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भारत के राजनीतिक गगन का एक अद्भुत सितारा लुप्त हो गया है

अटल जी का प्रभावशाली व्यक्ति दलगत राजनीति से ऊपर था. वह समाज के सभी वर्गों में अत्यंत लोकप्रिय थे. देश उन्हें सदा मानवता के मसीहा के रूप में याद करता रहेगा.

Updated On: Aug 18, 2018 07:47 PM IST

Ashok Tandon

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भारत के राजनीतिक गगन का एक अद्भुत सितारा लुप्त हो गया है
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अटल जी का प्रभावशाली व्यक्ति दलगत राजनीति से ऊपर था. वह समाज के सभी वर्गों में अत्यंत लोकप्रिय थे. देश उन्हें सदा मानवता के मसीहा के रूप में याद करता रहेगा.

इसमें दो राय नहीं हो सकती कि अटल जी के नेतृत्व में छह साल तक चली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की सरकार का कार्यकाल 'सुशासन' का युग माना जाता है. विशेष तौर पर, विभिन्न विचारधारा वाले कई दलों को लेकर जिस प्रकार अटल जी ने एक स्थायी और स्वच्छ सरकार चलाई वह अपने आप में केन्द्र में शासन करने का एक अनूठा उदाहरण है.

अटल जी के कार्यकाल में देश परमाणु शक्ति संपन्न बना, आर्थिक क्षेत्र में लगातार प्रगति हुई, महंगाई पर काबू बना रहा, विदेशी मुद्रा का भंडार तेजी से बढ़ा और पूंजी निवेश की भी भरमार रही. लेकिन अटल जी जैसे प्रतिभावान व्यक्तित्व को केवल एनडीए के सफल प्रधानमंत्री के दायरे में रखकर आंकना इस युगपुरुष के साथ अन्याय होगा.

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अटल जी सदा बहुआयामी प्रतिभा के धनी के रूप में जाने जाते रहे हैं. उनका लंबा संसदीय जीवन राजनीतिक क्षेत्र के काम करने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए अनुकरणीय रहा है. 25 दिसंबर 1924 को ग्वालियर के एक साधारण परिवार में जन्मे अटल को कविता लिखना और पढ़ना अपने स्कूल अध्यापक पिता कृष्ण बिहारी वाजपेयी से विरासत में मिला.

बाल्यकाल से ही उनकी रुचि सामाजिक कार्यों में थी, जिसके चलते वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संपर्क मे आए और 1942 के असहयोग आंदोलन में भाग लेने के लिए ब्रिटिश सरकार ने उन्हें जेल में डाला था. अटल जी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक रहते हुए पत्रकार बने और 1951 में भारतीय जनसंघ की स्थापना के साथ राजनीति में आए और उन्हें दल के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का राजनीतिक सहायक नियुक्त किया गया.

अटल जी 1957 में उत्तर प्रदेश के बलरामपुर से चुनकर लोकसभा में पहुंचे और 47 वर्ष तक सांसद रहे. वह ग्यारह बार लोकसभा और दो बार राज्य सभा के लिए चुने गए.

अटल जी 1977 में मोरारजी देसाई के नेतृत्व वाली जनता पार्टी की सरकार में विदेश मंत्री बने. उनका यह कार्यकाल तीन प्रमुख उपलब्धियों के लिए लंबे समय तक याद किया जाता रहा–  देशभर में पासपोर्ट की सुविधा प्रदान कराए जाने की पहल, पाकिस्तान सहित सभी पड़ोसी देशों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध बनाने की नीति और संयुक्त राष्ट्र संघ में पहली बार हिंदी में भाषण.

अटल जी ने अपने राजनीतिक जीवन में अनेक उतार-चढ़ाव देखे हैं. दो बार तो उन्हें लोकसभा चुनावों में हार का भी सामना करना पड़ा. लेकिन उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा. उन्हीं के शब्दों में-

टूटे हुए तारों से फूटे बासंती स्वर

पत्थर की छाती मे उग आया नव अंकुर

झरे सब पीले पात कोयल की कुहुक रात

प्राची मे अरुणिम की रेख देख पता हूं

गीत नया गाता हूं

टूटे हुए सपनों की कौन सुने सिसकी

अन्तर की चीर व्यथा पलकों पर ठिठकी

हार नहीं मानूंगा, रार नई ठानूंगा

काल के कपाल पे लिखता मिटाता हूँ

गीत नया गाता हूं.

