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किसका बीएचयू पार्ट-3: कुलपति का लाल बत्ती प्रेम और प्रॉक्टोरियल बोर्ड की ठसक

बीएचयू में नियुक्तियों को लेकर कोर्ट ने काफी सख्ती की है

Updated On: Oct 02, 2017 10:44 AM IST

Utpal Pathak

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किसका बीएचयू पार्ट-3: कुलपति का लाल बत्ती प्रेम और प्रॉक्टोरियल बोर्ड की ठसक

आज भले ही लाठीचार्ज के बाद प्रॉक्टर कर्मियों की वर्दियां बदली जा रही हैं और महिला कर्मी रखने की बात हो रही है. लेकिन बीएचयू का प्रॉक्टोरियल बोर्ड और उसके सुरक्षाकर्मी अब तक एक समानान्तर सरकार चलाते आये हैं. सुरक्षाकर्मी सेना एवं अन्य सुरक्षा इकाईयों से वैकल्पिक सेवानिवृत्ति प्राप्त किए लोग होते हैं. खाकी वर्दी में होते हैं लिहाज़ा पुलिसकर्मी सरीखा एहसास दिलाते हैं और बिना पूछे लाठी चलाने से नहीं चूकते.

यह प्रॉक्टोरियल बोर्ड नब्बे के दशक तक सीमा में रहता था. पुलिस परिसर के भीतर यदा कदा ही जाती थी लेकिन नया दशक आते ही लोकाचार बदलने लगे. छात्रसंघ भंग होने के काफी सालों बाद परिसर में पुलिस चौकी भी बनी और प्रॉक्टोरियल बोर्ड के कर्मी स्वघोषित 'रक्षक' बन गए. इन सुरक्षाकर्मियों को जब भी सामने से चुनौती मिलती है तो फौरन स्थानीय लंका थाना की पुलिस को बीच में डालते हैं. उसके बाद बात बढ़ती देखते हैं तो परिसर के वरिष्ठ प्रोफेसरों के मार्फत क्षेत्राधिकारी भेलूपुर समेत अन्य अफसरों को भी ताकीद करते हैं.

मामला बिगड़ जाने की स्थिति में जिलाधिकारी समेत पुलिस के आला अफसरान को फोन करके गुहार लगाते हैं. शीर्ष पदों के अफसर बीएचयू के आंतरिक मामले को ज़िले की कानून व्यवस्था की जद में घुसते देख हरकत में आते हैं और कुछ मिनटों में सब व्यवस्थित करके वापस इन्ही लोगों के हाथ में दे देते हैं.

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लाठी डंडों का उपयोग छात्र छात्राओं, डाक्टरों, मरीजों समेत अन्य किसी पर पर ऐसे किया जाता है मानों वे कोई भेड़ बकरी हों. इन सुरक्षाकर्मियों की खाकी वर्दी के सन्दर्भ में वाराणसी के अधिवक्ता आशुतोष त्रिपाठी ने आरटीआई मांगी थी जिसके जवाब में उन्हें संतोषजनक उत्तर नहीं मिले थे. जवाब में यह लिखा गया कि वे यही वर्दी पहनते आये हैं इसलिए अब भी वही पहन रहे हैं.

बीएचयू में हुए हालिया विवाद के बाद पुलिस प्रशासन की ओर से इन सुरक्षाकर्मियों की वर्दी बदलने के आदेश दे दिए गए हैं.

नैतिकता के पैरोकार कुलपति

कुलपति डॉ जीसी त्रिपाठी नैतिकता के पाठ पढ़ाने में कभी पीछे नहीं रहे, इसे क्रम में 20 मई 2016 को उन्होंने एक पुरुष छात्र और एक महिला छात्रा को रुइया छात्रावास के बगल वाली सड़क पर पकड़ लिया और उनके घरवालों को फोन कर दिया. उन दोनों का अपराध सिर्फ इतना ही था कि वे एक दूसरे का हाथ पकड़ कर चल रहे थे. इस प्रकार की नैतिकता का पाठ वीसी लगातार सबको पढ़ाते आये हैं.

कुलपति का लाल बत्ती प्रेम

कुलपति जी को अपने लम्बे चौड़े काफिले और अपनी गाड़ी पर लाल बत्ती लगा कार चलने का शौक काफी दिनों तक था. सफेद ऐम्बेसडर कार के आगे पीछे दो तीन गाड़ियों में बैठे हथियारों से लैस सुरक्षाकर्मी उन्हें किसी केंद्रीय मंत्री होने जैसा एहसास करवाते थे. इस लाल बत्ती के प्रयोग के निमित्त जब डॉ अवधेश दीक्षित ने सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगी तो उन्हें बताया गया कि इस बत्ती का उपयोग पूर्व के कुलपतियों द्वारा किया जा रहा था लिहाजा इसे हटाया नहीं जायेगा.

