S M L

डिप्रेशन: मुश्किल वक्त में अपनों का साथ बचा सकता है जिंदगी

अवसाद से ग्रस्त रोगी पूरी कोशिश करेगा कि आप उनके करीब न आएं, लेकिन फिर भी आप उनका साथ मत छोड़िए. क्योंकि वो अगर कहें न, तो भी उन्हें प्यार की ज़रूरत है, ये समझिए और बस उन्हें संभाल लीजिए

Updated On: Jun 13, 2018 10:01 PM IST

Monika Manchanda

0
डिप्रेशन: मुश्किल वक्त में अपनों का साथ बचा सकता है जिंदगी

पिछले कुछ दिन काफी डरावने साबित हुए. एक पीढ़ी ने अपने दो नायक खो दिए और एक समाज ने अपना प्रखर नेता. ये नाम हैं केट स्पेड और एंथनी बोर्डेन के. ये ऐसे लोग थे जो हमें ज़िंदगी जीने के लिए प्रेरित करते थे और लोगों को इनसे काफी उम्मीदें भी थीं. दोनों ने अपनी ज़िंदगी ख़त्म करने का फैसला कर लिया. सोशल मीडिया पर इन दोनों घटनाओं को लेकर बहुत सी बातें कही जा रही हैं. कुल मिला कर ये कि इन दो आत्महत्याओं ने हमें बुरी तरह हिला कर रख दिया है. ये अहसास गले नहीं उतर रहा कि हमने सचमुच इन दो नायकों को खो दिया है.

अभी इन दो शख्सियतों के जाने से लोग संभले भी नहीं थे कि बीते मंगलवार को इंदौर में मशहूर आध्यात्मिक गुरू भय्यू जी महाराज ने खुद को गोली मार कर आत्महत्या कर ली. ये घटनाएं पहले चौंकाती हैं फिर भ्रम पैदा करती हैं. कुछ समझ नहीं आता कि इतनी बड़ी शख्सियत वाले लोग, जो मानसिक तौर पर बहुत मजबूत होते हैं, कैसे अपनी ज़िंदगी ख़त्म कर लेते हैं. कौन से वे विचार होते हैं, जो उनकी सकारात्मक सोच को दरकिनार कर जीवन समाप्त करने की ओर उन्हें धकेलते हैं. ध्यान से देखें तो ऐसी घटनाओं के सामने आने के बाद जो विचार हमारे मन में आते हैं.

- कुछ लोग सोचते हैं कि आखिर इतने नामी लोगों ने खुदकुशी क्यों की ? इनके पास तो जीवन में सब कुछ था. बहुत ग़लत किया ऐसा करके.

- कुछ लोग ऐसी घटनाओं के बारे में सुन कर एकदूसरे के लिए सलाहों की भरमार लगा देते हैं. कैसे अपना ख्याल रखें. ये करें, वो न करें. मज़े की बात कि हर शख्स दूसरे शख्स से यही कहता पाया जाता है कि कभी कोई ज़रूरत महसूस हो, तो तुरंत फोन उठाओ और मुझे कॉल करो. लेकिन ऐसा कदम मत उठाना.

- ऐसे भी लोग हैं जो ऐसी घटनाओं से बहुत खिन्न हो जाते हैं और कहते हैं कि भई अगर किसी ने अपनी ज़िंदगी ख़त्म करने का फैसला कर ही लिया है तो हम उसमें क्या कर सकते हैं. इसलिए हमें किसी अपराध बोध से ग्रस्त होने की बजाय आगे बढ़ने की सोचना चाहिए.

लेकिन असल बात ये है कि डिप्रेशन से गुज़र रहे या ख़ुदकुशी के लिए मानसिक तौर पर तैयार बैठे शख्स के लिए ये सारी बातें बड़ी बेवकूफाना होती हैं. डिप्रेशन या अवसाद आपके दिमाग के उन कोनों से बड़े चोरी-छिपे आता है, जिन कोनों का कभी आपको पता भी नहीं चलता. ये अहसास होते-होते पूरी ज़िंदगी निकल जाती है.

depression2

असल बात ये कि खुदकुशी करने वाला स्वार्थी नहीं होता कि सिर्फ अपने बारे में सोच रहा हो. सच बात ये कि दरअसल, वो अपने बारे में सोच ही नहीं रहा होता. खुद से उपजी निराशा का बहुत थोड़ा हिस्सा ही होता है खुदकुशी के लिए प्रेरित करने में. जिस मानसिक दशा और तकलीफ से खुदकुशी से पहले कोई शख्स गुज़र रहा होता है, उससे निकलने का बस एक ही रास्ता उसे सूझता है और वो है अवसाद के गहरे और गहरे अंधेरे कुंए में उतरते जाना.

ये दर्द सिर्फ हमारा नहीं होता. ये हमारे रिश्तों, हमारे करीबियों सबमें उतरता है. आपको उस अंधेरे से निकालने के लिए आपके करीबी पूरी कोशिश करते हैं. लेकिन ऐसा वक्त भी आता है जब हर कोई आपकी मदद करने की कोशिश तो करता है, लेकिन धीरे-धीरे खुद को असहाय महसूस करने लगता है. अंधेरे से उजाले में आपको लाने की पूरी कोशिश जैसे ही बेकार साबित होने लगती हैं, परिस्थितियों और एक-दूसरे पर दोष मढ़ा जाना शुरू हो जाता है.

