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बाबरी विध्वंस: 26 साल पहले का वो मंजर, जब गिराया गया मस्जिद का पहला गुंबद

दो बजकर 45 मिनट पर बाबरी ढांचे का पहला गुंबद गिरा था. इसके बाद स्थिति पूरी तरह बेकाबू हो गई.

Updated On: Dec 06, 2018 10:46 AM IST

Hemant Sharma Hemant Sharma
वरिष्ठ पत्रकार

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बाबरी विध्वंस: 26 साल पहले का वो मंजर, जब गिराया गया मस्जिद का पहला गुंबद

6 दिसंबर 1992 तक हालात इतने बिगड़ चुके थे कि बिना ढाल प्रयोग किए स्थिति को नियंत्रित करना संभव नहीं था. हजारों कारसेवकों से घिर जाने के बाद जो थोड़े-बहुत राज्य पुलिस के जवान और पीएसी मौके पर तैनात थी, वह भी किनारे हट गई. अब कोई फोर्स ढांचे के पास या उसके अंदर नहीं थी. सभी सुरक्षा बल निष्क्रिय हो गए थे. कारसेवकों और पुलिस का रिश्ता बदल गया था. पुलिस का अहिंसक रवैया देख कारसेवकों से उनके रिश्ते मित्रवत हो गए. ढांचे के सामने वॉचटावर पर चढ़ एक गणवेशधारी सीटी बजा, झंडा दिखा लगातार कुछ निर्देश दे रहा था. यह वॉचटावर सुरक्षा बलों ने अपने लिए बनाया था. पर उस पर चढ़ वह गणवेशधारी ध्वंस का निर्देशन कर रहा था. तभी कारसेवकों के एक हुजूम ने अयोध्या की सभी टेलीफोन लाइनें काट दीं. राम जन्मभूमि के अंदर बने कंट्रोलरूम के भी संचार उपकरण उखाड़ दिए. यह सब कुछ ढांचे पर हमले के बीस मिनट के भीतर हो गया.

यकायक सामने मानस भवन की छत पर कोहराम मचा. कारसेवकों ने वहां पत्रकारों पर हमला कर दिया था. छत पर लगे सभी कैमरों को तोड़ दिया गया. डी.एम. और एस.एस.पी. उधर दौड़े. दोनों अफसर जब मानस भवन की छत पर चढ़ने लगे तो वहां मौजूद कारसेवकों ने इनका विरोध किया. उन्हें डर था कि पुलिस मानस भवन की छत पर नियंत्रण करके वहां से गुंबद पर चढ़े कारसेवकों पर गोली चला सकती है.

दोनों अफसर किसी तरह छत पर तो चढ़ गए, पर वे न तो छत से कारसेवकों को उतारने में सफल हुए, न पत्रकारों की पिटाई रोक पाए, इस बीच गुंबद पर हमला जारी था. गुंबद में छेद कर उसमें एक एंकर फंसा रस्सी के जरिए कुछ और लोग ऊपर चढ़ गए. गुंबद पर पांव टिकाने की कोई जगह नहीं थी. इसलिए हर थोड़ी देर में कोई कारसेवक गुंबद से टपकता था. पांच घंटे में कोई डेढ़ सौ से ज्यादा कारसेवक गुंबद से गिरकर घायल हुए. विश्व हिंदू परिषद ने घायलों के इलाज के लिए एक टीम पहले से बना रखी थी. इस टीम के पास चारपाई और एंबुलेंस भी थी. यह टोली घायल कारसेवकों को चारपाई पर उठा एंबुलेंस के जरिए अस्पताल पहुंचा रही थी.

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(फोटो: रॉयटर्स)

प्रशासन की नजर में स्थिति बेकाबू थी. कारसेवकों की नजर में हालात काबू में थे. कुल मिलाकर स्थिति बेकाबू थी. कोई कुछ सुनने को तैयार नहीं था. रामकथा कुंज के मंच से आडवाणी कारसेवकों से लौटने की अपील कर रहे थे. वे कारसेवकों को डांट भी रहे थे. उनकी अपील बेअसर देख माइक अशोक सिंघल ने संभाला. उन्होंने घोषणा की कि विवादित भवन मस्जिद नहीं मंदिर है. कारसेवक उसे नुकसान न पहुंचाएं. रामलला की उन्हें सौगंध है. वे नीचे उतर आएं.

इसका भी कोई असर नहीं हुआ, तो अशोक सिंघल और महंत नृत्यगोपाल दास मंच से नीचे उतर ढांचे की ओर बढ़े. नृत्यगोपाल दास का सभी सम्मान करते थे. पर पगलाई भीड़ ने उन दोनों के साथ बदसलूकी कर दी. एक के तो कपड़े फट गए. दोनों बिना किसी नतीजे के वापस आ गए. तभी किसी ने सूचना दी, जो कारसेवक चढ़े हैं, वे दक्षिण भारत के हैं. संघ के शीर्ष नेता एच.वी. शेषाद्रि ने माइक पर दक्षिण की चारों भाषाओं में बारी-बारी से अपील की. उन्होंने कहा, 'विवादित इमारत को तोड़ने का काम संघ और विहिप के कार्यक्रम में नहीं है. आप लोग नीचे उतरें. पर कोई उनकी भी सुनने को तैयार नहीं था. थोड़ी देर में मंच से आवाज भी आनी बंद हो गई. बाद में पता चला, किसी ने माइक का तार काट दिया था.'

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मेरी छत पर धीरे-धीरे डीआईजी रेंज, आईजी जोन, आईजी, पीएसी, सीआरपीएफ के डीआईजी मलिक सब आ चुके थे. तोड़-फोड़ के डेढ़ घंटे गुजर चुके थे. कोई गुंबद गिरा नहीं था. प्रधानमंत्री नरसिंह राव के बेटे प्रभाकर राव का घरेलू नौकर भी कारसेवा में आया था. वह मलबे में दबकर मारा गया. दिल्ली से उसकी खबर ली जा रही थी. तभी गर्भगृह से पुजारी सत्येंद्र दास भी रामलला की मूर्ति लेकर बाहर आते दिखे. बाद में वह मूर्ति किसी ने गायब कर दी. एक बजकर 45 मिनट पर कंट्रोलरूम में लखनऊ से रेडियोग्राम पहुंचा. स्थिति को काबू में करने के लिए केंद्रीय बलों का इस्तेमाल किया जाए. पर यह भी सुनिश्चित किया जाए कि गोली न चले.

वह ऐतिहासिक वायरलेस इस प्रकार था- 'सेवा में, आईजी जोन, डीआईजी फैजाबाद एसएसपी फैजाबाद, प्रेषक, ए टू डीजी, 'मुझे कहने का निर्देश हुआ है कि आप केंद्रीय पुलिस बलों के अधिकारियों से तुरंत संपर्क कर उनसे पूर्ण सहायता प्राप्त करें. लेकिन यह सुनिश्चित करें कि गोली न चले.' संदेश मिलते ही जिलाधिकारी आरएन श्रीवास्तव ने वहीं मौजूद सीआरपीएफ के डीआईजी मलिक से लिखित अनुरोध किया कि 50 कंपनी सीआरपीएफ मौके पर तुरंत भेजी जाएं.

मलिक ने कहा, हम तैयार हैं. पर उनका कहना था कि केंद्रीय बल की हर कंपनी के साथ एक मजिस्ट्रेट और कंपनी के दोनों तरफ पीएसी के जवान सुरक्षा में चलें. इस बेढंगी मांग पर एसएसपी डीबी राय नाराज हो गए. उनकी दलील थी कि इतनी फोर्स होती तो हम केंद्रीय बल क्यों मांगते. राय ने कहा, 'यह शायद दुनिया में पहली घटना होगी, जब दंगाइयों को काबू करने के लिए किसी पुलिस बल ने अपनी सुरक्षा में किसी और पुलिस बल की मांग की हो. मैं 50 राजपत्रित अफसर, 50 मजिस्ट्रेट, 50 कंपनी पीएसी कहां से लाऊं?'

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इस जद्दोजहद के बाद 50 की जगह 18 कंपनी केंद्रीय सुरक्षा बल फैजाबाद से सिटी मजिस्ट्रेट और सीओ के साथ अयोध्या के लिए रवाना हुए, लेकिन मौके से कोई दो किमी दूर साकेत डिग्री कॉलेज के पास उपद्रवियों ने इन्हें रोक दिया. वहां कारसेवकों ने रास्ता रोक रखा था. जो काम सुरक्षा बलों को पहले करना चाहिए था कारसेवकों को रोकने के लिए, वह काम कारसेवक सुरक्षा बलों को रोकने के लिए कर रहे थे. उनके पास बैरिकेड्स नहीं थे. इसलिए सड़क पर बाड़ और गुमटियां रख आग लगा दी थी, ताकि सुरक्षा बलों का कोई वाहन न आ सके. लेकिन अगर पुलिस थोड़ा संघर्ष करती तो उन्हें खदेड़ सकती थी. पर स्थानीय प्रशासन की मंशा नहीं थी, वहां केंद्रीय बलों को पहुंचाने की.

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इस रुकावट की आड़ में जिला प्रशासन ने केंद्रीय बलों को लौट जाने को कहा. नगर मजिस्ट्रेट सुधाकर अदीब ने डीआईजी सीआरपीएफ को हाथ से लिखकर एक आदेश दिया कि साकेत डिग्री कॉलेज पर आपकी जो टुकड़ियां हैं, वे वहां मौजूद उग्र भीड़ की वजह से आगे नहीं बढ़ पा रही हैं, इसलिए आप उन्हें वापस लौटने को कहें. एक बजकर 45 मिनट पर सिटी मजिस्ट्रेट ने सुरक्षा बलों को लौटने को कहा, दो बजकर 45 मिनट पर बाबरी ढांचे का पहला गुंबद गिरा था. इसके बाद स्थिति पूरी तरह बेकाबू हो गई.

( वरिष्ठ पत्रकार हेमंत शर्मा की किताब युद्ध में अयोध्या का अंश, इसे प्रभात पेपर बैक्स ने प्रकाशित किया है )

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