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भगवान दादा: जिनके 'अलबेला' डांस के लिए भगवान गणेश को भी रुकना पड़ता था

भगवान दादा के सिग्नेचर डांस के लिए गणेश विसर्जन के वक्त उनके चॉल के सामने मूर्ति रुकती थी

Animesh Mukharjee Animesh Mukharjee Updated On: Aug 01, 2018 11:50 AM IST

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भगवान दादा: जिनके 'अलबेला' डांस के लिए भगवान गणेश को भी रुकना पड़ता था

1951 में हिंदुस्तान में तीन फिल्में रिलीज हुईं, आवारा, बाजी और अलबेला. तीनों फिल्मों ने हिंदी सिनेमा को तीन आइकॉनिक सुपरस्टार दिए. राजकपूर, गुरुदत्त और भगवान दादा. इन फिल्मों में तीनों का अंदाज एक दूसरे से बिलकुल जुदा था और तीनों की किस्मत भी एक दूसरे से बिलकुल जुदा थी.

आज के समय में भगवान दादा की पहचान मोटामोटी दो हिस्सों में बंध गई हैं. एक ओर उन्हें अमिताभ बच्चन के आइकॉनिक डांस का जनक माना जाता है. दूसरी तरफ उनकी कहानी फिल्मी सितारों के अर्श से फर्श तक पहुंचने के एक बड़े उदाहरण के रूप में सुनाई जाती है. दादा की ये दोनों पहचानें अपनी-अपनी जगह पर बिलकुल पुख्ता हैं. मगर हिंदी सिनेमा में बहुत कुछ ऐसा है जिसकी नींव भगवान दादा की रखी हुई है.

चॉल और स्टंट से शुरुआत

1913 में जब दादा साहब फाल्के ‘राजा हरिश्चंद्र’ के जरिए हिंदुस्तान में सिनेमा की नींव रख रहे थे. दादर की एक चॉल में एक मजदूर के घर भगवान आभाजी पालव ने पहली किलकारी भरी. सिनेमा के साथ उनकी ये जुगलबंदी पैदाइशी थी. इसीलिए प्राइमरी के बाद पढ़ाई छोड़ दी. 5 फुट के छोटे के कद में कसरत से खूब जोर भरा और चॉल के दादा कहलाने लगे.

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उनके थप्पड़ का सबसे दुर्भाग्यपूर्ण उदाहरण ललिता पवार हैं. सबसे खतरनाक सिनेमाई सास के रूप में मशहूर ललिता पवार को भगवान दादा ने शूटिंग के दौरान ऐसा थप्पड़ मारा कि ललिता की आंख की नस फट गई. उनका चेहरा ऐसा बिगड़ा कि वो जीवन भर क्रूरता भरे रोल ही करती रहीं. हालांकि ललिता पवार कहती थीं कि भगवान दादा के कारण ही वो इतना पॉपुलर हो पाईं.

आज भगवान दादा पर अक्सर उनके गानों के चलते हास्य अभिनेता के ठप्पा लग जाता है, मगर दादा हिंदी सिनेमा में अपने एक्शन खुद करने वाले शुरुआती लोगों में से एक थे. 1949 तक वो लो बजट स्टंट फिल्में बनाते रहे. उस दौर के मजदूर तबके में ये फिल्में खूब लोकप्रिय होती थीं.

एक एक्टर के तौर पर उनकी काबिलियत का अंदाजा ऐसे लगाया जा सकता है कि पहली फिल्म में कुबड़े का रोल निभाने के बाद उन्हें छः महीने तक काम नहीं मिला था. कारण, लोगों को लगा था ये आदमी सही में कुबड़ा है.

डांस, स्टारडम और शोहरत

‘अलबेला’ ने दादा को खूब शोहरत दिलवाई. ‘शोला जो भड़के’ और ‘भोली सूरत दिल के खोटे’ जैसे गानों में किए गए अलबेले डांस को अमिताभ बच्चन, गोविंदा, मिथुन जैसे स्टार फॉलो करते रहे. अलबेला दादा के जीवन में पैसों की बरसात लेकर आई. दादर की दो कमरों की चॉल से जुहू बीच पर 25 कमरों के बंग्ले का सफर दादा ने तय किया.

ये वो दौर था जब उनके घर के सामने सात लग्जरी कारें खड़ी होती थीं. हफ्ते के हर दिन के लिए अलग. मगर हिंदी सिनेमा की पहली पीढ़ी के कई दूसरे सितारों की तरह दादा भी भूल गए थे कि पैसों की ये बरसात छोटी-छोटी नालियों से होकर बहती जा रही थी.

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‘अलबेला’ के बाद ‘लाबेला’ और ‘झमेला’ असफल हो गईं. ‘सहमे हुए सपने’ ने बॉक्स ऑफिस पर पानी तक नहीं मांगी. इसके बाद आई ‘हंसते रहना’ को बनाना भगवान दादा के करियर की सबसे बड़ी गलती साबित हुई. नायक किशोर कुमार के नखरे और तमाम अन्य वजहों से फिल्म पूरी नहीं हो पाई. घर, गाड़ी, बीवी के गहने सब कुछ बिक गया पर फिल्म नहीं बिक पाई.

इसके साथ ही सिनेमा में भी बदलाव का दौर शुरू हो चुका था. 60 के दशक की कलात्मक सोबर रोमांस में अलबेला की मस्ती को थोड़ा आउटडेटेड बना दिया था. दादा इस बदलाव को समझने में थोड़ा सा पीछे रहे. रही सही कसर उनकी शराब की लत और बेहिसाब खर्चों ने पूरी कर दी.

वापस चॉल में

भगवान दादा को शोहरत चमत्कार की तरह मिली और उसी तरह से रूठी भी. उनकी फिल्मों के गोदाम में आग लग गई. लगभग सारी फिल्में जलकर खाक हो गईं. अलबेला बच गई. क्योंकि उसका प्रिंट वो पहले ही गिरवी रख चुके थे. देखते ही देखते दादा दादर की उसी चॉल में वापस आ गए.

दादर की उस चॉल ने अपने भगवान दादा को उसी प्रेम के साथ अपनाया. फिल्मों के जानकार और समीक्षक गजेंद्र सिह भाटी बताते हैं. हर साल दादर के गणपति विसर्जन के समय थोड़ी देर के लिए विसर्जन दादर की उस चॉल के सामने रुकता था. दादा बाहर निकलकर अपना सिग्नेचर डांस करते थे, फिर विसर्जन आगे बढ़ता था.

भगवान दादा बचपन की ट्रेनिंग से पहलवान थे. जिंदगी के दांव से पटका खाने के बाद भी हारना उन्होंने नहीं सीखा था. सी रामचंद्र, हेमंत कुमार और आनंद बख्शी को सिनेमा में लेकर आने वाले दादा को अपने लिए काम मांगना पड़ा क्योंकि सिनेमा ही एक काम था जो भगवान दादा को आता था.

पुराने जमाने की दोस्ती के जरिए दादा को छोटे-मोटे किरदार मिलते रहते थे. तमाम मुश्किलों के बाद भी दादा 1995-96 तक फिल्मों में सक्रिय रहे. 65 साल लंबी फिल्मी पारी के आखिरी सालों में भगवान दादा को गोविंदा, सलमान के साथ पर्दे पर हमने आपने देखा ही होगा, मुमकिन है पहचान न पाए हों. जैसे सलमान खान को स्टार बनाने वाली फिल्म ‘मैंने प्यार किया’ के टाइटल सॉन्ग में सलमान के बगल में लाल पगड़ी वाले भगवान दादा हैं.

पिछले साल उनपर बनी फिल्म ‘एक अलबेला’ रिलीज़ हुई थी. विद्या बालन ने इस फिल्म में गीता बाली का किरदार निभाया था. मराठी ऐक्टर मंगेश देसाई भगवान दादा के किरदार में थे. फिल्म की कितनी चर्चा हुई ये बताने की जरूरत नहीं है. उसी फिल्म से अलबेला के क्लासिक गाने का रिक्रिएशन देख लीजिए.

(ये लेख पहले भी प्रकाशित हो चुका है)

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