डिप्रेशन एक बड़े काले खूंखार कुत्ते की तरह है

मैंने बहुत पहले एक लेख पढ़ा था जिसमें डिप्रेशन को एक बड़े काले खूंखार कुत्ते का तरह बताया गया था. कि जब हम उस कुत्ते के साथ होते हैं, तो हम उसे पास महसूस तो कर सकते हैं, उसके पास तक जा नहीं सकते. मतलब साफ है. हम खुद को कई बार नहीं समझ पाते और आंशिक रूप से यह भी खुदकुशी की ओर धकेले जाने की वजह होती है. आंखें खोलकर दुनियावी कामों में लगना भार की तरह लगने लगता है. ऐसे समय में अपनी मनोदशा पर बात करना ऐसा ही है जैसे टूटी टांग से माउंट एवरेस्ट की चोटी चढ़ना.

ज़रा ईमानदारी से सोचें. अगर अवसाद से ग्रस्त हो कर मैं आपको कॉल करूं और खुदकुशी की अपनी इच्छा बताऊं, तो आपकी प्रतिक्रिया क्या होगी. आपके इतने सवाल होंगे कि खुदकुशी करना उन सवालों को झेलने से आसान होगा. इसीलिए अवसाद के 10 में से 9 मरीज़ों को बताया जाता है कि उन्हें इससे बाहर आने की ज़रूरत है.

हो सकता है कि आपको लगे कि हम ऐसा कहकर स्वार्थी हो रहे हैं. ऐसे में मैं सिर्फ खेद प्रकट कर सकता हूं. बात सिर्फ इतनी है कि हमें मदद की तो ज़रूरत होती है, लेकिन वो कहां से मिले, ये हमें पता नहीं होता. अवसाद से ग्रस्त शख्स सबको इस प्रक्रिया से बाहर करने की कोशिश करता रहता है, क्योंकि वह खुद भ्रमित, डरा हुआ और असहाय महसूस कर रहा होता है. ये ऐसा एहसास है कि उसे समझ ही नहीं आता कि वो इससे कैसे निपटें. हम जानते हैं कि मानसिक तौर से ताकतवर लोगों को तो पता होता है कि वे इन चीज़ों से कैसे निपटें. लेकिन जब जो शख्स अवसाद के गहन अंधकार में उतरा हुआ है उसे सिर्फ ये महसूस होता है कि अब कोई चारा बचा नहीं. अब बस खुद की जान लेने के अलावा कोई रास्ता नहीं है. सिर्फ तभी दुख और तकलीफ खत्म हो सकती है. मेरे भी दुख खत्म होंगे और उनके भी जो मेरे बारे में सोच सोच कर परेशान हैं.

थोड़ी सी कोशिश से हम खुदकुशी की भावनाओं को काबू कर सकते हैं

अवसाद के रोगी को सुरक्षा की ज़रूरत तो है लेकिन किसी और से नहीं , बल्कि स्वयं से. लोग उनकी मदद के लिए जब सामने आते हैं, डिप्रेशन का रोगी हर वो काम करता है जो उसे नहीं करना चाहिए. आदमी का चरित्र, उसकी रंगत ही ऐसी है. लेकिन रोगी की भावनाओं को काबू न किया जा सके, ऐसा भी नहीं है. थोड़ी सी मदद और थोड़ी सी कोशिश से हम उसकी खुदकुशी की भावनाओं को काबू कर सकते हैं.

लेकिन अगर आत्महत्या की भावना आ ही जाए, तो क्या किया जाए. मेरे ख्याल से दो काम हो सकते हैं. पहला, समय पर पेशवर लोगों की मदद ली जाए. जो शख्स अवसाद में है, अगर आप उस के परिवार से हैं, तो शायद आपके लिए ये थोड़ा आसान हो. अगर आप उस शख्स के दोस्त हैं और आपको लगता है उन्हें अवसाद से बाहर लाने के लिए कुछ करना ज़रूरी है, तो आप उनके परिवार से बात करें. हो सकता है कि परिवार को ये सब बातें नागवार गुज़रें, लेकिन उस शख्स को बचाने के लिए आपको ये करना ही होगा.

Depression

रोगी को डॉक्टर के पास ले जाएं. भारत में ज़्यादातर लोग अवसाद से मुक्ति पाने के लिए दवा लेने मे हिचकते हैं. किसी डॉक्टर या थेरेपिस्ट के पास जाना उनके लिए थोड़ा आसान होता है. तो ठीक है, थेरेपिस्ट की ही मदद लें. एक अच्छा थेरेपिस्ट या तो बातचीत से रोगी को समझा देगा कि दवाएं लेने में कोई बुराई नहीं है. या फिर बिना दवाओं के उसे जीना सिखा देगा.

दूसरा तरीका थोड़ा मुश्किल है, लेकिन करना होगा. अवसाद के रोगी को अकेला न छोड़ें. हमेशा उसके आस-पास रहें. अगर वो आपके फोन नहीं उठाए, तो भी कॉल करते रहिए. अगर वो कोई फालतू बात करे तो भी उनकी बात सुनिए और टूट कर रोने लगें तो उन्हें प्यार से थाम लीजिए. अवसाद से ग्रस्त रोगी पूरी कोशिश करेगा कि आप उनके करीब न आएं, लेकिन फिर भी आप उनका साथ मत छोड़िए. क्योंकि वो अगर कहें न, तो भी उन्हें प्यार की ज़रूरत है, ये समझिए और बस उन्हें संभाल लीजिए.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
#MeToo पर Neha Dhupia

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi