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चौथाई सदी गुजर गई लेकिन भंवरी वहीं है जहां खड़ी थी

वो साल 1992 के गर्मियों के दिन थे. गर्मी के दिनों में हुई उन घटनाओं ने भंवरी जिंदगी को हमेशा के लिए बदल डाला था.

Rashmi Singh Updated On: Mar 10, 2018 09:28 AM IST

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चौथाई सदी गुजर गई लेकिन भंवरी वहीं है जहां खड़ी थी

भंवरी देवी अपने पति के साथ खेत में काम कर रही थी कि उस पर पांच लोगों ने यौन-हमला किया. उसके पति को डंडे से पीटा. भंवरी ने पति को बचाने की कोशिश की तो उसे भी मारा और गंदी गालियों की बौछार कर दी. भंवरी ने रहम की भीख मांगी लेकिन उसके रोने-गिड़गिड़ाने का कोई असर ना हुआ. दो हमलावरों ने उसके पति को पीट-पीटकर जमीन पर गिरा दिया, बाकी तीन ने उसके साथ बलात्कार किया.

भंवरी देवी ने इस वाकये का सिलसिलेवार जिक्र कई दफे किया है- कभी अदालत में तो कभी पुलिस के सामने, कभी प्रेस के लिए और कभी सार्वजनिक मंचों पर. और, आज उसकी कहानी एक प्रतीक में ढल चुकी है, एक ऐसे प्रतीक में जो बताता है कि बड़ी गहराई तक जड़ें जमा चुके पितृसत्ता के अदब-कायदे बेपटरी होने पर कैसा भयावह रूप ले सकते हैं!

उसके गांव जाने से पहले मैंने उसे फोन किया, जानना चाहा कि क्या वह मुझसे बात करना चाहती है. उसने यह भी नहीं पूछा कि आखिर बात कौन सी करनी है. वो जानती थी. 'जब चाहो, चली आओ'- उसने बस इतना कहा.

एक अजब वीरांगना

दरवाजे पर अजनबियों को खड़ा देख उसकी भूरी आंखों में एक चमक जागती है. उसे उम्मीद थी कि हम आएंगे. वह दरवाजे पर खाली पैर खड़ी है, पैर की अंगुलियों में बिछिया है और टखने पर झूलता कड़ा ! दोनों इस बात की दलील दे रहे हैं कि उन्हें बेख्याली से पहन लिया गया है. 'मुझे आज अपनी आंख की जांच करवाने जयपुर जाना था लेकिन आपको यहां आना था सो मैं रुक गई,' वह मुझे घर के भीतर ले जाते हुए एक भरपूर मुस्कुराहट के साथ कहती है.

उम्र के पांच दशक पार पहुंची भंवरी सुंदर दिखती है. उसने घाघरा चोली पहन रखा है जो भारत के इस इलाके में महिलाओं का आम पहनावा है. ललाट पर गहरे लाल रंग की बिन्दी, पतली कलाइयों में लाल चूड़ियां उसके सधवा होने का संकेत कर रही हैं. इस इलाके की ज्यादातर औरते घूंघट काढ़ती हैं. भंवरी ने घूंघट नहीं किया लेकिन चटख नारंगी रंग का दुपट्टा शायद ही उसके माथे से कभी फिसलता है.

वह एक भरपूर मुस्कान से मेरी ओर देखती है और किसी अभिभावक के से अंदाज में मेरा हाल-चाल पूछती है. मैं विस्मय में हूं, टकटकी बांधकर उसकी तरफ देखती हूं. खोजती हूं कि उसके चेहरे पर पड़ती उम्र की लकीरों में कहीं तो अपने लिए आत्म-दया का पुट होगा. लेकिन ऐसा कोई निशां नजर नहीं आता. उसे अपने ऊपर यकीन है, उसका भरोसा कभी डिगा नहीं. दुनिया की नजरों में वह बालात्कार की शिकार एक पीड़िता हो सकती है लेकिन खुद अपनी नजरों में कत्तई नहीं!

वह हमें एक छोटे से कमरे में ले जाती है. एक जन के लिए बिछावन लगा है, उसके बगल में साथ ही साथ चारपाई रखी है. कोने में जूट का गट्ठर पड़ा है. कमरे में हिंदू देवी-देवताओं के पोस्टर सजे हैं. दीवार पर एक कलैंडर लटक रहा है. कमरे में सजावट का बस यही सामान है.

हम एक-दूसरे के सामने बैठे हैं, मैं दिल्ली से भटेरी तक के अपने सफर के बारे में बात कर रही हूं लेकिन मन में चल रहा है कि मुद्दे की बात किस तरह उठाऊं.

'मैं तुम्हें ऐसा क्या बता सकती हूं जो लोगों को पहले से ही नहीं पता ?' जिस बात को शुरू करने के लिए मैं भीतर ही भीतर जूझ रही थी उसे उसने खुद ही शुरू कर दिया.

उसके पति मोहनलाल प्रजापत अपराध के एकमात्र गवाह हैं, वे चाय लेकर आ रहे हैं. हमारे स्वागत में उनके होठों पर एक मुस्कान उभरती है. भंवरी की तरह वे भी अनजान होने का कोई दिखावा नहीं करते. डिस्पॉजिबल कप में चाय ढालते हुए वे उन सारी बातों को कह जाते हैं जो मैं अपने रिसर्च के जरिए पहले से जानती हूं:

हमलावर भी भटेरी गांव के ही थे. वे गुर्जर थे, गुर्जर जाति की सीढ़ी पर कुम्हारों से ऊंचे माने जाते हैं, भंवरी कुम्हार जाति की है. वे नाराज थे कि भंवरी उनके परिवार की नौ माह की बेटी के ब्याह का विरोध कर रही है. क्रूर सबक सिखाने की नीयत से उन लोगों ने भंवरी का सामूहिक बलात्कार किया.

मोहनलाल कहते हैं, 'हमें नहीं पता था कि कुछ ऐसा होगा.' लेकिन खेत में काम करते वक्त हमला यों ही नहीं हुआ. यौन-हमले के बहुत पहले से हमलावरों ने गांव के ऊंची जाति के लोगों से सांठगांठ शुरू कर भंवरी और उसके पति को अलग-थलग करना शुरू कर दिया था. भंवरी ने जिस दिन शादी के बारे में पुलिस को इत्तिला दी उसके बाद से दोनों हमलावरों ने उसे कई दफे धमकी दी थी.

'उन्हें अपमान लगा कि एक औरत के कारण ब्याह में बाधा पड़ रही है. वे बदले में मेरा अपमान करना चाहते थे.' भंवरी ने बताया.

सांत्वना के शब्दों से कोसों दूर, खेत में निस्सहाय और किसी मृतक के समान गिरी पड़ी भंवरी ने एक हैरतअंगेज और साहसी फैसला लिया. उसने चुप्पी तोड़ने का निर्णय लिया, फैसला किया कि वह बलात्कार की शिकायत लिखवाएगी.

बलात्कार की घटना साल 1992 में हुई थी और उस वक्त भंवरी को पता नहीं था कि मामले को अपने अंजाम तक पहुंचने में इतने साल लग जाएंगे. यह 2018 है और भंवरी को अब भी मामले में इंसाफ का इंतजार है.

लेकिन उस सामाजिक लांछन का क्या जो अपराध के वक्त से उसके साथ आ जुड़ा है ? मैंने इस बारे में उससे जानना चाहा. 'मैंने क्या गलत किया ? यह तो उन लोगों के लिए शर्मिंदा होने की बात है.' भंवरी ने बिल्कुल हकबयानी के अंदाज में जवाब दिया. उसे अपने फैसले पर तनिक भी पछतावा नहीं था.

वो साल 1992 के गर्मियों के दिन थे. गर्मी के दिनों में हुई उन घटनाओं ने उसकी जिंदगी को हमेशा के लिए बदल डाला था. लेकिन 1992 के बाद जो कुछ हुआ उसने लाखों कामकाजी भारतीय महिलाओं की जिंदगी को बदल डाला.

