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किसका BHU पार्ट-1: क्या एक संगठन की जागीर है विश्वविद्यालय!

शिक्षकों का अपने कामकाज से ज्यादा राजनीतिक संगठन के लिए समर्पित होना किसी भी विश्वविद्यालय के लिए खतरनाक है

Utpal Pathak Updated On: Sep 30, 2017 07:55 PM IST

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किसका BHU पार्ट-1: क्या एक संगठन की जागीर है विश्वविद्यालय!

क्या करें गुरूजी! हम रोज आपकी क्लास में नहीं आ सकते क्यूंकि हमें संघ की गतिवधियों में हिस्सा लेना होता है और संगठन के दायित्व भी देखने है. मुझे समय-समय पर माननीय कुलपति जी भी विभिन्न मुद्दों पर आवश्यक बातचीत के लिए बुला लेते हैं. (बीएचयू के एक छात्र का जवाब जब एक अतिथि प्रवक्ता द्वारा उनकी कक्षाओं से गैरहाजिरी के बाबत सवाल पूछा गया.)

आपने कभी वो तरण-ताल के पास लगने वाली शाखा देखी है? शायद नहीं! एक बार जाकर देख आइए वहां भी. हम लोग शाखा के खिलाफ नहीं हैं लेकिन परिसर के आवासीय इलाकों के आस पास क्यूं? हर चीज का राजनीतिक इस्तेमाल क्यों है? उन्हें अब आने वाले चुनावों में वोट चाहिए, इतनी कोशिशों के बावजूद भी वे चुनावों परिसर से ज्यादा वोट नहीं जुटा पाए. राजनीति, राजनीति और राजनीति के अलावा और कुछ नहीं हो रहा यहां. कोई आवाज भी नहीं उठाता और जो उठाता है उसे दण्डित किया जाता है. (आईटी बीएचयू के एक प्रोफेसर)

कभी कोशिश करिए और जाकर परिसर के अतिथि गृहों की अतिथि पंजिका का अवलोकन करिए. मुझे भरोसा है कि आप उसे देख नहीं पाएंगे और यदि आपके भाग्य से आप देख पाए तो देखिएगा कि अतिथियों की सूचि में संघ से सबंधित पदाधिकारियों की संख्या सबसे अधिक है.

इस बात पर बहस नहीं कि किसको रुकवाना है या किसका आतिथ्य सत्कार करना है इत्यादि सब कुछ विश्वविद्यालय प्रशासन का अधिकार है लेकिन एक बात का जवाब क्या कोई दे सकता है कि पूर्वांचल में राजनीतिक गतिविधियों के संचालन के लिए परिसर के इन प्रतिष्ठानों को "बेस कैम्प" की तरह क्यों इस्तेमाल किया जाता है? मैं भी इसी विश्वविद्यालय का छात्र रहा हूं और अब यहीं प्राध्यापक हूं. शाखा लगते वर्षों से देख रहा हूं, कभी किसी को असुविधा नहीं हुयी लेकिन विगत दो तीन सालों से शाखा लगने के अलावा जो कुछ हो रहा है उससे अब डर लगता है. किसी विचारधारा का पालन करने के लिए डर क्यों पैदा किया जा रहा है?" (कला संकाय के एक वरिष्ठ प्राध्यापक)

"राजनीतिशास्त्र विभाग ब्राम्हणवाद और संघ की गतिविधियों का मजबूत किला है, और ध्यान दीजिएगा कि यदि आप उनके जैसे नहीं हैं तो सिर्फ सजा मिलेगी आपको. ऐसा लगता है मानों मानव संसाधन मंत्रालय सिर्फ इसलिए इस विभाग को धन आवंटित करता है ताकि उसका और अन्य साधन संसाधन का दुरूपयोग एक विचारधारा को आगे बढ़ाने के लिए किया जा सके. विद्यार्थियों से दुर्व्यवहार आम बात है और उनके अधिकारों का हनन रोज होता है.” (कला संकाय एक अन्य वरिष्ठ प्राध्यापक)