डॉ अवधेश दीक्षित ने हमें बातचीत में बताया -"आपने देख ही लिया कि कैसा गैरज़िम्मेदारी भरा जवाब उनकी तरफ से आया है, उन्होंने इस सन्दर्भ में कोई माफी भी नहीं मांगी. अब भी आप मुझसे मेरा जवाब पूछ रहे हैं? मुझे खेद है कि इस बाबत अब आपकी कोई मदद नहीं कर पाउंगा.

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हालांकि बाद में कुलपति को सरकार की नई गाइडलाइन्स आने के बाद  लाल बत्ती का त्याग करना पड़ा.

स्वयंसेवक कुलपति

समाजसेवी और आईआईटी बीएचयू के पूर्व अतिथि वक्ता डॉ संदीप पाण्डेय ने सूचना के अधिकार के तहत कुलपति डॉ जीसी त्रिपाठी की शैक्षणिक योग्यता और उनके किए और करवाए गए शोध कार्यों की जानकारी इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग से मांगी तो उन्हें भी चौंकाने वाले जवाब मिले जिसमे लिखा गया था इस विषय पर विभाग के पास कोई जानकारी नहीं है. और न ही विभाग को डॉ त्रिपाठी की देख रेख में हुए शोध कार्य एवं शोध प्रपत्रों के बाबत कोई जानकारी है.

डॉ संदीप पाण्डेय बताते हैं कि मैंने आरटीआई के माध्यम से कुलपति के विषय में जानकारी मांगी तो जवाब क्या मिला वो आपके सामने है. बात यहीं खत्म नहीं होती क्यूंकि नियुक्ति से सबंधित एक दूसरे मामले में भी उनकी भूमिका संदिग्ध है. बड़ी ही सफाई से कुलपति उन प्राध्यापकों को बचा रहे हैं जिन्होंने साहित्यिक चोरी की है. उनमे से दो तो राजनीति शास्त्र विभाग में ही हैं जिनकी नियुक्ति भी हुयी और अन्य सुविधायें भी दी गयीं.

(डॉ पांडेय का इशारा सितम्बर 2015 में राजनीति शास्त्र विभाग में हुयी दो नियुक्तियों की तरफ था. इनमे सत्यपाल यादव और अशोक कुमार सोनकर की प्राध्यापक के पद पर नियुक्ति हुयी थी. दोनों ही विश्वविद्यालय के छात्र रहे हैं और दोनों के शोध कार्य संदेह के दायरे में हैं. सत्यपाल का शोध "काशी के गंगा घाट" नामक पुस्तक की हूबहू प्रति है एवं अशोक के शोध में "गढ़वाल का इतिहास" नामक पुस्तक से अधिकतर अंश हूबहू उठा लिए गए हैं. इन दोनों ही से हमने सम्पर्क साधने की लगातार कोशिश की लेकिन इनकी तरफ से इस बाबत कोई जवाब नहीं आया.)

इन नियुक्तियों के बाबत विभाग के ही एक वरिष्ठ प्राध्यापक ने एक शिकायत पत्र लिख कर कुलपति को इन नियुक्तियों के सन्दर्भ में सूचित किया था. 16 नवम्बर 2015 को लिखे गए इस पत्र में नियुक्तियों में गड़बड़ी समेत राष्ट्रवाद के नाम पर होने वाली राजनैतिक गतिविधियों और विभाग में शिक्षा के गिरते स्तर का उल्लेख किया गया था जिसका जवाब शायद अभी तक उन्हें प्राप्त नहीं हुआ है.

इतिहास विभाग

सिर्फ राजनीति शास्त्र विभाग ही नहीं बल्कि इतिहास विभाग भी उसी राह पर है. पिछले दिनों एक बड़ा अजीब सा निर्णय विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा लिया गया जिसमे डॉ अरुणा सिन्हा को तीसरी बार विभागाध्यक्ष पद पर नियुक्त किया गया. नियमावली के अनुसार किसी प्राध्यापक को विभागाध्यक्ष को एक से अधिक बार रहने की अनुमति नहीं है और ऐसा सिर्फ एक परिस्थिति में होता है जब कोई उपयुक्त प्राध्यापक ना उपलब्ध हो. लेकिन यहां एक उपयुक्त प्राध्यापक डॉ बिन्दा परांजपे के होने के बावजूद डॉ अरुणा सिन्हा को दोबारा तवज्जो दी गयी.