भटेरी में महिलाएं एक सरकारी हैंडपंप से पानी भरती हैं. राजस्थान के इस इलाके में महिलाओं को हर वक्त अपना चेहरा और सिर ढंककर रखना होता है.

भटेरी में महिलाएं एक सरकारी हैंडपंप से पानी भरती हैं. राजस्थान के इस इलाके में महिलाओं को हर वक्त अपना चेहरा और सिर ढंककर रखना होता है.

बलात्कार का वो वाकया

नब्बे के दशक में भारत में महिलाओं के विरुद्ध पूर्वाग्रह का भाव और भी ज्यादा था. यौन-दुर्व्यवहार पर बात करना सामाजिक रूप से ठीक नहीं माना जाता था. कोई भी इस पर बात नहीं करता था. नीची जाति की एक महिला ने साहस दिखाया, ऊंची जाति के धनी पुरुषों के खिलाफ बलात्कार की शिकायत लिखवाई. यह कोई साधारण बात नहीं थी.

भंवरी देवी ने जब औपचारिक तौर पर शिकायत लिखवाने की कोशिश की तो पुलिस ने उसके साथ अपमान का बर्ताव किया. उसकी एफआईआर बहुत दिनों बाद दर्ज हो सकी, जयपुर के महिला संगठनों ने बहुत जोर लगाया कि एफआईआर दर्ज हो.

तीन साल बाद जयपुर की अदालत ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया. इस फैसले को राजस्थान हाईकोर्ट में चुनौती दी गई. घटना को एक चौथाई सदी यानी पच्चीस साल गुजर चुके हैं लेकिन मामले में अंतिम फैसला आना अभी बाकी है.

'सरकार ने मेरी मदद क्यों नहीं की? आखिर मैं सरकार का ही काम तो कर रही थी.' भंवरी पूछती हैं. बीते सालों में उसने यह सवाल लगातार पूछा है. खुद को इंसाफ दिलाने की उसकी लड़ाई लगातार जारी है और इस लड़ाई ने ही वो जमीन तैयार की जो आज कार्यस्थल पर होने वाला यौन-दुर्व्यवहार मुख्यधारा में बहस का जरूरी हिस्सा बन चली है.

उस भयावह घटना के वक्त भंवरी ‘साथिन’ के रूप में काम कर रही थी. राजस्थान सरकार ने महिला विकास परियोजना चलाई थी, इसी परियोजना में वह बतौर ‘साथिन’ एक कर्मचारी थी. जिला महिला विकास एजेंसी ने उसे बाल-विवाह के विरुद्ध ग्रामीणों को सहमत करने का काम दिया था. कोई जबरदस्ती बच्चे का ब्याह कर रहा हो तो साथिनों को दायित्व सौंपा गया था कि वे ऐसी घटनाओं के बारे में पुलिस को इत्तिला दें. भंवरी ने यही किया था.

भंवरी की दुख भरी दास्तान से प्रभावित हो कुछ महिला समूहों ने सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका डाली. नतीजा ये हुआ कि साल 1997 में सुप्रीम कोर्ट ने औपचारिक दिशानिर्देश जारी किए, बताया कि कार्यस्थल पर यौन-दुर्व्यवहार के मामलों से निपटने के लिए क्या तरीके अपनाए जाएं. इसे विशाखा गाइडलाइन्स के नाम से जाना जाता है.

बाद के वक्त में यही दिशानिर्देश कार्यस्थल पर यौन-दुर्व्यवहार के निवारण के संबंध में बने कानून की बुनियाद बना.

कानून के दायरे में बदलाव के लिहाज से मील का एक पत्थर गड़ चुका था लेकिन भंवरी के मामले में इस बदलाव का कोई असर ना हुआ. मेडिकल चेकअप में देरी हुई, जांच लचर ढंग से चली और मामला कमजोर किया गया. आरोपितों में से दो तो अब इस दुनिया से कूच कर चुके हैं.