"मेरा सुझाव है कि सभी छात्राओं साथ महिला कर्मचारियों तथा महिला प्राध्यापकों को दुर्गा वाहिनी की सदस्यता ले लेनी चाहिए. इसमें कुछ गलत नहीं और यह हमारे गौरवशाली संघ की ही एक शाखा है. नारी शक्ति स्वरूपा होती है और नारियों को विधर्मियों के खिलाफ अपनी शक्ति का प्रयोग करना आना चाहिए." (विश्वविद्यालय के एक विभागाध्यक्ष द्वारा एक विभागीय कार्यक्रम के दौरान दिया गया भाषण.)

"ए कौन लोग हैं जो केसरिया साफा बांध कर लाल टीका लगाकर दर्जनों की संख्या में मोटरसाइकिलों पर जुलूस निकालते हैं? खासतौर पर रविवार को. कभी देखा है आपने उन्हें? देखने की कोशिश करिएगा लेकिन मोबाइल से तस्वीरें लेते समय ज़रा सावधानी भी बरतिएगा, वरना आपकी सुरक्षा की जिम्मेदारी मेरी नहीं." (केंद्रीय कार्यालय के एक वरिष्ठ अधिकारी)

आप ठीक आदमी नहीं लगते. किस पार्टी से हैं आप? आपको कौन फंड कर रहा है विश्वविद्यालय को बदनाम करने के लिए? आपको तो हमारे साथ आना चाहिए, यह परीक्षा का समय है और इस कठिन समय में हमें साथ खड़े रहना होगा वरना हम सबका भविष्य अंधकारमय है. (विश्वविद्यालय के एक वरिष्ठ प्राध्यापक का जवाब जब उनसे परिसर में बढ़ती हुयी राजनीतिक गतिविधियों के लिए पूछा गया.)

जब उन्हें यह बताया गया कि यह संवाददाता भी विश्वविद्यालय का पूर्व छात्र रहा है और परिवार की तीन पीढ़ियों ने बीएचयू से ही शिक्षा प्राप्त की है तो उनका जवाब कुछ यूं मिला- 'लगता है तीन पीढ़ियों के यहां पढ़ने के बावजूद आप पर से भूत उतरा नहीं है, अब भी वक्त है, सुधर जाइए वरना शायद आगे काफी पछतावा होगा"

उपरोक्त कथन और उससे सबंधित वार्तालाप लगभग एक साल पुराना है, लभगग उसी समय जब तत्कालीन मानव संसाधन राज्य मंत्री रामशंकर कठारिया ने कहा था कि शिक्षा का भगवाकरण होने में कोई बुराई नहीं है. लेकिन कठारिया जी के कथन से काफी पहले ही बीएचयू के कुलपति इस वाक्यांश को सच साबित करने में बगैर ज्यादा हो-हल्ला किए पूरी श्रद्धा के साथ इस उपक्रम में लग गए थे. दुःखद रूप से यह सब कुछ महामना के नाम पर किया जा रहा था.

प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

देश का महानगरीय समाज जेएनयू और हैदराबाद विश्वविद्यालय में पिछले वर्ष हुयी घटनाओं के बाद अगर वाकई उद्वेलित है तो उन्हें शायद उसी समयकाल में बीएचयू में चल रही गतिविधियों का भी अवलोकन करना चाहिए था. उन्हें देखना चाहिए था कि कैसे पिछले तीन वर्षों में या विश्वविद्यालय बिना किसी की अनुमति लिए एक विशेष विचारधारा का केंद्र बन चुका है.

भाजपा समेत संघ को भी देश के उच्च शिक्षण संस्थानों के छात्रों के बीच विचारधाराओं के टकराव और अनुकरण का ज्ञान है और इसी कारणवश पिछले कुछ वर्षों में उच्च शिक्षण संस्थानों में संघ की गतिविधियों में वृद्धि हुयी. लेकिन बीएचयू का दर्जा अलग था, लिहाजा हिंदुत्व के बहाने अपने हित साधने के लिए इसे केंद्र मान कर उस पर विशेष ध्यान दिया गया.

