विधानसभा चुनाव | गुजरात | हिमाचल प्रदेश
S M L

बाबरी मस्जिद विवाद: जिसके बाद वाजपेयी पीएम बन गए और आडवाणी मार्गदर्शक!

वाजपेयी ने 1989 में खत लिखकर हीरेन मुखर्जी को कहा था कि बीजेपी बतौर पार्टी इस आंदोलन में शामिल नहीं होगी

Animesh Mukharjee Animesh Mukharjee Updated On: Dec 06, 2017 10:26 AM IST

0
बाबरी मस्जिद विवाद: जिसके बाद वाजपेयी पीएम बन गए और आडवाणी मार्गदर्शक!

6 दिसंबर, 1992 को हिंदुस्तान के इतिहास की सबसे खास तारीखों में रखा जा सकता है. 6 दिसंबर ने हिंदुस्तान की राजनीति, इतिहास और समाजशास्त्र को दो हिस्सों में बांट दिया. आज जिस युवा भारत की बात हर जगह होती है वो उस समय या तो स्कूल में था या पालने में किलकारियां भर रहा था. इस घटना ने लंबे समय तक बीजेपी को बाकी लगभग सभी पार्टियों के लिए अछूत बना दिया था. बड़े तबके की राजनीति इस पर सिमट गई थी कि बीजेपी को हराना है. सियासत में लंबे समय तक ये समीकरण चलता रहा. 2014 में यही समीकरण बिलकुल उलट प्रतिक्रिया के साथ सामने आया.

1992 से 2017 तक बाबरी ढांचे को गिराए जाने के 25 साल पूरे हो गए हैं. इन 25 सालों में लगभग 8 साल एनडीए सरकार रही. मंदिर वहीं बनाएंगे के नारे पर सत्ता में आई बीजेपी ने इस एक तिहाई समय में मंदिर से एक निश्चित दूरी और निश्चित नजदीकी बनाए रखी.

मंदिर मुद्दे को लेकर इन पच्चीस सालों बीजेपी के अंदर की यात्रा बड़ी दिलचस्प है. कई चेहरे हैं, कई परते हैं. इन सबको आसानी से समझने के लिए उस समय की घटनाओं और बयानों को सिलसिलेवार तरीके से समझते हैं.

मंदिर आंदोलन से वाजपेयी की दूरी

अटल बिहारी वाजपेयी पर लिखी अपनी किताब 'हार नहीं मानूंगा' में विजय त्रिवेदी बताते हैं कि वाजपेयी बिना संघर्ष के राम मंदिर निर्माण चाहने वालों में थे. तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव को भी इसी खेमे का माना जाता है. वाजपेयी राम जन्मभूमि आंदोलन में शामिल नहीं हुए मगर जब जरूरत पड़ी तो गिरफ्तारी दी.

उस समय की बीजेपी में दो बड़े नाम थे. अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण अाडवाणी. अाडवाणी जहां देश भर में अपनी रथ यात्रा से रामजन्म भूमि आंदोलन के पक्ष में माहौल बना रहे थे. अटल इसको उन्माद से अलग रखने के पक्ष में थे. विजय त्रिवेदी की ही किताब में जिक्र मिलता है कि 1990 में ग्वालियर में वाजपेयी ने भड़काऊ नारे लगा रहे कार्यकर्ता को मुंह पर हाथ रखकर चुप करा दिया था.

दूसरी तरफ अाडवाणी हिंदू हृदय सम्राट की छवि के साथ पूजे जा रहे थे. पार्टी में उनकी धाक थी. राम मंदिर का सपना देख रही जनता उनके रथ के दर्शन करने जाती थी. वाजपेयी पार्टी में हाशिए पर आ गए. गोविंदाचार्य ने 1991 में उनको लखनऊ से चुनाव लड़वाने से मना कर दिया. हालांकि वाजपेयी वहां से लड़े भी और जीते भी.

1989 में राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद विवाद पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी  के नेता हीरेन मुखर्जी और वाजपेयी के बीच बड़ा अहम पत्र व्यवहार हुआ था. जब हीरेन मुखर्जी ने  राम जन्मभूमि को राष्ट्रीय स्मारक बनाने की बात की थी.

वाजपेयी ने अपनी चिट्ठी में लिखा

हीरेन दा, आपकी तरह मैं भी इस मामले के शांतिपूर्ण हल के पक्ष में हूं. जब मैंने कहा कि अदालत इस मामले को हल नहीं कर सकती तो मेरा मतलब सिर्फ यह था कि ऐसे संवेदनशील मामले में जहां विवाद ने भावनाओं, खासकर धार्मिक भावनाओं को गहराई तक छुआ हो, अदालत के किसी भी फैसले को लागू करवाना बहुत मुश्किल होगा. बदकिस्मती से सरकार ने इस सिलसिले में शाहबानो मामले में अदालत के फैसले को बदल कर मिसाल पहले ही बना दी है.

 जहां तक इस इमारत को राष्ट्रीय स्मारक बनाने का सवाल है तो यह पूछा जा सकता है कि यह स्मारक किस बात का होगा. धार्मिक असहिष्णुता , एक धर्म के पूजा स्थल को दूसरे धर्म के लोगों द्वारा तोड़ने की स्मृति के सिवाय ,यह किस चीज़ का स्मारक होगा?

गौर करिए कि ये पत्र 1990 में अाडवाणी के रथयात्रा पर निकलने के ठीक पहले लिखा गया है. इसमें वाजपेयी ने ये भी कहा था कि बीजेपी बतौर पार्टी इस आंदोलन में शामिल नहीं होगी.

वो बदला-बदला सा भाषण

वाजपेयी के बारे में कहा जाता है कि वो राजनीति में धर्म गुरुओं के आने और पार्टी के धार्मिक मुद्दों में घुसने से सहमत नहीं होते थे. मगर उनकी इससे बड़ी आदत थी कि आम सहमति और संगठन की बात आने पर वो अपने निजी विचार पीछे कर देते थे. जब भी ऐसी कोई स्थिति आई तो वाजपेयी ने संगठन को अपने से पहले रखा. इसी की सबसे बड़ी बानगी है, उनका 5 दिसंबर को लखनऊ में दिया भाषण. वाजपेयी अपने नपे-तुले शब्दों में बहुत कुछ कह गए. इसके बाद वो दिल्ली निकल गए. अगले दिन मस्जिद गिरी तो वो वहां नहीं थे. कई लोग उन पर मूक दर्शक बने रहने का आरोप लगाते हैं. ऐसा ही आरोप ये लोग उनपर 2002 के लिए भी लगाते हैं. खैर, वाजपेयी का वो भाषण पढ़िए.

लखनऊ- 5 दिसंबर,1992 , अटल बिहारी वाजपेयी का भाषण

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का मतलब बताता हूं कि हम कार सेवा करें. कल कारसेवा से किसी की अवहेलना नहीं होगी. बल्कि कार सेवा करके सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का सम्मान किया जाएगा. यह ठीक है कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जब तक हाईकोर्ट की लखनऊ बैंच फैसला नहीं करती, तब तक निर्माण का काम बंद रखना होगा, लेकिन आप भजन कर सकते हैं, कीर्तन कर सकते हैं और भजन एक आदमी नहीं कर सकता, सामूहिक होता है. कीर्तन के लिए तो और भी ज़्यादा लोगों की ज़रूरत होगी. कीर्तन खड़े रह कर नहीं हो सकता , वहां नुकीले पत्थर निकले हैं उन पर तो कोई नहीं बैठ सकता, तो ज़मीन को समतल करना पड़ेगा. यज्ञ का आयोजन होगा, कुछ निर्माण भी होगा , कम से कम वेदी तो बनेगी.

वाजपेयी कवि भी थे और चुन-चुनकर शब्द रखना उनकी खासियत थी. इसलिए उनके इस भाषण से कई भावार्थ निकलते हैं. जिनके संदर्भ प्रसंग की चर्चा की जा सकती है. मगर विवादित ढांचे के गिरने के बाद उनकी प्रतिक्रियाएं एक दूसरी कहानी कहती हैं.

राजनीति का धर्म और धर्म की राजनीति विजय त्रिवेदी की मानें तो अशोक सिंहल का कहना था कि अाडवाणी की रथयात्रा राजनीतिक कारणों से थी. वो वीपी सिंह की सरकार को गिराना चाहते थे और इसके लिए तरीका तलाश रहे थे. सिंहल इस कारण बीजेपी से नाराज़ भी रहते थे.

अगर ये बात सच है तो नियति ने अलग ही खेल दिखाया. 90 के दशक की शुरुआत में जो वाजपेयी बीजेपी में हाशिये पर थे, 5 साल बाद ही प्रधानमंत्री बन गए. अाडवाणी तमाम बातों के बाद भी प्रधानमंत्री पद नहीं पा सके. अाडवाणी ने रथयात्रा के जरिए एक मार्ग खोला था मगर देखते ही देखते वो इस मार्ग पर महज मार्गदर्शक बन गए. इसमें कुछ नीति है, कुछ नियति.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi