडियो में जाकर कैमरे वाले को कई निर्देश दे दिए. जब डायरेक्टर ने आपत्ति की तो उन्होंने कहा-जैसे आप अपना काम खुद से करना चाहते हैं वैसे ही मुझे भी अपना काम खुद से करने दें.

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नूरजहां ने अपने करियर में हिंदुस्तान की करीब तीस फिल्मों में काम किया. इनमें हिंदी के अलावा पंजाबी फिल्में भी शामिल हैं. नूरजहां ने हिंदुस्तानी फिल्मों में खानदान, नौकर, जीनत, गांव की गोरी, बड़ी मां, अनमोल घड़ी, जुगनू, ‘मिर्जा साहिबां’ जैसी हिट फिल्में कीं. इनमें से कई फिल्में ऐसी थीं जिन्होंने अपनी रिलीज के साल टॉप 5 फिल्मों का बिजनेस किया.

1947 में विभाजन के समय उन्होंने अपने पति के साथ पाकिस्तान जाने का फैसला किया. ऐलान किया-जहां पैदा हुई हूं, वहीं जाऊंगी. वहां भी वो फिल्मों से जुड़ीं. नूरजहां ने पाकिस्तान में भी कई बड़ी फिल्में की. जिन्हें वहां की अवाम ने काफी सराहा और कामयाब बनाया. करीब डेढ़ दर्जन पाकिस्तानी फिल्में उनके नाम हैं. इस बीच नूरजहां का पति से अलगाव हुआ. इसकी एक वजह यह थी कि उनके नाम तमाम अफेयर्स के किस्से जुड़ते जा रहे थे. इनमें से एक अफेयर क्रिकेटर मुदस्सर नजर के पिता नजर मोहम्मद के साथ था.

कहा जाता है कि एक बार घर में नजर मोहम्मद और नूरजहां थे. इसी दौरान उनके पति आ गए. नजर मोहम्मद खिड़की से कूद गए, जिसकी वजह से उनकी टांग टूट गई. पहली शादी से उनके तीन बच्चे थे, जिनमें गायिका जिल-ए हुमा शामिल हैं. 1959 में उन्होंने खुद से नौ साल छोटे अदाकार एजाज दुर्रानी से शादी की. इस शादी से भी उनके तीन बच्चे हुए. 1963 में उन्होंने फिल्मों से रिटायर होने का फैसला किया. उनकी दूसरी शादी भी नहीं चली. 1979 में उनका तलाक हो गया.

फिल्मों में अदाकारी बंद करने के बाद नूरजहां ने गाने पर ज्यादा ध्यान देना शुरू किया. प्लेबैक सिंगिंग और गजल गायकी दोनों पर. वो तमाम महफिलों का भी हिस्सा बनीं. 1965 में भारत और पाकिस्तान के बीच जंग के समय उन्होंने पाकिस्तान के लिए देशभक्ति गीत गाए और इससे उन्हें खासी लोकप्रियता हासिल हुई. जिस दौर में पाकिस्तान में ज्यादातर गायकों को एक गाने के साढ़े तीन सौ रुपए मिलते थे, लोग नूरजहां को दो हजार रुपए देने को तैयार रहते थे.

उन्होंने एक भजन भी गाया-मन मंदिर के देवता. हालांकि रेडियो पाकिस्तान ने इसे बैन कर दिया. 1982 में वो भारत आईं. उन्होंने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से भी मुलाकात की. स्टेज पर तीन गाने गाए. इनमें से एक था- मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरे महबूब न मांग. दिलीप कुमार ने उन्हें स्टेज पर आमंत्रित किया था. नौशाद का संगीतबद्ध गाना भी उन्होंने गाया-आवाज दे कहां है.

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भारतीय क्रिकेट टीम को पाकिस्तान दौरे पर नूरजहां से मिलवाया गया था. हालांकि कहा जाता है कि एक बड़े क्रिकेटर ने उनकी विवादास्पद शख्सियत की वजह से उनके साथ तस्वीर खिंचाने से इनकार कर दिया था. बाद में समझाने के बाद वो तस्वीर खिंचाने के लिए इसके लिए राजी हुए. 23 दिसंबर 2000 को दिल का दौरा पड़ने से नूरजहां का निधन हो गया था. नूरजहां उन चुनिंदा कलाकारों में से रहीं जिन्हें सरहद के दोनों ओर खूब इज्जत और शोहरत मिली.

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