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जन्मतिथि विशेष: क्या वाकई मुक्तिबोध इतने जटिल थे?

मुक्तिबोध की कविताएं लंबी होने की एक वजह यह थी कि वह कविताओं के जरिए एक पूरी पीढ़ी या पूरी सभ्यता की पड़ताल में लग जाते थे

Nidhi Nidhi Updated On: Nov 13, 2017 10:18 AM IST

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जन्मतिथि विशेष: क्या वाकई मुक्तिबोध इतने जटिल थे?

मुक्तिबोध का नाम आते ही उन्हें पढ़ने वालों, पढ़ाने वालों और महज उनका नाम सुनने वाले लोगों में सबसे कॉमन बात सुनी थी, वो यही कि अच्छा.. मुक्तिबोध... बहुत ही जटिल कवि हैं. आसानी से समझ नहीं आते या उन्हें समझना ही बहुत मुश्किल है.

कॉलेज में पढ़ाने वाले प्रोफेसर गर्व से बोलते हैं, 'मैं मुक्तिबोध पढ़ाता हूं बच्चों को.' जैसे पूरा हिंदी साहित्य समझाना एक तरफ और अकेले 'मुक्तिबोध' को समझाना एक तरफ. उन्हें पढ़ाते हुए जो सबसे पहली बात बताई जाती है, वो है, 'मुक्तिबोध, कबीर की ही तरह निर्ममता की हद तक ईमानदार हैं और उनके लिखने की प्रक्रिया उनके भीतर के द्वंद्व, बाहरी संघर्ष और बेहतर भविष्य के सपने से बनी है, जो आज के हर आम इंसान की फैंटेसी है. उनकी लगभग हर रचना इसी फैंटेसी शैली में लिखी गई है.'

आज अभिव्यक्ति की आज़ादी पर न जाने कितनी बहसें हो रही हैं, नारे लगाए जा रहे हैं, चर्चाएं हो रही हैं. मुक्तिबोध उस दौर में भी अपनी कविता के जरिए इसी अभिव्यक्ति के कहीं 'अंधेरे में' खो जाने की बात लिख रहे थे.

एक ही लंबी कविता में मुक्तिबोध ने समाज से छिन रही बोलने की आज़ादी, लोगों के मरते जा रहे सपने, इच्छाएं, जीवन भर भोगा हुआ मिडिलक्लास का संघर्ष सब समेट लिया है. मुक्तिबोध को पढ़ना वास्तव में अपने भीतर और बाहर एक लंबी यात्रा से गुजरना है.

ऐसा क्या जटिल लिख रहे थे मुक्तिबोध

मुक्तिबोध की जिस कविता के बारे में सबसे ज्यादा बातें होती हैं और जिसकी जटिलता पर विशेष क्लासेस लिए जाते हैं वो है उनकी कविता 'अंधेरे में'. ये कविता इमरजेंसी लागू होने के लगभग 10 साल पहले ही लिखी गई थी. चूंकि मुक्तिबोध की कविताएं उनके जीते जी छप नहीं पाई थी लेकिन हिंदी के वरिष्ठ कवि अशोक वाजपेयी मुक्तिबोध के साथ एक घटना का जिक्र करते हुए लिखते हैं कि उन्हें मुक्तिबोध ने एक कविता का पाठ कर के सुनाया था जो शायद 'अंधेरे में' कविता का पहला भाग था.

इस कविता में बारे में अशोक वाजपेयी लिखते हैं, 'मुझे लगता है कि यह कविता इमरजेंसी लागू होने के दस-बारह साल पहले लिखी गई थी लेकिन इसमें इतिहास में जो घटने जा रहा है, उसका पूर्वाभास मिलता है.'

लेकिन 10 साल पहले क्या, आज 50 साल से भी ज्यादा पूरे कर लेने के बाद इस कविता की लाइनें क्रांतिकारी युवाओं की टैगलाइन बन जाती है.

जैसे- अब अभिव्यक्ति के सारे ख़तरे, उठाने ही होंगे. तोड़ने होंगे ही मठ और गढ़ सब. पहुंचना होगा दुर्गम पहाड़ों के उस पार.

या फिर उनकी कविता आज के समाज में मिडिलक्लास की 'लोग क्या कहेंगे' वाली सोच पर ठीक-ठीक चोट करती है. उन लोगों पर भी जिन्होंने जीवन भर सोचा कुछ और, और झूठे आदर्शों तले दबकर कर कुछ और रहे हैं.

ओ मेरे आदर्शवादी मन, ओ मेरे सिद्धान्तवादी मन, अब तक क्या किया? जीवन क्या जिया!