भंवरी के संघर्ष-यात्रा का एक संगीन पहलू यह है. संघर्ष के उसके सफरनामे का दूसरा पहलू है-उसकी जिंदगी और परिवार का धीरे-धीरे ढहते जाना.

BHAVARI DEVI

भंवरी देवी के घर के आगे इस वाटरटैंक को लगाने के लिए जयपुर की कुछ महिला कार्यकर्ता आगे आईं. भंवरी के पड़ोसियों ने उसे मोहल्ले के हैंडपंप से पानी लेने से मना कर दिया था.

जब कोई बलात्कार की रिपोर्ट लिखवाता है

मैंने भंवरी से उसकी उम्र जानना चाहा. जवाब देने से पहले उसने देर तक सोचा, फिर बोली 'पचास और पांच (पचपन)'. उसे शायद अपनी उम्र याद नहीं.

मैंने उसके छुटपन के दिनों के बारे में पूछा. बचपन के दिनों की बस उसे एक ही याद रह गई है. उसे याद है कि उसका ब्याह बचपन में ही कर दिया गया था. ब्याह के वक्त उसकी उम्र क्या होगी? 'बहुत छोटी थी मैं. मुझे याद नहीं.'

ब्याह के बाद भंवरी भटेरी आई. उसे बस इतना भर याद है कि आठ साल की उम्र से पहले ही उसका ब्याह कर दिया गया था. उसका पति भी तब लगभग 10 साल का रहा होगा.

'हमारा परिवार यहां चार पीढ़ियों से रह रहा है,' वह बताती है. गांव में चार पीढ़ियों से रहने के बड़े गहरे मायने हैं. यह परिवारों के बीच अटूट रिश्तों के बन जाने की एक निशानी है. लेकिन बलात्कार की घटना ऐसे अटूट रिश्तों को भी बदल देती है. भंवरी को यह पीड़ादायी एहसास बहुत धीरे-धीरे हुआ.

वह अब भी उसी गांव में रहती है, वही गांव जहां उसके बलात्कारी रहते हैं; उनका घर भंवरी के घर से बस चंद मीटर की दूरी पर है. अदालत ने अपराधियों को छुट्टा छोड़ दिया सो भंवरी की जिंदगी पहले से कहीं ज्यादा कठिन और दर्दअंगेज हो गई है. मामले को वापस लेने के लिए उसे धमकी मिलती है, दबाव डाला जाता है और यह सब उसकी जिंदगी में रोजमर्रा की बात है.

रसूखदार हमलावरों के दबाव में गांववालों ने भंवरी से किनारा कर लिया. बलात्कार से जुड़ा सामाजिक लांछन उसके माथे पर कलंक के टीके की तरह जड़ा हुआ है, साथ ही गांववाले यह भी सोचते हैं कि बलात्कार की उस घृणित घटना की शिकायत लिखवाकर उसने कोई अच्छा काम नहीं किया. गांव के रसूखदार लोग खुलेआम बलात्कारियों का साथ देते हैं, वे भंवरी को झूठा करार देते हैं.

लोगों ने उसके परिवार से मिट्टी के बनाये बर्तन खरीदने बंद कर दिए. परिवार को गांव में हर सुविधा से वंचित किया गया. उसके घर ना तो अनाज पहुंचता है ना ही दूध. गांव से उन्हें पानी भी नहीं लेने दिया जाता. भंवरी के बच्चों के साथ स्कूल में बदसलूकी होती है. उन्हें तीज-त्योहार और उत्सव-समारोह के हर अवसर से दूर रखा जाता है.

लोगों ने चाहे किनारा कर लिया हो लेकिन भंवरी ने बड़ी दिलेरी से अपने मामले को आगे बढ़ाया है, उसका सफर रुका नहीं है. ‘साथिन’ के रुप में उसने अपना काम भी जारी रखा है.

