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जन्मदिन विशेष ज्योति बसु: मेहनतकश अवाम की एक भरोसेमंद आवाज

अभूतपूर्व सांप्रदायिक हिंसा और तनाव में डूबे प. बंगाल को आज ज्योति बाबू और उनके वाममोर्चे की कमी खल रही है

Badal Saroj Updated On: Jul 08, 2017 02:14 PM IST

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जन्मदिन विशेष ज्योति बसु: मेहनतकश अवाम की एक भरोसेमंद आवाज

बिना किसी अतिरंजना में जाये जो एक बात ज्योति बसु के बारे में कही जा सकती है वह यह कि वे भारतीय राजनीति में एक अद्भुत फिनोमिना थे. एक ऐसे राजनीतिज्ञ जो जीते जी किंवदंती बन गए, एक ऐसी शख्सियत जिसे हमेशा राजनीति के उन मूल्यों के उदाहरण के रूप में याद किया गया- जो सकारात्मक और सार्थक थे.

1917 में 8 जुलाई को जन्मे ज्योति बाबू आज होते तो सौ साल पार कर चुके होते.

आज राजनीतिक नेतृत्व के शीर्ष पर विराजी मंडली भले आश्वस्ति देने वाली न हो बल्कि कुछ हद तक डरावनी भी हो, किन्तु भारतीय राजनीति काबिल और समझदार, समर्पित और उदाहरणीय व्यक्तित्वों के मामले में दरिद्र कभी नहीं रही. ज्योति बसु उनमें भी अलग, विरलों में भी विरल थे.

बौद्धिकता, प्रतिबद्धता और मानवीयता का अद्भुत मेल

प्रखर बौद्धिकता, अटूट प्रतिबद्धता और इसी के साथ, इन्हीं के समतुल्य मानवीयता ऐसा मेल है जो इन दिनों विलुप्त सा होता लग रहा है. ज्योति बसु इसका समुच्चय थे. भारत की राजनीति में ऐसा उदाहरण कोई और नहीं जो इतने लंबे समय तक लगातार मुख्यमंत्री रहा हो और शारीरिक रूप से सक्षम और राजनीतिक रूप से सर्वाधिक स्वीकार्य होते हुए भी मुख्यमंत्री का पद छोड़ दिया हो. उन्होंने जब प्रधानमंत्री के पद की पेशकश को ठुकराया था, तब भी ऐसा करने वाले वे पहले भारतीय नेता थे.

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सीपीएम ने उनके प्रधानमंत्रित्व के बारे में जो राय बनाई थी उसके पोस्टमॉर्टम की बजाय इस प्रसंग में लगता है दो बातें ज्यादा विशिष्ट और मानीखेज है : एक, अनेक पूंजीवादी पार्टियों द्वारा एकमत से ज्योति बसु को अपना प्रधानमंत्री बनाने का निर्णय लेना, जो दुनिया में कहीं नहीं हुआ. दूसरा पार्टी की राय को सर्वोच्च मानकर ज्योति बाबू का इसे स्वीकार करने से इनकार कर देना.

सीपीएम के पार्टी कांग्रेस में सीताराम येचुरी के साथ ज्योति बसु

सीपीएम के पार्टी कांग्रेस में सीताराम येचुरी के साथ ज्योति बसु

ऐसा वही कर सकता है जो इतिहास में व्यक्ति और समष्टि की भूमिका समझता हो, निजी और सार्वजनिक में फर्क करना जानता हो. इस लिहाज से ज्योति बसु एक ऐसे विचार थे, जिसे व्यवहार में लाकर आदमी से इंसान होने का अर्थ जाना जा सकता है. इन दिनों ऐसा जानना कुछ ज्यादा ही जरूरी हो गया है.

भारतीय वामपंथ के कुशल प्रयोगकर्ता 

निजी जीवन में ज्योति बसु की सादगी का चरम अपने कपड़े खुद अपने हाथों से धोना और सीएम के नाते मिलने वाला सारा वेतन पार्टी के पास जमा करके होलटाइमर कार्यकर्ताओं को मिलने वाले मानदेय पर गुजारा करना भर नहीं था. बल्कि अपनी इस सिद्धांतनिष्ठ सादगी को फैलाना और राजनीति को सामाजिक परिवर्तन का उपकरण मानने की संस्कृति को विकसित करना था.