ऐसी कोई भी सामाजिक, राजनीतिक और मानसिक परिस्थिति नहीं लिखी मुक्तिबोध ने, जो उस समय और आज के समय की सच्चाई को न दिखाता हो. वे चीजों को मार्क्सवादी नजरिए से देखते थे. इसलिए उनकी कविताएं समाज के सच को हू-ब-हू परिचित कराने में सफल हैं.

मुक्तिबोध पर मार्क्सवादी विचारधारा का असर था. उनकी मार्क्सवादी विचारधारा को लेकर कहा जाता है है कि छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव के दिग्विजय महाविद्यालय में पढ़ाने गए थे. उस वक्त वहां के प्रोफेसर शुक्ल जी ने मुक्तिबोध से इंटरव्यू लेते हुए कहा था, 'आप की मार्क्सवादी विचारधारा तो ठीक है पर ये यहां के बच्चों पर लागू करने की कोशिश मत करिएगा.' मुक्तिबोध ने इस घटना और शुक्ल जी और अपने बीच के अजीब किस्म के तनाव का ज़िक्र अपनी किताब विपात्र में किया है.

उनकी कविताओं से इतर भी अगर आप उन्हें पढ़ते हैं तो पता चलता कि उनका दिमाग और मन हमेशा एक दूसरे से बातें करता रहा है. एक साहित्यिक की डायरी और उनका लघु उपन्यास विपात्र भी कुछ इसी संवाद-शैली में लिखा हुआ है. उनकी कविताओं के बारे में एक और बात कही जाती है कि उन्हें जितनी बार पढ़ो हर बार नए अर्थ खुलते हैं.

पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है?

यह वह दौर था जब वामदलों का आपस में विभाजन हुआ था. ऐसे वक्त में जब हर तरफ संदेह, संशय और विश्वासभंग का माहौल था, मुक्तिबोध ने गहरे व्यंग के लहजे में पूछा,‘पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है.’

आज भी अगर आपने सत्ता में विराजमान सरकार का विरोध किया तो आपको उसी वक्त किसी दूसरी राजनीतिक पार्टी में शामिल कर दिया जाता है. उस पार्टी के विरोध में कुछ कहा तो तीसरी पार्टी में शामिल कर दिया जाता है. सोशल मीडिया पर आए दिन एक पार्टी बनती है और फिर टूट कर कब दूसरी पार्टी बन जाती है पता नहीं चलता. मतलब आज भी निष्पक्षता जैसा कुछ बचा नहीं है. ऐसे में मुक्तिबोध का सवाल आज भी मौजूं है.

अशोक वाजपेयी की यादों में मुक्तिबोध

वरिष्ठ कवि अशोक वाजपेयी ने अपने संस्मरण में कुछ इस तरह लिखा है – 'गजानन माधव मुक्तिबोध, हिन्दी कवि, लेखक, आलोचक मुक्तिबोध का पहला कविता संग्रह चांद का मुंह टेढ़ा है उनकी मृत्यु के बाद प्रकाशित हो सका. मुक्तिबोध से मेरा परिचय तब हुआ जब मेरी उम्र करीब 18 वर्ष थी. वो थोड़े ही दिनों पहले राजनांदगांव के एक महाविद्यालय में शिक्षक के रूप में आए थे. उसके बाद इलाहाबाद में आयोजित हुए एक बड़े साहित्य सम्मेलन में मैं शामिल होने गया था. मैं और मुक्तिबोध ट्रेन के एक ही डिब्बे में वापस आए. तब उन्हें थोड़ा निकट से जानने का अवसर मिला.

दिल के भरे रिवॉल्वर की बेचैनी का ज़ोर,अंधेरे में एक विराट स्वप्न फैंटेसी. मुक्तिबोध जिसकी कविता ख़त्म नहीं हुई. हम लोग उस समय बहुत जिज्ञासु थे और संसार भर की कविता को पढ़ना हमने शुरू कर दिया था. उसी समय मुक्तिबोध की कविता से हम सबका साबका हुआ. संभवतः अंधेरे में कविता का पहला पाठ और शायद मुक्तिबोध द्वारा किया गया अंतिम पाठ हम पांच-छह लोगों ने 1959 में सुना था. जो इस कविता का एक तरह का पहला प्रारूप था. इतनी लंबी कविता, इतनी अंधेरी कविता, इतनी विचलित करती कविता, लेकिन सिर्फ दूसरों को दोष देनी वाली नहीं, अपनी ज़िम्मेदारी भी मानने वाली कविता और शिल्प के माध्यम में लगभग अराजक कविता, लेकिन यथार्थ को अपने पंजों में दबोचे हुए कविता, ये हम सब के लिए बहुत चकित करने वाली थी. तब से उनसे मेरा संबंध गाढ़ा हुआ.

