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'अटल' के पिता से क्यों पूछते थे प्रोफेसर 'आपके साहबजादे कहां नदारद हैं पंडित जी'

अटल बचपन से ही पढ़ने-लिखने में बहुत होशियार थे. उन्होंने कानपुर के डीएवी कॉलेज से पढ़ाई की थी

Updated On: Aug 17, 2018 12:30 AM IST

Rituraj Tripathi Rituraj Tripathi

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'अटल' के पिता से क्यों पूछते थे प्रोफेसर 'आपके साहबजादे कहां नदारद हैं पंडित जी'
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पूर्व प्रधानमंत्री और बीजेपी को राष्ट्रीय सत्ता में स्थापित करने वाले अटल बिहारी वाजपेयी का 94 साल की उम्र में निधन हो गया. वह दिल्ली के एम्स में बुधवार रात से लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर थे. गुरुवार को अपनी जिंदादिली के लिए मशहूर और सदन में सबके चेहरे की मुस्कान बनने वाले वाजपेयी के लिए पूरे देश ने शोक मनाया. उनकी हालत पिछले 24 घंटों से नाजुक बनी हुई थी. लेकिन पूरे देश की प्रार्थनाओं को उस वक्त झटका लगा जब एम्स से उनके निधन की खबर सामने आई.

अटल का व्यक्तित्व हमेशा से ही दूसरों को प्रभावित करता रहा है. एक पत्रकार, कवि और नेता के रूप में अटल ने दुनिया को बहुत कुछ दिया. उन्होंने एक बार खुद इस बात का जिक्र किया था कि वह नेता नहीं बनना चाहते थे, वह तो पत्रकार बनकर देश की समस्याओं को सवालों के जरिए सामने लाना चाहते थे. हालांकि देश के प्रति प्रेम से लबरेज अटल की किस्मत में तो प्रधानमंत्री बनना ही लिखा था.

अटल बचपन से ही पढ़ने-लिखने में बहुत होशियार थे. उन्होंने कानपुर के डीएवी कॉलेज से पढ़ाई की थी. साल 1946 में अटल ने राजनीति शास्त्र में एमए किया था और वे टॉपर रहे थे. बाद में इसी कॉलेज से अटल ने कानून की पढ़ाई की. दिलचस्प यह है कि अटल के पिता पंडित कृष्ण बिहारी लाल वाजपेयी भी उनके साथ एलएलबी की पढ़ाई किया करते थे.

पिता कहते थे-  कमरे की कुंडी लगाकर आते होंगे प्रोफसर साहब

अटल के जमाने में यह कॉलेज आगरा विश्वविद्यालय से जुड़ा था लेकिन अब यह कानपुर विश्वविद्यालय से जुड़ा है. अटल अपने पिताजी के साथ कॉलेज के हॉस्टल में रहा करते थे और दोनों लोगों की जुगलबंदी पूरे कॉलेज में मशहूर थी.

जब अटल क्लास में नहीं होते थे तो उनके पिता से प्रोफेसर पूछ लिया करते थे..'आपके साहबजादे कहां नदारद हैं पंडित जी.' तब अटल के पिता कहा करते थे..'कमरे की कुंडी लगाकर आते होंगे प्रोफसर साहब.' लेकिन जब छात्रों ने पिता-पुत्र के बारे में बातें करनी शुरू कर दीं तो उन्होंने अपने सेक्शन बदल लिए थे.

अटल ने 1948 में एलएलबी में एडमिशन लिया था लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के काम की वजह से उन्हें 1949 में लखनऊ जाना पड़ा और कानून की पढ़ाई बीच में छूट गई. लेकिन जब तक वह कानपुर रहे, उन्होंने अपने पिता के साथ मिलकर ट्यूशन भी पढ़ाई. हालांकि ग्वालियर के राजा ने उन्हें 75 रुपए की छात्रवृत्ति दिलवाई थी. जिसे लेकर वह कानपुर पढ़ने आए थे.

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