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नूरजहां: जिनकी गायकी और आशिकी हमेशा जिंदा रहेगी...

जिस दौर में बाकी गायकों को 300 रुपए मिलते थे. लोग नूरजहां को 2000 तक देने को तैयार रहते थे

Shailesh Chaturvedi Shailesh Chaturvedi Updated On: Dec 23, 2017 09:46 AM IST

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नूरजहां: जिनकी गायकी और आशिकी हमेशा जिंदा रहेगी...

करीब 12 साल पहले की बात है. पहली बार पाकिस्तान की धरती पर कदम रखने का मौका मिला था. लाहौर शहर था. कुछ लोगों से मिलने की हसरत थी. इनमें एक नाम नूरजहां के परिवार का था. नूरजहां तो नहीं रही थीं. लेकिन उनकी बेटी लाहौर में रहती थीं. तय किया. वक्त लिया गया. वक्त मिला रात करीब 11 बजे का. घर पहुंचने पर ऐसा लग रहा था, जैसे रात नहीं, अभी तो दिन की शुरुआत हुई है. पूरा घर रोशन था. चहल-पहल थी. हम हिंदुस्तानी मेहमानों का स्वागत हुआ. आधी रात बीत गई. लेकिन ऐसा लग नहीं रहा था कि यह घर कभी सोता भी है. इस घर से अंदाजा लगाया जा सकता था कि नूरजहां कैसी रही होंगी. बेबाक, बिंदास.. किसी बंदिश को नहीं मानने वाली.

वही नूरजहां, जिनके जैसा बनने की ख्वाहिश में लता मंगेशकर ने गाना शुरू किया था. पूरा जमाना लता मंगेशकर को सुनना चाहता है. लता मंगेशकर के लिए नूरजहां को सुनना सबसे अहम रहा है. वही नूरजहां, जिन्होंने 1947 में यह कहकर हिंदुस्तान छोड़ दिया था कि जहां पैदा हुई हूं, वहीं रहूंगी और मरूंगी. वही नूरजहां, जिनका गाया गाना– आवाज़ दे कहां है... कहीं बजता है, तो अब भी वैसी ही लज्जत देता है.

वही नूरजहां, जिन्हें मलिका-ए तरन्नुम कहा जाता है. वही नूरजहां, जिनके बारे में रेहान फजल ने बीबीसी में पाकिस्तानी पत्रकार खालिद हसन के शब्दों को दोहराया है. इसके मुताबिक 1998 में नूरजहां को दिल का दौरा पड़ा. तब खालिद हसन ने लिखा था कि दिल का दौरा तो उन्हें पड़ना ही था. पता नहीं कितने दावेदार थे उसके. और पता नहीं, कितनी बार धड़का था उन लोगों के लिए, जिन पर मुस्कुराने की इनायत की थी उन्होंने. यह सच है. न जाने कितने मर्दों पर नूरजहां का दिल आया और न जाने कितने मर्दों का दिल नूरजहां पर. इसे लेकर नूरजहां हमेशा फख्र करती रहीं. उन्होंने छिपाने की कोशिश नहीं की.

अल्ला रखी से नूरजहां बनने का सफर

21 सितंबर 1926 को जन्मी नूरजहां की मौत 23 दिसंबर 2000 को हुई. जिस परिवार में अल्ला रखी यानी नूरजहां का जन्म हुआ, वो संगीत से जुड़ा था. पंजाब के कसूर में उनका जन्म हुआ. मदद अली और फतेह बीबी की 11 संतानों में वो एक थीं. माता-पिता चाहते थे कि उनकी बेटी भी संगीत में आए. हालांकि नूरजहां को फिल्मों में काम करने का ज्यादा शौक था. पांच या छह साल की उम्र में ही नूरजहां ने लोक संगीत गाना शुरू कर दिया था. वो थिएटर से भी जुड़ गई थीं. उनकी मां ने उन्हें सीखने के लिए उस्ताद बड़े गुलाम अली खां साहब के पास भेजा. नौ साल की उम्र में उन्होंने ग़ज़ल गाना शुरू किया. अब तक उनका नाम अल्लाह रखी ही था. कलकत्ता में उन्हें बेबी नूरजहां नाम मिला. उन्हें फिल्मों में काम शुरू किया और जल्दी ही बड़ी स्टार बन गईं. उन्होंने शौकत हुसैन रिजवी से शादी कर ली. शौकत साहब उनके अनगिनत चाहने वालों में एक थे.