1964 में हमें पता चला कि मुक्तिबोध की तबीयत ख़राब है और उनको पक्षाघात हो गया है. कवि श्रीकांत वर्मा उनके बहुत प्रशंसक और घनिष्ठ थे. मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री द्वारका प्रसाद मिश्र से बात हुई. राजनांदगांव से उन्हें भोपाल के हमीदिया अस्पताल में लाया गया. मैं मई, 1964 में सागर से मुक्तिबोध से मिलने भोपाल गया. तब तक हम लोगों ने भारतीय ज्ञानपीठ को इस बात पर सहमत कर लिया था कि वो उनका पहला कविता संग्रह प्रकाशित करेगा.

मुझे संग्रह के अनुबंध पत्र पर मुक्तिबोध के दस्तख़त करवाने थे. उस समय मुक्तिबोध लेटे रहते थे और आधी-आधी सिगरेट पीते रहते थे.अनुबंध पर दस्तख़त करते हुए मुक्तिबोध का हाथ जिस तरह कांप रहा था उसे देखकर मैं थोड़ा भयातुर हुआ. मुझे लगा कि उनकी हालत ठीक नहीं है और यहां जो प्रबंध है वो शायद पर्याप्त नहीं है.

मुक्तिबोध को नई कविता के प्रमुख सिद्धांतकारों में गिना जाता है. मैं लौटकर दिल्ली आया और श्रीकांत जी से मैंने कहा कि हमें मुक्तिबोध को दिल्ली लाना चाहिए.इसके लिए हरिवंश राय बच्चन के नेतृत्व में लेखकों का एक प्रतिनिधि मंडल तब के प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री से मिला. इस प्रतिनिधि मंडल में बच्चन जी के अलावा रघुवीर सहाय, नेमिचंद्र जैन, प्रभाकर माचवे, श्रीकांत वर्मा, भारतभूषण अग्रवाल, अजित कुमार और मैं भी था.

शास्त्री जी ने फौरन कहा कि उनको एम्स (भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान) में लाया जाए. वहीं से रघुवीर सहाय ने भोपाल के मेडिकल कॉलेज के डीन को फ़ोन किया कि मुक्तबोध को फौरन दिल्ली लाया जाए. तब तक मुक्तिबोध अचेतावस्था में पहुंच चुके थे. दो-तीन दिन बाद हरिशंकर परसाई उन्हें लेकर दिल्ली आए. लेकिन मुक्तिबोध उस अचेतावस्था से अगले दो-तीन महीने तक उबरे नहीं और उसी के दौरान उनकी मृत्यु हो गई. उन्हें ट्यूबरकूलर मेनेंजाइटिस नामक बीमारी थी.

1980 में उनका दूसरा काव्य संकलन भूरी भूर ख़ाक धूल आया.उससे पहले मुक्तिबोध की प्रशंसक अग्नेश्का सोनी नामक पोलिश महिला अनुवादक उनकी बीमारी की ख़बर सुनकर उनसे मिलने राजनांदगांव गई थीं. वो अपने साथ 'अंधेरे में' आशंका के द्वीप  शीर्षक से लंबी कविता की प्रति दिल्ली लाई थीं. यह तय हुआ कि उस कविता का पाठ किया जाए. उसका पाठ श्रीकांत वर्मा और मैंने मिलकर किया. सबको लगा कि यह अद्भुत कविता है. उस पाठ के बाद तय हुआ कि इसे कल्पना के प्रशासक बद्री विशाल पित्ति को प्रकाशन के लिए भेज दिया जाए.

मुक्तिबोध के अपने जीवनकाल में उनकी दो पुस्तकें प्रकाशित हुईं – एक, कामायनी एक पुनर्विचार और दूसरी, भारतीय इतिहास और संस्कृति पर एक पाठ्य पुस्तक.

एक साहित्यिक की डायरी तब प्रकाशित हुई जब वो अचेत थे. अंधेरे में कविता कल्पना में तब प्रकाशित हुई जब वो दिवंगत हो चुके थे.'

मुक्तिबोध ने बहुत लंबी कविताएं लिखी हैं. इसकी एक वजह यह थी कि वह कविताओं के जरिए एक पूरी पीढ़ी या पूरी सभ्यता की पड़ताल में लग जाते थे. उन्होंने स्वयं कहा भी है कि उनकी छोटी कविताएं दरअसल अधूरी कविताएं हैं.

मुक्तिबोध वक्त से पहले इस दुनिया को छोड़ गए, जैसे उनकी इस कविता में उन्होंने खुद लिखा है. आप भी सुनिए 'मुझे पुकारती हुई पुकार खो गई कहीं...

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