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नामवर सिंह: जिन्हें खारिज करते हैं, उन्हें ज्यादा पढ़ते हैं

नामवर सिंह कलम के सिपाही नहीं , बातों के जादूगर हैं

Updated On: Jan 26, 2019 09:33 AM IST

Hemant Sharma Hemant Sharma
वरिष्ठ पत्रकार

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नामवर सिंह: जिन्हें खारिज करते हैं, उन्हें ज्यादा पढ़ते हैं

बनारसी होना नामवर होने की पहली अनिवार्य शर्त है, क्योंकि ऐसी उद्भट और मुंहफट ‘नामवरियत’ बनारस में ही जन्म ले सकती है. बनारसीपन एक अति आधुनिक सांस्कृतिक दृष्टि है. पांडित्य से भरा विविध रंगोंवाला बिंदास बनारसी. जमाने को ठेंगे पर रख अपनी बात को पूरी ताकत के साथ रखने का अंदाज इसी दृष्टि की उपज है. जाति, वर्ग, संप्रदाय और धर्म से आगे की चीज है बनारसीपन. समूची पांडित्य परंपरा से लैस. अति आधुनिक औजारों से ‘दूसरी परंपरा’ यहीं ढूंढी जा सकती है. नामवर सिंह का कर्मक्षेत्र भले ही दिल्ली रहा हो, पर उनका भाव क्षेत्र हमेशा बनारस रहा. जिस बनारसी मिट्टी ने नामवर को बनाया, इसमें कबीर का साहस, तुलसी का लोकतत्त्व, प्रेमचंद का समाजशास्त्र और आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का पांडित्य है. कुछ-कुछ जब ये सारे तत्व एक साथ मिलते हैं तब एक नामवर सिंह बनते हैं.

नामवर सिंह के व्यक्तित्व की यही खूबी है. इसी खूबी ने उन्हें बड़ी-से-बड़ी परंपरा को खारिज करने, अपना झंडा गाड़ने और हिंदी आलोचना में सबसे ऊंचा, आला और अलहदा स्थान बनाने में मदद की. हर खूबी के कुछ फायदे होते हैं तो कुछ नुकसान भी. नामवरजी ने अपनी इस खूबी के लिए नुकसान भी उठाया. नामवरजी को बनारस में काफी विरोध झेलना पड़ा, हालांकि यह विरोध तुलसी और आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने भी झेला था. दरअसल, नामवरजी बनारस के जिस मोहल्ले लोलार्क कुंड में रहते थे, यह भदैनी इलाके में पड़ता है, यहां काशी के पुराण पंडितों ने तुलसीदास को भगा दिया था. उनकी ‘रामचरित मानस’ को गंगा में फेंक दिया था, क्योंकि तुलसी लोकभाषा में रघुनाथगाथा लिख रहे थे. पुराण पंडितों के केंद्र ‘भदैनी’ से भागकर ही तुलसी ने अस्सी के उस हिस्से का नाम ‘भयदायिनी’ रखा था. जो बाद में बिगड़कर ‘भदैनी’ बना. कवि केदारनाथ सिंह तो यहां तक कहते हैं, 'भदैनी में ‘सरवाइव’ करना आसान नहीं है. नामवर सिंह सरवाइव कर गए, इसलिए नामवर सिंह बन गए.'

कलम के सिपाही नहीं, बातों के जादूगर हैं

यह सही है कि बनारस में नामवरजी का अनुभव अच्छा नहीं रहा, मगर यह भी उतना ही सच है कि नामवरजी दिल्ली में बनारस को ‘मिस’ करते रहे. वह दिल्ली में हमेशा बनारस ढूंढते रहे. अपने आस-पास, मित्रों में, खान-पान में, पहनावे में और अपनी भाषा में. उन्होंने गुस्से में बनारस छोड़ा. लोकसभा का चुनाव लड़ा, नौकरी गई, बेरोजगारी देखी. समकालीन साहित्यकारों ने काम भी लगाया. मगर जब बनारस छोड़ा तो दोबारा उसकी ओर देखा नहीं. उनके भीतर का जो बनारसी था, उसी ने उनके भीतर यह दृढ़ता और जिद पैदा की.

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नामवर सिंह पिछले तीन दशकों से हिंदी साहित्य के केंद्र में हैं. उन्होंने आलोचना की वाचिक परंपरा को जीवित किया. आलोचना को बंद गली से आगे ले गए. उसको गंभीरता से मुक्त कर आसान, सरस और ऐसा पठनीय बनाया कि वह रचना का आनंद देने लगी. लिखने से ज्यादा महत्व बोले जाने को दिया जाने लगा. किताबों की तुलना में संगोष्ठियों का महत्व बढ़ा और इस पूरी परंपरा के अलमबरदार बने नामवरजी. क्योंकि नामवर सिंह कलम के सिपाही नहीं हैं, बातों के जादूगर हैं. बातूनी नामवर सिंह को दिल्ली में सब जानते हैं. लेकिन इस बातूनीपन के पीछे एक गंभीर अध्येता है.namvar singh 23

नामवर सिंह शायद हिंदी में समकालीन विश्व साहित्य के सबसे बड़े बौद्धिक पुरुष हैं. वह अपनी आवाज, असाधारण स्मरण-शक्ति, ‘विट’ आदि की बदौलत पिछले 30 वर्ष से न सिर्फ साहित्यिक संगोष्ठियों को लूट रहे हैं, बल्कि अपने साहित्यिक रण कौशल से अपनी विचारधारा के विरोध में खड़े विद्वानों को गिराते, पछाड़ते और उखाड़ते भी आ रहे हैं, क्योंकि वे भाषा के बेजोड़ खिलाड़ी हैं. उनकी भाषा मुहावरे गढ़ती है और यही मुहावरे साहित्य की चौहद्दी बनाते हैं.

जिन्हें खारिज करते हैं, उन्हें ज्यादा पढ़ते हैं

नामवरजी का व्यक्तित्व बहुआयामी है. आलोचना ही नहीं कविता की परंपरा से भी उनका उतना ही गहरा संबंध है. नामवर सिंह ‘पुनीत’ को बहुत कम लोग जानते हैं. वे इस नाम से अपने लेखक जीवन की शुरुआत में कविताएं लिखते थे. अध्यापक नामवर. चंदौली से चुनाव लड़नेवाले राजनेता नामवर. आलोचक नामवर और अब किंवदंती नामवर. नामवर बनने की प्रक्रिया के मूल में है उनकी गहन अध्ययनशीलता. नामवरजी बेहद अध्ययनशील हैं. वे मिर्जा गालिब से लेकर आलोक श्रीवास्तव तक, कहीं से भी शुरू कर कहीं भी खत्म कर सकते हैं. जितना अधिकार उनका कालिदास और भवभूति पर है, उतनी ही सहजता से वे ब्रेख्त और लुशुन को भी समझाते हैं. रिश्ते-नाते उन्हें ज्यादा प्रभावित नहीं करते.

घटना, मनुष्य और विचार इन तीनों में वे विचार को अधिक महत्त्व देते हैं. वे विद्यार्थियों को आलोचना पढ़ाते ही नहीं, आलोचना सिखाते भी हैं. वे सामनेवाले की बात को सिरे से खारिज करने का दम रखते हैं. साथ ही सामनेवाले की बहस और असहमति के अधिकार की हिफाजत करने के लिए भी उतने ही दमखम से खड़े होते हैं. शायद यही वजह है कि नामवर सिंह जिन्हें खारिज करते हैं, उन्हें ज्यादा पढ़ते हैं. बिना पढ़े विरोध, केवल लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका भर है, मगर नामवर सिंह खांटी विपक्ष की नहीं, प्रतिपक्ष की भूमिका अदा करते हैं.

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उनका एक खास स्वभाव है कि अगर आपकी बात से असहमत होंगे और बाकी बातों को उड़ा देंगे तो कहेंगे—'आप तो बड़े विद्वान् आदमी हैं.' एक संस्मरण याद आया. 1982 की बात है. मैं पहली बार उनसे विधिवत् मिला. बीएचयू से जेएनयू में पढ़ने आया था. दाखिला कराने जब बनारस से दिल्ली आ रहा था तब मेरे पिता मनु शर्मा ने कहा था कि नामवरजी से जरूर मिलना. मेरे भीतर भी बड़ी उत्सुकता थी नामवर सिंह से मिलने की. जब उनके घर पहुंचा, दस्तक दी. उन्होंने खुद ही दरवाजा खोला. बोले—“आइए. कैसे दिल्ली आए हैं.” मैंने जवाब दिया—“पढ़ने आया हूं.” चश्मे के भीतर से झांकती उनकी गंभीर आंखों ने पूछा, “रहते तो कबीरचौरा में ही हो.” मैंने कहा, “जी.” उनका अगला सवाल था—“कबीर को पढ़ा है?” “जी पढ़ा है.” “कबीर को समझने के लिए किसे पढ़ा है?” नामवरजी ने अगला सवाल दागा. उन्होंने सोचा कि मैं आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का नाम लूंगा, क्योंकि हिंदी में कबीर पर उनकी सबसे प्रामाणिक किताब थी. लेकिन मैंने कहा, “जी मैंने कबीर पर आचार्य रजनीश को पढ़ा है.”