अटल जी ने एक मंझे हुए सांसद, एक ओजस्वी वक्ता के साथ-साथ कवि हृदय के रूप में भी अपनी पहचान बनाते हुए देश के राजनीतिक एवं सामाजिक जीवन में एक अमिट छाप छोड़ी है. उनके संसद में दिए गए भाषण उनके समकालीन एवं नई पीढ़ी के सांसदों के लिए सदा प्रेरणास्रोत रहे हैं.

अटल जी का लोकसभा में दिया गया पहला भाषण इतना प्रभावशाली था कि तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने अनायास यह टिप्पणी कर उनका मनोबल बढ़ाया, 'यह नौजवान एक दिन देश का प्रधानमंत्री बनेगा.'

अटल जी अपनी कविताओं में समकालीन घटनाओं एवं परिस्थितियों का आकलन एवं विश्लेषण बखूबी करते रहे हैं. उनके मन पर गहरी छाप छोड़ने वाले अथवा उनको व्यथित करने वाले सभी प्रकरणों का बखान कविता द्वारा करना अटल जी के व्यक्तित्व का एक अनूठा पहलू रहा है. किसी विशेष परिस्थितियों में उनकी कविता, 'गीत नहीं गाता हूं' राजनीतिक गलियारों में बहुचर्चित हुई थी.

बेनकाब चेहरे हैं, दाग बड़े गहरे हैं

टूटता तिलिस्म आज सच से भय खाता हूं

गीत नहीं गाता हूं

लगी कुछ ऐसी नज़र बिखरा शीशे सा शहर

अपनों के मेले में मीत नहीं पाता हूं

गीत नहीं गाता हूं

पीठ मे छुरी सा चांद, राहु गया रेखा फांद

मुक्ति के क्षणों में बार-बार बंध जाता हूं

गीत नहीं गाता हूं.

इस कविता में कवि की संवेदना का चित्रण करते हुए अटल जी अपने राजनीतिक जीवन के किसी अत्यंत दुखद पड़ाव की ओर इशारा करते हैं. राजनीतिक एवं सामाजिक जीवन में विपरीत विचारधारा से संबंधित लोगों के साथ व्यक्तिगत जीवन में सहज संबंध बनाए रखना भी अटल जी के अजातशत्रु व्यक्तित्व का एक महत्वपूर्ण पहलू रहा है.

गलत नीतियों पर कठोर प्रहार के लिए उनके शब्दों के तरकश में पैने तीरों की कमी कभी नहीं थी. बात 1964 की है, जब नेहरू सरकार ने नेशनल कांफ्रेंस नेता शेख अब्दुल्ला को रिहा कर पाक अधिकृत कश्मीर जाने की अनुमति दी थी.

राज्यसभा में अटल जी ने जिन कड़े शब्दों में सरकार की कश्मीर नीति की आलोचना की थी, उसने पंडित नेहरू को विचलित कर दिया था. लेकिन अटल जी ने कुछ दिन बाद ही पंडित नेहरू के देहांत पर उसी राज्यसभा में उनको जिन शब्दों से भावभीनी श्रद्धांजलि दी थी, वह बेमिसाल थी.

Vajpayee passes away

अटल जी के मित्रों में उनके समकालीन वरिष्ठ नेताओं में आर. वेंकटरमन, इंद्र कुमार गुजराल, सोमनाथ चटर्जी, शरद यादव और प्रकाश सिंह बादल प्रमुख रहे हैं. उनकी अपनी पार्टी में लालकृष्ण आडवाणी और भैरोंसिंह शेखावत को अटल जी सदा अपना घनिष्ठ मित्र मानते रहे.

राजनीतिक जीवन में पारदर्शिता, व्यक्तिगत जीवन में शुचिता और सरकार में सुशासन, अटल जी के जीवन मूल्य रहे, जिनका पालन करते हुए उन्होंने भारतीय लोकतंत्र को सुदृढ़ करने की दिशा में जो योगदान दिया, उसके लिए यह देश सदा उनका ऋणी रहेगा.

कृतज्ञ राष्ट्र आज उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दे रहा है और उन्हें सदा नमन करता  रहेगा. नरेंद्र मोदी सरकार ने उन्हें भारत रत्न से नवाज कर एनडीए सरकार की उनकी प्रति सच्ची निष्ठा का प्रमाण दिया था.

(लेखक अटल बिहारी वाजपेयी के मीडिया सलाहकार थे.)

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