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सच मानिए, मुहब्बत के लिए कोई गुंजाइश नहीं बची है

प्रेम से वंचित होते इस समाज में इश्क के रास्ते की अड़चन अब सरकार होगी. अब तक प्रेम के शत्रु खाप पंचायतें, हिंदुत्व के ठेकेदार दारोगा और जाति-मजहब के नियमों से संचालित स्वयंभू संगठन थे

Updated On: Feb 02, 2019 09:24 AM IST

Hemant Sharma Hemant Sharma
वरिष्ठ पत्रकार

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सच मानिए, मुहब्बत के लिए कोई गुंजाइश नहीं बची है

सच मानिए, मुहब्बत के लिए कोई गुंजाइश नहीं बची है. प्रेम से वंचित होते इस समाज में इश्क के रास्ते की अड़चन अब सरकार होगी. अब तक प्रेम के शत्रु खाप पंचायतें, हिंदुत्व के ठेकेदार दरोगा और जाति-मजहब के नियमों से संचालित स्वयंभू संगठन थे. अब मौजूदा सरकार भी खुलेआम उनमें शामिल हो गई है. दुनिया भर के साहित्य और इतिहास में दर्ज प्रेमकथाएं बताती हैं कि प्रेम का रास्ता कांटों का रास्ता है.

बकौल जिगर मुरादाबादी ‘एक आग का दरिया है और डूब कर जाना है.’ पर नए दुष्कर्म विरोधी कानून के प्रावधानों के बाद इस दरिया का रास्ता सीधे जेल ले जाएगा. किसी महिला का पीछा किया तो कैद, भर आंख देखा तो हवालात तय जानिए. खयाल रहे, कोई कांस्टेबल आपकी आंखों पर पहरा दे रहा होगा.

सच है, आंखें जुबां नहीं हैं. मगर बेजुबां भी नहीं. उनकी भी भाषा है. कौन पढ़ेगा इसे? निराला कह गए-‘नयनों से नयनों का गोपन, प्रिय संभाषण.’ अब कानून कह रहा कि चौदह सेकंड से ज्यादा किसी लड़की को देखा तो जेल जाएंगे. यानी देखने-दिखाने का खेल केवल 13 सेकंड का है. उसके बाद खैर नहीं. चचा गालिब ने कहा है-‘उनके देखे से जो आ जाती है मुंह पर रौनक.’ आज होते तो कहते, ‘उनको देखे से खुलता है हवालात का दर.’

जगजीत सिंह गाते थे-‘तुमको देखा तो ये खयाल आया, जिंदगी धूप तुम घना साया.’ पर अब कैसे देखेंगे भाया. देखने पर पाबंदी है. अगर देखेंगे नहीं तो हुस्न के चर्चे कैसे होंगे? पारखी से ही हीरे की पहचान होती है. वरना वह तो पत्थर ही रहेगा. क्या आधी दुनिया इसके लिए राजी होगी? मेरे एक मित्र हैं तिवारीजी-सौंदर्य के चरम उपासक, देखते कहीं और हैं, ध्यान में कुछ और रहता है.

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अब दरोगा उन्हें इस काम का तीसरा आयाम भी दिखा देगा. तो क्या दरोगा के डंडे से प्रेम मर जाएगा? नहीं, प्रेम ऊर्जा है. वैज्ञानिक कहते हैं ऊर्जा का क्षय नहीं, रूपांतरण होता है. अगर चीजों में आकर्षण न हो तो सृष्टि बिखर जाएगी. इस ब्रह्मांड की परिधि में ढेर सारे उपग्रह हैं, जो एक-दूसरे के आकर्षण पर टिके हैं. स्त्री-पुरुष के आकर्षण पर ही समाज टिका है. और आकर्षण बिना देखे हो नहीं सकता-‘नयनों से नयना मिले, नाचा मन में मोर. दो नयनों में रतजगा, दो नयनों में भोर.’

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घूरकर देखने और पीछा करने पर जेल जाने का कानून अगर पहले बना होता तो मैं वर्षों तक जेल में रहता. नौजवानी के दिनों में कोई सात बरस तक मैं उनके पीछे-पीछे टप्पेबाजी करता रहा. चरैवेति, चरैवेति! शहर से विश्वविद्यालय तक वे रिक्शे पर, मैं साइकिल से. तब साइकिल मुलायम सिंह यादव का चुनाव निशान नहीं थी. मेहनत रंग लाई. वह मान गई. आज घर की मालकिन है. यह कमबख्त कानून उस वक्त होता तो मेरे ऊपर सजायाफ्ता मुजरिम का ठप्पा होता. उनके भाई तो कानून के बड़े जानकार थे. भारत सरकार के एडिशनल सॉलिसिटर जनरल.