अगर उच्च शिक्षण संस्थानों को देश की राजनीति में प्रवेश पाने की पहली सीढ़ी या प्रारंभिक नर्सरी कहा जाता है तो बीएचयू का नाम उस सूचि में स्वर्णाक्षरों में अंकित है.

स्वाधीनता आंदोलन के समय से लेकर अब तक इस विश्वविद्यालय ने दर्जनों केंद्रीय मंत्री, सांसद, विधायक और विभिन्न राज्यों में प्रतिष्ठित राजनीतिज्ञों को पाला और पोसा है. यह रिकॉर्ड इस देश की पहली संसद के साथ ही शुरू हो गया था जहां 120 से अधिक चुने हुए सांसद इस विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र थे.

इतिहास के झरोखे से संघ और बीएचयू

विश्वविद्यालय के संस्थापक महामना मदन मोहन मालवीय, तत्कालीन हिन्दू महासभा के एक वरिष्ठ सदस्य भी थे और उन्हें बाद में 1923 में महासभा का अध्यक्ष भी बनाया गया. महामना की इच्छा थी कि विश्वविद्यालय के छात्रों को शारीरिक सौष्ठव एवं सेना पद्धति का प्रशिक्षण उनकी देख रेख में हो. उस वक्त परिसर में सक्रिय संस्था विश्वविद्यालय प्रशिक्षण इकाई का बड़ा नाम था.

महामना कभी संघ के सदस्य नहीं रहे लेकिन उन्होंने कभी छात्रों को संघ की गतिविधियों में भाग लेने से नहीं रोका. उन्होंने संघ की गतिविधियों के लिए विश्वविद्यालय परिसर में कुछ स्थान भी आरक्षित कर दिए. परिसर में संघ का कार्यालय 1928 से ही अस्तित्व में आ गया जिसका प्रमुख कारण महामना की मंजूरी और एक अच्छी मात्रा में स्वयंसेवकों का जुटान था.

संघ के द्वितीय सरसंघचालक, माधव सदाशिव गोलवलकर का भी विश्वविद्यालय से लंबा नाता रहा है. वे 1925 में विज्ञान विषय से स्नातक हुए और 1927 में उन्होंने जीव विज्ञान में परास्नातक की शिक्षा प्राप्त की. उसी दौर में वे महामना के संपर्क में आए और उसके बाद वे समुद्री जीव विज्ञान में शोध करने के लिए मद्रास चले गए. लेकिन अपने पिता की सेवानिवृत्ति के कारण मिली अतिरिक्त जिम्मेदारियों के चलते उनका शोध कार्य पूरा नहीं हो पाया और वे वापस बीएचयू आ गए जहां उन्होंने तीन वर्षों तक जीव विज्ञान के प्राध्यापक के तौर पर सेवा की.

बड़े ही कम समय में वे छात्रों के बीच "गुरूजी" के रूप में प्रसिद्द हो गए और उनकी लोकप्रियता की चर्चा सर्वत्र होने लगी. उनकी लम्बी दाढ़ी, खुले हुए केश और उनका वेश विन्यास भी इतना प्रसिद्द हुआ कि लम्बे समय तक संघ के अनुयायियों ने उनका हूबहू अनुसरण किया.

गोलवलकर जब विश्वविद्यालय में सेवाएं दे रहे थे तब उनके ही एक विद्यार्थी और परम शिष्य भैयाजी दानी (जो संघ के सरसंघचालक हेडगेवार के काफी करीबी भी थे) ने वाराणसी नगर में पहली शाखा का आयोजन किया. उस दौर में गोवलकर भी नगर की शाखा की बैठकों में आते जाते थे लेकिन वे पूरी तरह समर्पित नहीं हो पाए थे. लेकिन 1931 में जब हेडगेवार वाराणसी आए तो गोलवलकर की प्रतिभा ने उन्हें खासा प्रभावित किया.