डॉ सिन्हा का संघ से जुड़ाव किसी से छिपा नहीं है और वे अपने ओजस्वी वक्तव्यों के माध्यम से हिंदुत्व की विचारधारा का उल्लेख अपने भाषण और उद्बोधन में करती रहती हैं. उन्होंने भी हमारी लगातार कोशिशों के बावजूद इस मुद्दे पर हमें कोई जवाब नहीं दिया. इलाहाबाद विश्वविद्यालय से जुड़े कुछ वरिष्ठ प्राध्यापकों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि डॉ त्रिपाठी वहां अपना ज्यादा समय शिक्षक संघ की राजनीति में बिताते थे और संघ के साथ उनकी काफी नज़दीकियां थीं.

पिछले वर्ष इन सभी मामलों के सन्दर्भ में इस संवाददाता ने बीएचयू के कुलपति से मुलाकात करने की कोशिश की लेकिन मिलने नहीं दिया गया. फोन पर लगातार प्रयास करने के बाद किसी तरह उन्होंने कुछ जवाब दिये जो अक्षरशः वर्णित हैं

"देखिए आपको किसी राजनैतिक विचारधारा को परिसर के साथ जोड़ कर नहीं देखना चाहिये, ठीक है कि मन भी उस गौरवशाली संस्था का जिसका नाम संघ का सदस्य था लेकिन मैंने कभी वो विचारधारा विद्यार्थियों पर थोपी नहीं."

"परिसर में संघ का कार्यालय और गतिविधियों का होना कोई नया उपक्रम नहीं है, यह दशकों से वैसा ही है, बसंत पंचमी को होने वाला पथ संचलन भी उसी क्रम में आयोजित होता है तो उसमें गलत क्या है? शाखा लगती है तो लगने दीजिये और आपको लिखना है तो यह भी लिखिये की सरकार में कई पदों पर संघ के लोग हैं. क्या आपको यही सब लिखना है? ये कैसी पत्रकारिता है?

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"देखिये! अगर आपको पिछले कुछ वर्षों से परिसर में हो रही गतिविधियों का अंदाजा है तो आप उन प्राध्यापकों से सवाल क्यूं नहीं पूछते जो यहां जेनएयू, हैदराबाद विश्वविद्यालय और जाधवपुर विश्वविद्यालय जैसे संस्थानों से आते हैं और भेदभाव फैलाने का काम करते हैं. ये आजकल उनका बीएचयू से इतना लगाव क्यों हो गया है? उन्हें अपनी मानसकिता और विचारधारा को इस परिसर में बढ़ावा देना है और मेरे रहते ऐसा कभी नहीं होगा.'

"आपको दिख नहीं रहा कि अचानक से ये आम आदमी पार्टी वाले लगातार परिसर में क्यों आ रहे हैं? उन्हें इस परिसर से क्या लेना देना है? और वो साइबर लाइब्रेरी को 24 घंटे खोलने की मांग क्यूं कर रहे हैं? दरसअल वे सिर्फ माहौल बिगाड़ रहे हैं और कुछ नहीं."

"पूज्य गुरूजी और अन्य कई विभूतियों ने यहीं से शिक्षा प्राप्त की है, परिसर ने संघ की विचारधारा का सम्मान रखने वाले कई विद्वानों को पोषित किया है. उनके बताये हुए रास्ते का अनुसरण करना कहां से गलत है."

अंत में कुलपति जी ने इस संवाददाता को भी नैतिकता पर एक छोटा व्याख्यान देते हुआ कहा - "एक पत्रकार के रूप में आपका समाज के प्रति बड़ा दायित्व है. आपको परिसर में चल रही इन गैर राष्ट्रवादी संगठनों की गतिविधियों के बारे में भी लिखना चाहिये. मैं राष्ट्रवाद का समर्थक हूं और मैं अगर विद्यार्थियों को ही इसका पालन करने को कहता हूँ तो इसमें गलत कुछ नहीं. मुझे एक विश्वविद्यालय का नाम बताईये जहां साइबर लाइब्रेरी 24 घंटे खुली रहती हो. मुझे भरोसा है कि ऐसा कहीं नहीं होता लेकिन आप कभी वो नहीं लिखेंगे."

लेकिन परिसर में संघ और विद्यार्थी परिषद की बढ़ती गतिविधियों और प्रभाव के बार बार पूछे जाने पर भी कुलपति जी की तरफ से कोई जवाब नहीं मिला और उन्होंने यह कह कर फोन काट दिया कि वे व्यस्त हैं.

विश्वविद्यालय की एक वरिष्ठ महिला प्राध्यापिका बताती हैं

'उनके (कुलपति) हिसाब से सब कुछ को तुरंत बदल दिया जाना चाहिये, और सबको संघ या भाजपा में शामिल हो जाना चाहिये. वो न हो पाने की स्थिति में बजरंग दल या दुर्गा वाहिनी में शामिल हो जाना चाहिये तभी यह विश्वविद्यालय आगे बढ़ पायेगा. लेकिन मुझे लगता है कि विचारधारा थोपने के चक्कर में वे यह भूल गए हैं कि इससे विश्वविद्यालय की गरिमा को कितना नुकसान हो रहा है और शिक्षण पर कितना गलत असर पड़ रहा है.