मैं इस कानून के खिलाफ नहीं हूं. जिन परिस्थितियों में यह कानून बना, उसमें बलात्कार के मामले में तो इससे भी सख्त कानून बनना चाहिए. लेकिन जो बाकी की धाराएं हैं, उससे पुलिस को बेहिसाब अधिकार मिलेंगे और उनके सिर्फ बेजा इस्तेमाल ही होंगे. यह कानून एकतरफा है. इसके कुछ प्रावधान तो पुरुष विरोधी हैं. यह कहने की हिम्मत सिर्फ जया बच्चन और मधु किश्वर ने ही दिखाई.

बढ़ती उम्र से नजरें कमजोर होती हैं. मुझे तो इन दिनों दूर की कोई वस्तु देखने के लिए आंख को फोकस करने में 15 से 20 सेकंड लगते हैं. तब जाकर उसके आकार-प्रकार का अहसास होता है. लेकिन अब जब तक मैं आंखों को फोकस करूंगा, चौदह सेकंड हो चुके होंगे, और मुझे घूरने के कानून में अंदर जाना होगा.

कानून की ऐसी वर्जना पहले होती तो दुनिया की तमाम प्रेम कहानियां जन्म ही न लेतीं. राधा-कृष्ण, विवाहेत्तर प्रेम-प्रसंग के आरोप में जेल में होते. कृष्ण जब सरोवर में नहाती गोपिकाओं के कपड़े लिए भागते तो पुलिस एंटी रेप लॉ का डंडा लिए उन्हें दौड़ा रही होती. दुष्यंत और शकुंतला पर तो विवाह पूर्व सेक्स का मामला बनता. वे जेल में होते फिर उनके बेटे भरत कहां होते? इस देश का नाम भारत कैसे पड़ता? रूपमति-बाजबहादुर, सलीम-अनारकली, ढोला-मारु इनके प्यार के विरोधी परिजन इन्हें रेप कानून के तहत अंदर करा देते. मजनू पागल हो कविता नहीं लिख रहा होता, कब्र तक लैला का पीछा करने के आरोप में कहीं अरब की जेल में होता.

हीर जब रांझा की नहीं हुई तो वह जोगी हो गया. जोगी बन वह हीर को ले उड़ा. दूसरे की बीवी भगाने के आरोप में रांझा को भी दस से बीस साल तक जेल काटनी पड़ती. सोहनी-महिवाल, शीरी-फरहाद, रोमियो-जूलियट कथाओं के पात्र आजन्म घूरने, पीछा करने, विवाह पूर्व सेक्स के आरोप में जेल की चक्की पीस रहे होते.

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अपने कालिदास और तुलसीदास दोनों की पत्नियों ने उन्हें घर से निकाला था. कानून नहीं था, वरना बलात्कार का कानून भी लगा देतीं. फिर हिंदी और संस्कृत साहित्य का क्या होता? रत्नावली रामभक्त खोज रही थी. इसलिए उसने कामभक्त तुलसी को दुत्कारा. विद्योत्तमा ने अपने विद्वता अहंकार से कालिदास के काम को दबा दिया. डॉ. लोहिया ऐसे मामलों में रास्ता निकालते हैं. वादाखिलाफी और बलात्कार के अलावा वे स्त्री से हर संबंध जायज मानते हैं.

प्यार को जकड़ने की ऐसी कोशिश कोई पहली बार नहीं हुई है. समान गोत्र में प्रेम का विरोध खाप पंचायतें करती रही हैं. जाति-मजहब के खिलाफ प्रेम किया तो हरियाणा, उत्तर प्रदेश की पंचायतें तालिबानी फरमान सुनाती हैं. प्रेमियों को मौत के घाट उतारा जाता है. मुंबई पुलिस के ताजा फरमान से ‘डेट करने वाले’ और ‘एकांत’ में बैठनेवाले हवालात के अंदर हो रहे हैं.

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पुलिस ऐसे जोड़ों से बारह सौ रुपए हर्जाना भी वसूलती है. जनसंख्या बढ़ रही है. जगह की कमी है. सबकी जेब होटल का खर्च नहीं उठा सकती. इसलिए ऐसे जोड़े ही पार्कों का सहारा लेते हैं. पुलिस उनके खिलाफ ‘ऑपरेशन मजनू’ अभियान चला अपमानित करती है.

नए कानून के बाद शाहरुख खान अब यह नहीं गा सकते कि ‘तू हां कर या ना कर, तू है मेरी किरन’. पूरा का पूरा रीतिकालीन साहित्य आंखों की भाषा पर है. रहीम कहते हैं-‘रहिमन मन महाराज के, दृग सों नहीं दिवान. जाहि देख रीझे नयन, मन तेहि हाथ बिकान.’ इश्क ने गालिब को निकम्मा बना दिया, इश्क उनके लिए आसान नहीं था. अब और भी मुश्किल हो जाएगा. पुलिस कांस्टेबल के रहमो-करम पर. खुदा बेगुनाहों को इस कानून की मार से बचाए.

(यह लेख हेमंत शर्मा की पुस्तक 'तमाशा मेरे आगे' से लिया गया है. पुस्तक प्रभात प्रकाशन द्वारा प्रकाशित की गई है)

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