 नामवरजी का वाह! बहुत विद्वान् आदमी हो कहना

रजनीश उस वक्त तक ओशो नहीं थे. मेरे इस जवाब पर वे भेद भरी मुसकान के साथ अपने चिरपरिचित अंदाज में बोले, “आप तो बड़े विद्वान् आदमी हैं.” मैं समझा नहीं. बाद में पता चला कि वे अपना यह जुमला तब ही उछालते हैं जब आप निरर्थक बोल रहे हों या उनके सामने अपनी ‘ज्ञान-संपदा’ को बड़ी आतुरता के साथ प्रदर्शित कर रहे हों तब भी वे यही कहेंगे—“आप तो बड़े विद्वान् आदमी हैं.” इस घटना के कोई अट्ठाईस वर्ष बाद नामवरजी नोएडा में मेरे घर आए. सायंकालीन जमावड़ा. केदारनाथ सिंह, ओम थानवी, रामबहादुर राय, मेरे पत्रकार साथी अजय उपाध्याय, प्रशांत टंडन और आलोक श्रीवास्तव के साथ ही राजनेता संविधानविद् देवेंद्र द्विवेदी मौजूद थे. गुरुवर प्रभाष जोशी को भी आना था. पूछा तो पता चला, वे चल रहे हैं. नामवरजी बोले, “हेमंत, परेशान न हो, प्रभाषजी समझदार हैं, हम लोगों को मौका दे रहे हैं, ताकि हम अपना तरल कार्यक्रम समाप्त करें.” मैंने चुहल की, जोशीजी इसका बुरा नहीं मानते. गोस्वामी तुलसीदास तक ने भी इस तरल की महत्ता बताई है. नामवरजी चौंके। क्या कहा? मैंने कहा, जी तुलसीदास ने लिखा है—“तरल पदारथ यही जग माही कर्महीन नर पावत नाहीं.” वह तो प्रूफ की गलती से तरल की जगह सकल छप गया. मेरे उवाच पर बाकी लोग ठहाका लगाते, इससे पहले ही नामवर सिंह बोले, “वाह! वाह! बहुत विद्वान् आदमी हो!”

हिंदी के प्रख्यात आलोचक

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नामवरजी की हंसी-ठिठोली का भी एक विशिष्ट अंदाज है. एक बार बनारस में आलोचक डॉ. बच्चन सिंह के यहां—नामवर सिंह, विजयशंकर मल्ल, केदारनाथ सिंह आदि ‘संध्या वंदन’ के लिए बैठे थे. नामवरजी शाम के बैठने-बिठाने के कार्यक्रम को ‘संध्या वंदन’ कहते हैं. बच्चन सिंहजी के यहां संपन्न उस ‘संध्या वंदन’ में विजयशंकर मल्ल कुछ इधर-उधर की बात ले आए. मल्लजी विद्वान् अध्यापक थे. उनकी विद्वता का हम पर आतंक था. वे संवेदनशील इतने कि बड़ी ट्रेन दुर्घटना और सड़क पर साइकिल से किसी का गिरना उन्हें समान कष्ट पहुंचाते थे. बात हिंदी अखबार और उसकी बदलती भाषा की हो रही थी. मल्लजी कहने लगे—भाई पटना से एक अखबार निकलता था. नाम था—‘प्रदीप’. यह कहते हुए वे नामवरजी की ओर मुखातिब हुए और थोड़ा टेढ़े होकर वायु मुक्त की. नामवरजी ने तुरंत कहा—हां, हां निकलता था, अभी-अभी निकला है, और फिर निकलेगा. बाकी लोग आनंद की मुद्रा में थे. नामवरजी गंभीर. आशय कि वे गंभीर रहकर आनंद लेते हैं.

केदारनाथ सिंह ठीक ही कहते हैं—“यह कोई साधारण बात नहीं है कि पिछले तीन दशक के इतने बड़े कालखंड में समकालीन हिंदी साहित्य के केंद्र में एक आलोचक हैं. कोई रचना नहीं.” इस गुत्थी को सुलझाना होगा, तभी हमें नामवर सिंह होने के सही मायने पता चल सकेंगे.

(यह लेख हेमंत शर्मा की पुस्तक 'तमाशा मेरे आगे' से लिया गया है. पुस्तक प्रभात प्रकाशन द्वारा प्रकाशित की गई है.)

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