जहां पैदा हुई वहीं जिंदगी बिताने का किया फैसला

1947 आया. विभाजन के समय उन्होंने अपने पति के साथ पाकिस्तान जाने का फैसला किया. ऐलान किया – जहां पैदा हुई हूं, वहीं जाऊंगी. यह वो दौर था, जब बंबई (अब मुंबई) में वो बड़ा नाम कमा चुकी थीं. उनकी फिल्में खानदार, नौकर, दोस्त, जीनत, विलेज गर्ल, बड़ी मां, अनमोल घड़ी और जुगनू थीं, जो खासा नाम कमा चुकी थीं. एक कव्वाली आई – आहें न भरीं, शिकवे न किए... यह कव्वाली जोहराबाई अंबालेवाली और अमीरबाई कर्नाटकी के साथ गाई थी. माना जाता है कि दक्षिण एशिया में पहली बार किसी फिल्म में महिला आवाज में कव्वाली का इस्तेमाल हुआ. उनकी शोहरत आसमान छूने लगी थी. लेकिन शोहरत भी उन्हें नहीं रोक सकी.

पति के आने पर आशिक ने खिड़की से कूदकर तुड़वाई टांग

पाकिस्तान में भी वो फिल्मों से जुड़ीं. 1951 में उनकी फिल्म आई. इस बीच पति से अलगाव हुआ। इसकी एक वजह यह थी कि उनके नाम तमाम अफेयर्स के किस्से जुड़ते जा रहे थे. इनमें से एक अफेयर क्रिकेटर मुदस्सर नजर के पिता नज़र मोहम्मद के साथ था. कहा जाता है कि एक बार घर में नज़र मोहम्मद और नूरजहां थे. इसी दौरान नूरजहां के पति आ गए. नजर मोहम्मद खिड़की से कूद गए, जसकी वजह से उनकी टांग टूट गई.

पहली शादी से उनके तीन बच्चे थे, जिनमें गायिका जिल-ए हुमा शामिल हैं. 1959 में उन्होंने खुद से नौ साल छोटे अदाकार एजाज दुर्रानी से शादी की. इस शादी से भी उनके तीन बच्चे हुए. 1963 में उन्होंने फिल्मों से रिटायर होने का फैसला किया. उनकी दूसरी शादी भी नहीं चली. 1979 में उनका तलाक हो गया.

फिल्मों में अदाकारी बंद करने के बाद नूरजहां ने गाने पर ज्यादा ध्यान देना शुरू किया। प्लेबैक सिंगिंग और ग़ज़ल गायकी दोनों पर. वो तमाम महफिलों का भी हिस्सा बनीं. 1965 में भारत और पाकिस्तान के बीच जंग के समय उन्होंने पाकिस्तान के लिए देशभक्ति गीत गाए और इससे उन्हें खासी लोकप्रियता हासिल हुई. जिस दौर में पाकिस्तान में ज्यादातर गायकों को एक गाने के साढ़े तीन सौ रुपये मिलते थे, लोग नूरजहां को दो हजार रुपये देने को तैयार रहते थे. उन्होंने एक भजन भी गाया – मन मंदिर के देवता. हालांकि रेडियो पाकिस्तान ने इसे बैन कर दिया.

हिंदुस्तान में किया एक यादगार स्टेज शो

1982 में वो भारत आईं। उन्होंने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से भी मुलाकात की. स्टेज पर तीन गाने गाए. इनमें से एक था – मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरे महबूब न मांग. फैज की नज्म है यह. लेकिन नूरजहां ने इसे इतना मकबूल कर दिया कि फैज हमेशा कहा करते थे कि यह नज्म मेरी नहीं रही, यह तो नूरजहां की हो गई है. 1982 के  उस भारत दौरे पर हुए स्टेज शो में दिलीप कुमार ने उन्हें स्टेज पर आमंत्रित किया था. नौशाद का संगीतबद्ध गाना भी उन्होंने गाया - आवाज दे कहां है.

पाकिस्तान में उनका गाया चांदनी रातें इस कदर लोकप्रिय हुआ कि 90 के दशक में उसका रीमिक्स वर्जन भारत में भी आया. यह वर्जन भी खासा मकबूल हुआ. उनसे एक बार किसी ने पूछा था कि गाना कब शुरू किया. इस पर नूरजहां ने जवाब दिया कि जब पैदा हुई, तबसे. यह सही भी लगता है. लेकिन पैदा होने से गायकी से जुड़ने वाली नूरजहां के लिए अंतिम वक्त बहुत अच्छा नहीं रहा. 1986 में वो अमेरिका गई थीं. वहां सीने में दर्द हुआ. उन्हें पेसमेकर लगाना पड़ा. 23 दिसंबर 2000 को उन्हें दिल का दौरा पड़ा. वो शनिवार का दिन था. नूरजहां का निधन हो गया. ऐसी शख्सीयत, जिसने अपनी जिद पर जिंदगी जी. जिसने अपनी मर्जी से जिंदगी जी.

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