पिछले वर्ष वार्षिक परीक्षाओं की तिथियों को आगे बढ़ा दिया गया था और सत्रावसान सही समय पर नहीं हो पाया. लेकिन क्या किसी जिम्मेदार व्यक्ति ने इसके खिलाफ कुछ कहा? नहीं कहा क्योंकि किसी की हिम्मत नहीं.

परिसर में चल रहे इस अतिरेक के विषय में वाराणसी के वरिष्ठ पत्रकार एवं विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र श्री अमिताभ भट्टाचार्य बताते हैं, "वाराणसी का निवासी होने के साथ विश्वविद्यालय का छात्र होने के नाते मुझे बेहद अफसोस है कि पिछले कुछ सालों से परिसर में ऐसी गतिविधियां चल रही हैं. हमने छात्र राजनीति और आन्दोलन को दशकों से लगातार देखा है लेकिन अब जो हो रहा है वो सिर्फ उपद्रव है. मुझे दुःख है कि यह सब उन आंखों के सामने हो रहा है जिन्हे यह सब होते हुए रोकना था."

"मुझे भरोसा है की अगर केंद्र सरकार "संघ के मुताबिक़ राष्ट्रवाद कैसा हो' नामक विषय की परीक्षा लेगी तो उस विषय में वर्तमान कुलपति को पूर्णांक मिलेंगे. भले ही वे अपने शैक्षणिक जीवन में एक सामान्य से शिक्षक रहे हों लेकिन उनकी क्षमता अब अचानक से इतनी ज्यादा हो गयी है कि वे इस पद की नहीं बल्कि देश के अन्य बड़े संवैधानिक पदों जैसे कि रिजर्व बैंक का गवर्नर, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के प्रमुख जैसे किसी भी पद को सुशोभित कर सकते हैं."

"उससे दुःखद भूमिका हमारी मीडिया की है. मुझे इस लाठीचार्ज की घटना से पहले की कोई एक खबर बताईये जहाँ संघ की गतिविधियों और विद्यार्थी परिषद के बारे में कुछ लिखा गया हो. मुझे यकीन है कि आप इस बात से बावस्ता हैं कि बीएचयू एक बड़ा विज्ञापनदाता है लिहाजा मीडिया संस्थानों को मोटी रकम साल भर में विज्ञापन के माध्यम से प्राप्त होती है. और पत्रकारों को भी समय समय पर परिसर के अस्पताल एवं अन्य सुविधाओं और अनुकम्पाओं की आवश्यकता पड़ती है, ऐसे में पानी में रह कर मगर से बैर कौन लेगा भला?

हमने परिसर में हो रही गतिविधियों के बाबत संघ के सह प्रचार प्रमुख इंद्रेश कुमार से सम्पर्क करने की कोशिश की लेकिन उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया. इंद्रेश कुमार लगातार परिसर आते हैं और भविष्य की योजनाओं पर बैठकों को सम्बोधित भी करते हैं. दो वर्ष पहले विश्वविद्यालय में दीक्षांत समारोह पर पहना जाने वाला गाउन बदल कर नये वस्त्र प्रयोग में लाये जाने का एक आदेश जारी हुआ था. अब पुरुष छात्रों को कुरता पायजामा पहनना होता है और छात्राओं को साड़ी इसके अलावा एक नारंगी साफा लगाना अनिवार्य है.

नियुक्तियों पर सख्त कोर्ट

इसी साल अप्रैल के महीने में माननीय इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने बीएचयू की नियुक्तियों पर रोक भी लगाई है. विवेकानंद तिवारी और डॉक्टर आनंद देव राय द्वारा दाखिल की गयी याचिकाओं की सुनवाई के बाद विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित की गयी विज्ञापन संख्या 2/2016-17 के माध्यम से 500 से ज्यादा शैक्षणिक पदों पर की जाने वाली नियुक्तियों पर उच्च न्यायालय ने रोक लगा दी है. इतना ही नहीं विज्ञापन संख्या 2/2016-17 द्वारा की गयी नियुक्तियों को निरस्त भी कर दिया है.

प्रकाशित विज्ञापन में रोस्टरिंग द्वारा निर्धारित आरक्षित पदों में की गयी गड़बड़ी तथा नियुक्तियों के मानकों में व्यापक तौर पर की गयी अनियमितताओं को संज्ञान में लेते हुए कोर्ट ने ये निर्णय दिया है. यह याचिका, कुलपति गिरीश चंद्र त्रिपाठी के द्वारा की नियुक्तियों में फर्जी डिग्री धारक अयोग्य लोगो को नियुक्त करने के बाद दायर की गयी थी.

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(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं.)

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