आरोपी 1995 में बरी हो गए और उसकी जिंदगी पहले से ज्यादा मुश्किल बन गई. दबाव बढ़ता गया. परिवार वालों ने कहा कि हमलावरों के साथ सुलह कर लो. जब उसने ऐसा करने से इनकार किया तो परिवार वालों ने उसके साथ रिश्ते तोड़ लिए.

गांव में लोगों के बीच जीने-जागने वाला भंवरी का परिवार, उसके बच्चे सब अकेलपन की जिंदगी जीने को मजबूर हुए.

तो क्या अब गांववालों का बरताव बदला है ? भंवरी कहती है कि हां, बदला है. लेकिन महिला अधिकारों की एक कार्यकर्ता जयपुर की निशा सिद्धू ने मुझे बताया कि गांववालों के बरताव में मामूली सा ही फर्क आया है. लोगों ने भंवरी से अब भी दूरी कायम कर रखी है. दरअसल, हाल ही में उसे गांव के हैंडपंप से पानी लेने से रोक दिया गया. अनाज की पिसाई करवानी हो तो उसे अब भी पड़ोस के गांव में जाना होता है.

सिद्धू कहती हैं, 'भंवरी हमेशा मुस्कुराते रहती है लेकिन कोई यह सोचे बगैर कैसे रह सकता है कि गांव में उसने किन कठिनाइयों का सामना किया है.'

एक अकेले की जंग

जिस लड़की की शादी ने भंवरी की जिंदगी बदल दी वह भी उसी गांव में रहती है. वह मां बन चुकी है. मैंने भंवरी से पूछा कि क्या आपको कभी उस लड़की से बात करने की तड़प हुई. वह मुस्कुरायी और उसने इनकार में सिर हिलाया. उस लड़की के साथ भंवरी का कभी आमना-सामना नहीं हुआ. वह कहती है, “ मेरे मन में उस बच्ची को लेकर कोई कड़वाहट नहीं है.”

स्कूल के बाद घर लौटती लड़कियां. इलाके में लड़कियों के नामांकन का स्तर बढ़ा है लेकिन ज्यादातर लोग उनकी उच्च शिक्षा के पक्ष में नहीं हैं.

स्कूल के बाद घर लौटती लड़कियां. इलाके में लड़कियों के नामांकन का स्तर बढ़ा है लेकिन ज्यादातर लोग उनकी उच्च शिक्षा के पक्ष में नहीं हैं.

देश के बाकी इलाकों की तरह सरकार के सक्रिय हस्तक्षेप के कारण इस इलाके में भी लड़कियों को लेकर लोगों के बरताव में सकारात्मक बदलाव आया है. भटेरी में अब ज्यादातर लड़कियां स्कूल जाने लगी हैं. कुछ परिवारों ने अपनी बच्चियों को उच्च शिक्षा के लिए शहरों में भी भेजा है. भंवरी के बलात्कार के आरोपितों के परिवार की बच्चियों को भी इस बदलाव का फायदा पहुंचा है.

इलाके में बाल-विवाह की तादाद में भारी कमी आई है लेकिन गांव के मन के भीतर गहराई से झांककर देखने पर पता चलता है कि महिलाएं यहां अब भी परंपरागत भूमिकाओं के दायरे में कैद हैं.

मैंने उससे पूछा, क्या कभी यह ख्याल आया कि कहीं और जाकर जिंदगी नये सिरे से शुरू की जाए.

'किसी और के कुकर्म के लिए मैं अपना घर क्यों छोड़ूं? भागना तो अपराधियों को चाहिए. मैं कहीं और नहीं जाऊंगी.' वह अपनी बात पर जोर डालते हुए कहती है.

आखिर में जो बात उसने कही वह संघर्ष के उसके सफरनामे के मकसद को उजागर करता है. उसने कहा: “ मेरे पास विकल्प यही है कि लड़ाई जारी रखूं. हो सकता है, मुझे इंसाफ नहीं मिले लेकिन दूसरों को जरूर मिलेगा.'

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