उन्होंने गोलवलकर से कहा कि उन्हें नागपुर में प्रचारकों के लिए होने वाले अधिकारी प्रशिक्षण शिविर में जाना चाहिए और उनके आदेश को गोलवलकर ने भी स्वीकार किया.

नमस्ते सदावत्सले

सुबह लगने वाली संघ की शाखाएं परिसर में पहले बड़ी ही सामान्य दृष्टि से देखी जाती थीं. लेकिन अब वहां के नियमित सदस्यों की संख्या में हो रही उत्तरोत्तर वृद्धि एक साथ कई संदेश देती है. शारीरिक सौष्ठव एवं योग के नाम पर और भी बहुत सी गतिविधियों का संचालन सुचारू रूप से हो रहा है जिसको लेकर परिसर में तरह तरह की चर्चाएं आम हैं. आम तौर पर कला संकाय के पास या यूनिवर्सिटी क्लब के आसपास आयोजित होने वाली शाखाओं का स्थान समय समय पर बदल भी दिया जाता है.

लाठी भांजते हुयी संघ सदस्यों का प्रशिक्षण और पुरुष छात्रावासों में बढ़ रही गतिविधियां दिखती सबको हैं लेकिन विरोध या सवाल नहीं करता. आज भले ही केंद्र सरकार बीएचयू मामले को गंभीरता से लेकर नाना प्रकार के नए प्रयोगों को आदेश के रूप में पारित कर रही है लेकिन वर्तमान कुलपति के आने के बाद संघ के कई वरिष्ठ पदाधिकारियों की परिसर में आवाजाही बढ़ी है. इनमें प्रमुख रूप से श्री दत्तात्रेय होसबोले और संघ के सह सरकार्यवाह डॉ कृष्ण गोपाल प्रमुख हैं.

इसके अलावा इंद्रेश कुमार समेत काशी प्रांत के अन्य पदाधिकारी भी लगातार परिसर में आते जाते और रुकते रहे हैं. पिछले वर्ष डॉ कृष्ण गोपाल ने डॉ अम्बेडकर की जयन्ती पर संघ के मुखपत्र ‘पाञ्चजन्य’ के विशेषांक का विमोचन भी परिसर में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान किया था. इसके अलावा परिसर में नारद जयंती जैसे कार्यक्रम भी अब बिना किसी शोर शराबे के आयोजित होने लगे हैं.

परिसर के विद्यार्थियों और पूर्व छात्रों के बीच एक नारा प्रसिद्द है "महामना की कामना, सदभावना- सदभावना". लेकिन यह नारा अब अन्य नारों के बीच कहीं खो सा गया है. अब न सिर्फ स्नातक और परास्नातक स्तर के छात्रों को हिंदुत्व और गैर हिंदुत्व के बीच बांटने की कवायद ज़ोरों पर है बल्कि आईआईटी एवं मेडिकल के छात्रों समेत शोध छात्रों को भी इस गुटबाज़ी का हिस्सा बनाया जा रहा है.

एक खुली सोच और आज़ाद खयाल के इतिहास को समेटा हुआ परिसर अब संकीर्ण विचारधारा को पुष्पित और पल्लवित कर रहा है जिसका फायदा संघ और उसके विरोधियों को चक्रानुक्रम में मिल रहा है.

इस विषय पर कुछ समय पूर्व की गयी बातचीत में प्रौद्योगिकी संस्थान के शोध छात्र अरविन्द सिंह बदलते माहौल को सही मानते हैं. उन्होंने बताया कि "मैं खुद ही इसी विश्वविद्यालय का शोध छात्र हूं और गत सात वर्षों से समाजसेवा और परिसर की सेवा में लगा हुआ हूं. यह हमारे प्रधानमंत्री मोदी जी के लोकप्रियता का आभामंडल है जिसके प्रभाव में विद्यार्थी भारी मात्रा में संघ और विद्यार्थी परिषद से जुड़ रहे हैं और मुझे नहीं लगता कि इसमें कुछ गलत है."