वे भारतीय वामपंथ के सबसे बड़े नेता और सबसे कुशल प्रयोगकर्ता थे. ईएमएस नंबूदिरीपाद के बाद वे पहले कम्युनिस्ट थे जिसने पूंजीवादी प्रणाली और संविधान के दायरे में रहकर प्रशासन का गरीबों की मुश्किलों को हल करने के रास्ते बनाते हुए और इसी के साथ उनकी एकता को मजबूत करते हुए किया.

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उसकी मुख्य वजह वह समझदारी थी जो राजनीतिक लाभ के लिए धर्म और जाति के साथ फ्लर्ट को अपराध मानती थी. अभूतपूर्व सांप्रदायिक हिंसा और तनाव में डूबे प. बंगाल को आज ज्योति बाबू और उनके वाममोर्चे की कमी खल रही है, जिनके 34 साल के शासन काल में 1984, बाबरी और 2002 के बावजूद हिंसा तो दूर पत्ता तक नही खड़का था.

Jyotibasu

चुटीले अंदाज वाले ज्योति बाबू 

संकोची किन्तु दृढ़, मितभाषी किंतु मुखर ज्योति बाबू बहुत नपातुला और भेद देने वाली बात बोला करते थे. भाजपा को बर्बर पार्टी कहे जाने पर एक बार प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने उनसे पूछा कि आप बर्बर क्यों कहते हैं. ज्योति बाबू का जवाब था कि धर्मस्थलों को तोड़ने वालों के लिए कोई दूसरा उचित शब्द मिल जाये तो ढूंढकर बता दीजिएगा.

एक और बहुत ही सूक्ष्म और तुर्श टिप्पणी उन्होंने तब की थी जब पत्रकारों ने उनका ध्यान एक वरिष्ठ वामपंथी नेता के मंदिर में जाकर दर्शन करने की ओर आकर्षित किया था. वे अपने चुटीले अंदाज में बोले कि उसका बुढ़ापा आ गया है, उसे लगता होगा कि अगर कोई ऊपर हुआ तो मुश्किल हो जाएगी, और मुस्कुराते हुए चल दिए.

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वे 1917 में जन्मे थे, जब रूस में पहली समाजवादी क्रांति हुई थी. वे जब गए तब वामपंथ कथित रूप से मुश्किलों में था. मगर ज्योति बाबू इस तरह की मुश्किलों को अपने राजनीतिक जीवन में काफी झेल चुके थे. तरल वाम और अति वाम दोनों भटकावों की भंवरों से निकाल कर उन्होंने भारतीय वामपंथ की नैया ही बाहर नहीं निकाली थी बल्कि वैकल्पिक नीतियों और रास्तों को लागू करके भी बताया था. आज जब देश जनहितैषी विकल्प की तलाश में है तब ज्योति बसु का किया बताया बेहद महत्त्वपूर्ण धरोहर है. सिर्फ वाम के लिए नहीं अवाम और मुल्क दोनों के लिए.

आखिर में यह कि जब इस तरह के व्यक्तित्वों की चर्चा की जाती है तो उनके सरोकारों या परिवेश से काटकर नहीं की जानी चाहिए. ज्योति बसु किसी फैक्ट्री में उत्पादित प्रोडक्ट नहीं थे. वे मार्केटिंग पर भारी खर्च करके बाजार में स्थापित किये गए ब्रांड भी नहीं थे.

वे संघर्षों की आग में तपकर, आम आदमी के हक में लड़ते हुए ही लोकप्रिय हुए थे - अंत तक उसी के लिए जिए भी. एक अपेक्षाकृत धनी परिवार में जन्मे और इंग्लैंड से बैरिस्टर बन कर आए ज्योति बसु ने राजनीति की शुरुआत अंग्रेजों के जमाने की रेलवे और चाय बागानों के बीच मजदूरों को संगठित करते हुए की थी. 1946 के चुनावों में उन्होंने लोकप्रिय कांग्रेस नेता हुमायूं कबीर को हराकर विधानसभा में प्रवेश किया था. इसी विधानसभा को बाद में उन्होंने अपनी मर्जी से ही छोड़ा.

वे भारतीय राजनीति के अकेले ऐसे नेता थे जिसकी सक्रियता का विराट हिस्सा भले एक राज्य तक सीमित रहा लेकिन जिसका नाम भर लेने से पूरे भारत की मेहनतकश जनता के मन में विश्वास और आश्वस्ति उत्पन्न हो जाया करती थी.

(लेखक सीपीएम के सेंट्रल कमिटी के मेंबर हैं)

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