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बड़े गुलाम अली खान: जिन्होंने गाने के लिए रफी और लता से 50 गुना फीस ली

कहते हैं इनकार करने की नीयत से बड़े गुलाम अली खान ने के. आसिफ से मेहनताने के तौर पर एक गाने के 25,000 रुपए मांगे थे, ये वो दौर था जब लता और रफी जैसे मशहूर गायकों को एक गाने का 500 से कम मिलता था

Shivendra Kumar Singh Shivendra Kumar Singh Updated On: Apr 02, 2018 08:31 AM IST

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बड़े गुलाम अली खान: जिन्होंने गाने के लिए रफी और लता से 50 गुना फीस ली

रौबीला चेहरा, बड़ी बड़ी मूंछें, पहलवान जैसा हट्ठा-कट्ठा शरीर और पेट पर टिका हुआ सुरमंडल. देख के यकीन करना मुश्किल था कि इस शख्स का मौसीकी से कोई नाता है, लेकिन जब गले से सुर निकलते थे तो हर कोई जादू में सराबोर हो जाता था. ऐसी मुलायमियत, ऐसी लोच, तीनों सप्तकों में फर्राटे से दौड़ती ऐसी मीठी आवाज़ कि सुनने वालों की आह निकल जाए. पटियाला घराने के उस्ताद बड़े गुलाम अली खां की की गायकी और उनकी शख्सियत को शब्दों में समेटना बेहद मुश्किल काम है. संगीत के एक ऐसे साधक, एक ऐसे विद्वान और दिग्गज गायक, जिनका लोहा आने वाली पीढ़ियां भी मानती रहेंगी. खान साहब बड़े गुलाम अली खान खयाल, ध्रुपद, ठुमरी सब कुछ गाते थे लेकिन वो सबसे ज्यादा मशहूर हुए ठुमरी के लिए.

‘का करूं सजनी आए न बालम’, ‘याद पिया की आए’, ‘प्रेम जोगन बन के’, ‘नैना मोरे तरस रहे’, ‘कंकर मार जगाए’ इनमें से कोई न कोई ठुमरी आपके कानों में जरूर पड़ी होगी. बड़े गुलाम अली खान की आवाज़ में ये ठुमरियां अमर हो चुकी हैं. खान साहब की गाई ठुमरी ‘का करूं सजनी’ तो इतनी पॉपुलर हुई कि इसका आसान वर्जन यसुदास से गवाकर फिल्म-स्वामी में इस्तेमाल किया गया.

पटियाला घराने की विरासत

बड़े गुलाम अली खान अंग्रेजों के जमाने में पंजाब प्रांत के कसूर में पैदा हुए जो अब पाकिस्तान का हिस्सा है, साल था 1902. पिता अली बक्श खान भी उस दौर के जाने-माने गायक थे. लिहाज़ा 5 साल की उम्र से तालीम शुरू हो गई. 7 साल की उम्र में उन्होंने अपने चाचा काले खान से सारंगी और गाना दोनों सीखना शुरू किया. उस्ताद काले खान भी जाने-माने गायक और कंपोजर थे. खान साहब ने पटियाला घराने के उस्ताद अख्तर हुसैन खान और उस्ताद आशिक अली खान से भी संगीत की तालीम ली. 21 साल की उम्र में बड़े गुलाम अली खान बनारस आ गए, सारंगी पर संगत करने के साथ उन्होंने छोटे मोटे समारोहों में गाना शुरू कर दिया. कहते हैं कोलकाता में उनका एक बड़ा कॉन्सर्ट हुआ जिसके बाद उन्हें बड़ी पहचान मिल गई थी. लोग उनके गले का जादू देख और सुन चुके थे.

मुगल-ए-आज़म के गाने के लिए बड़े गुलाम अली खान ने रिकॉर्ड फीस ली

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1947 में जब भारत का बंटवारा हुआ तब कसूर पाकिस्तान का हिस्सा बन गया और खान साहब पाकिस्तान चले गए, लेकिन कुछ सालों के बाद वो हिंदुस्तान लौटे और फिर यहीं के होकर रह गए. बड़े गुलाम अली खान कहा करते थे- अगर हर घर में एक बच्चे को हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत सिखाया गया होता तो देश का कभी बंटवारा नहीं होता. 1957 में मोरारजी देसाई की मदद से उन्हें हिंदुस्तान की नागरिकता मिल गई.

सरकार की ओर से उन्हें मुंबई के मालाबार हिल्स में समंदर के पास एक बंगला भी दे दिया गया. हालांकि उनका ज्यादातर वक्त लाहौर, बांबे, कलकत्ता और हैदराबाद में घूमते हुए बीता. बड़े गुलाम अली की आवाज़ और उनकी लोकप्रियता देखकर कई फिल्म निर्माताओं ने उन्हें अपनी फिल्म में गवाना चाहा लेकिन खान साहब इनकार करते रहे. निर्माता के. आसिफ ही थे जो उन्हें किसी तरह अपनी फिल्म मुगल-ए-आज़म में दो राग आधारित गाने गाने के लिए राजी कर पाए.

कहते हैं इनकार करने की नीयत से बड़े गुलाम अली खान ने के. आसिफ से मेहनताने के तौर पर एक गाने के 25,000 रुपए मांगे थे, ये वो दौर था जब लता और रफी जैसे मशहूर गायकों को एक गाने का 500 से कम मिलता था. लेकिन के. आसिफ भी जिद के पक्के थे. उन्होंने खान साहब की मांग के मुताबिक पैसे दिए और उनसे गवाकर ही दम लिया. नौशाद के संगीत से रचे राग सोहनी और रागेश्वरी के उन दो गीतों ने बड़े गुलाम अली खान को और पॉपुलर बना दिया.

शास्त्रीय के संग लोक संगीत भी

खान साहब की गायकी में पटियाला कसूर घराने के अलावा जयपुर और ग्वालियर घराने की भी झलक मिलती थी. ठुमरी से लेकर ध्रुपद अंग तक वो बेहद सरलता और मधुरता के साथ गाते थे. राग को लेकर खान साहब का अध्ययन और तैयारी ऐसी थी कि एक राग को घंटों गा सकते थे लेकिन उन्होने हमेशा अपनी प्रस्तुति को छोटा और दिलचस्प रखा, हमेशा सुननेवालों को ध्यान में रखकर गाया और यही वजह है कि उनके चाहने वाले हिंदुस्तान और पाकिस्तान से लेकर पूरी दुनिया में फैले हुए हैं.

खान साहब अपने आप में एक स्कूल थे. ‘सबरंग’ नाम से उन्होंने अनगिनत बंदिशों की भी रचना की. अलग अलग प्रांतों में गाए जाने वाले लोक संगीत से कैसे शास्त्रीय रागों की रचना हुई, इस पर खान साहब का जबरदस्त अध्ययन था. लोकसंगीत और शास्त्रीय संगीत का रिश्ता बताते हुए ही वो राग पहाड़ी में एक रचना गाते थे- हरि ओम तत्सत. ये बड़े गुलाम अली खान की कालजयी और अमर रचना है जो ये भी बताती है कि मौसीकी का मजहब दुनियावी मजहब के कहीं ऊपर होता है.

Classical Music

1962 में खान साहब को भारत सरकार की ओर से पद्मभूषण मिला. उन्हें संगीत नाटक अकादमी अवॉर्ड से भी नावाजा गया. ये खान साहब का अपने हुनर और चाहने वालों को लेकर समर्पण था कि उन्होंने पुरस्कार और पदवियों से ज्यादा तवज्जों हमेशा अपने चाहने वालों के प्यार को दिया. अपने आखिरी दिनों में खान साहब लंबी बीमारी के बाद पैरालिसिस के शिकार हो गए थे. हैदराबाद के बशीरगढ़ पैलेस में 1968 में खान साहब ने दुनिया को अलविदा कह दिया. उनके सम्मान में बशीरगढ़ की मुख्य गली का नाम उस्ताद बड़े गुलाम अली खान मार्ग कर दिया गया है. खान साहब के बेटे मुनव्वर अली खान भी के बड़े गायक हुए. बड़े गुलाम अली खान की गायकी की स्टाइल को पंडित अजय चक्रवर्ती जैसे गायक बखूबी आगे बढ़ा रहे हैं.

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