"परिषद समय समय पर स्वामी विवेकानंद जैसे महापुरुषों की जयंती का आयोजन करवाता रहता है, हम किसी पर दबाव नहीं डालते, कमोबेश ऐसा ही चरित्र शाखाओं का भी है, ये वो लोग हैं जो अपने मन से स्वतः आकर जुड़ रहे हैं. और इस बात में दो राय नहीं कि पिछले २-३ सालों में संख्या बढ़ी है.

आप चाहें तो मेरे फेसबुक वगैरह देख सकते हैं, और मैं ऐसे किसी वाट्सएप समूह का सदस्य भी नहीं हूं. हम किसी व्यक्ति विशेष का अनुसरण उसकी क्षमताओं और कार्यकुशलता के साथ नेतृत्व क्षमता के कारण कर रहे हैं क्यूंकि हमें भरोसा है कि वे देश को आगे ले जाएंगे.

BHU Lathicharge

बीएचयू में लड़कियों के प्रदर्शन की तस्वीर

वहीं दूसरी तरफ प्रौद्योगिकी संस्थान के ही कुछ अन्य छात्रों ने नाम ना छापने की शर्त पर बताया कि शोध छात्रावासों में भी छात्रों के बीच एक अघोषित दीवार है जहां एक बड़ा समूह जो विद्यार्थी परिषद से जुड़ा है और वे बाकी छात्रों को गैरराष्ट्रवादी मानते हैं.

स्वयंसेवक कुलपति

डॉ जीसी त्रिपाठी को ना सिर्फ संघ से अपने सबंधों को लेकर गर्व है बल्कि वे सामाजिक रूप से इन सबंधों को स्वीकार करते आए हैं. वे अपने हर भाषण और उदबोधन में संघ के गौरवशाली इतिहास का वर्णन किए बगैर नहीं रहते और विद्यार्थियों समेत आम जनमानस को भी पाश्चात्य सभ्यता से दूर रहने की सलाह देते हैं. वे परिसर में आयोजित होने वाले संघ के हर कार्यक्रम में हिस्सा लेते हैं फिर चाहें वो संघ के मुखपत्र पाञ्चजन्य का अनावरण हो या नारद जयंती में पत्रकारों का सम्मान.

परिसर में संघ और विद्यार्थी परिषद् की बढ़ती गतिविधियों के बारे में समाजसेवी और आईआईटी बीएचयू के पूर्व अतिथि वक्ता डॉ संदीप पांडेय ने बताया - "यह एक भयावह स्थिति है और परिसर में जिस प्रकार का लोकाचार अब प्रचलित है वो देश की उदारवादी शिक्षण पद्धति के विपरीत है. उच्च शिक्षा देने वाले संस्थानों को कभी ऐसे उद्दंड मानसिकता वाले छात्रों एवं प्राध्यापकों को बढ़ावा नहीं देना चाहिए और हालिया जरूरत किसी खास विचारधारा से अधिक बौद्धिक विकास को बढ़ावा देने की है."

डॉ संदीप पाण्डेय आगे बताते हैं कि "जिस प्रकार विरोध के स्वर को दबाया जा रहा है और शारीरिक-मानसिक यातनाएं दी जा रहीं हैं वो चिंताजनक विषय है. शैक्षिक विकास में हम अन्य अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालयों से काफी पीछे हैं. दुखद यह है कि भाजपा खुद को एक बौद्धिक पार्टी मानती है लेकिन अगर यही उनकी बौद्धिकता है जो बीएचयू समेत अन्य विश्वविद्यालयों में प्रचारित की जा रही है तो मुझे अफसोस है.

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