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कड़े फैसलों के समय छलावा बन जाता था वाजपेयी का बाहरी नरम व्यक्तित्व

जब भी कड़े फैसले लेने की बारी आती थी, तब बाहरी तौर पर उनका नरम व्यक्तित्व छलावे की तरह होता था. करगिल में घुसपैठ के बाद पाकिस्तान को इसका अंदाजा जरूर लगा होगा.

Updated On: Aug 16, 2018 06:12 PM IST

Ajay Singh Ajay Singh

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कड़े फैसलों के समय छलावा बन जाता था वाजपेयी का बाहरी नरम व्यक्तित्व

'अच्छे वाजपेयी का क्या करेंगे?' अटल बिहारी वाजपेयी ने विपक्ष को अपने खास अंदाज में 1996 के विश्वास मत के दौरान यह जवाब दिया था. विपक्ष तंज कस रहा था, ‘वह अच्छे इंसान हैं, लेकिन गलत पार्टी में हैं.’ उनका अंदाज कुछ ऐसा था कि पूरा सदन ठहाकों से गूंज गया था. वाजपेयी सरकार महज 13 दिन रह पाई थी. लेकिन उस दौरान लोकसभा ने जो भाषण सुने और अनुभव किए, वो बेहतरीन थे.

अगर उन्हें देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू इतना पसंद करते थे, तो यह बेवजह नहीं था. एक कहानी भी है, जिसकी पुष्टि नहीं की जा सकती. इस कहानी के मुताबिक नेहरू ने वाजपेयी को भविष्य का प्रधानमंत्री कहा था. इस कहानी पर शंका हो सकती है, लेकिन इस बात पर कतई नहीं कि 50 और 60 के दशक में वाजपेयी बेहतरीन वक्ता के तौर पर उभरे. लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ, जब उन्होंने वास्तविकता के साथ अपना नाता तोड़ा हो. उन्हें काफी पहले समझ आ गया था कि उनके भाषण को सुनने आई जबरदस्त भीड़ पार्टी को वोट नहीं देगी. उस समय वो भारतीय जनसंघ से जुड़े थे. उन्होंने 70 के दशक में कानपुर में हुई रैली में भाषण देते हुए कहा था, ‘सुनने सब आते हो पर वोट नहीं देते हो.’

रॉयटर्स पिक्चर

रॉयटर्स पिक्चर

उनके बारे में दिलचस्प किस्सा मुझे उनके बहुत पुराने साथी यादव राव देशमुख ने सुनाया था. 70 के दशक की शुरुआत में वाजपेयी ने यूपी की दो सीटों से चुनाव लड़ा, दोनों हार गए. चुनाव हारने के बाद उन्होंने देशमुख से कहा कि चलो फिल्म देखने चलते हैं. दोनों साइकिल पर फिल्म देखने गए. देशमुख हमेशा कहते थे कि उनमें लोगों को आकर्षित करने की गजब की क्षमता थी. यहां तक कि विपक्षी खेमे के लोग भी उन्हें सुनने आते थे.

दरअसल, इस बात में कोई शंका नहीं कि वाजपेयी भारतीय जीनियस के तौर पर पहचान रखते हैं. भले ही उन्हें ऐसे ही देखने से एक साधारण शख्स नजर आता हो. लेकिन उनमें एक खास आकर्षण था, जो नेहरू के बाद और किसी में देखने को नहीं मिला. ऐसी पार्टी, जिसे एक खास किस्म की रूढ़िवादी सोच के साथ जोड़ा जाता रहा, उसमें वाजपेयी तमाम पारंपरिक सोच और धारणाओं को तोड़ते दिखाई देते हैं. उन्हें अच्छा खाना बहुत पसंद रहा, जिसमें नॉन वेज शामिल है. उनकी जीवन शैली संयम भरी रही, लेकिन तपस्वी जैसी नहीं. वो परिवार के साथ रहे, जिसको उन्होंने अपनाया था. हालांकि वैसे वो कुंवारे थे.

लेकिन उनकी टिप्पणियां बड़ी कमाल की होती थीं, जो उनके सबसे बड़े दुश्मन को भी निरुत्तर कर देती थीं. एक बार गोवा में राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक थी. उन्होंने जींस और टी-शर्ट पहनी हुई थी. उन्होंने मौसम को देखकर टिप्पणी की, ‘बड़ा मादक मौसम है.’ मेरे एक साथी पास में खड़े थे, जिन्होंने पूछा कि आपको कैसे पता, आप तो कुंवारे हैं. इस पर वाजपेयी ने शरारत भरे अंदाज में उन्हें देखा और कहा, ‘अरे भाई, शादी नहीं की तो क्या हुआ, बारात तो गए हैं.’ कहने की जरूरत नहीं कि उनकी इस टिप्पणी से ठहाके गूंजने लगे.

हल्के-फुल्के अंदाज और सौम्य स्वभाव के पीछे एक गंभीर राजनेता था, जिसने गरीबों का जीवन सुधारने के लिए काम किया. जब गवर्नेंस की बात आती थी, तो उनका अंदाज बदल जाता था. वो टफ टास्क मास्टर थे, जिन्हें किसी तरह की बकवास पसंद नहीं थी. याद कीजिए, किस तरह उन्होंने 1998 में जयललिता की मांग न मानने का फैसला किया. वो सुब्रमण्यम स्वामी को कैबिनेट में जगह दिलाना चाहती थीं. राम जेठमलानी को कैबिनेट से हटाने का फैसला भी याद कीजिए, जब जेठमलानी और भारत के मुख्य न्यायाधीश के बीच विवाद हुआ था. इसी तरह, जब प्रमोद महाजन को ‘अपनी सीमाएं’ दिखाने की बात आई, तो उन्होंने महाजन को पार्टी कामों के लिए भेज दिया.

उनके वनलाइनर काफी मजबूती से कहे जाते थे. इसका एक उदाहरण है. हालात बने, जब जे कृष्णमूर्ति बीजेपी अध्यक्ष का पद छोड़ने को तैयार नहीं थे. प्रधानमंत्री के तौर पर उनका दूसरा कार्यकाल चल रहा था. उन्होंने सिर्फ इतना कहा, ‘मैं कौन होता हूं उनसे हटने को कहने के लिए? वो मुझे पीएम के पद से हटा सकते हैं.’ जे. कृष्णमूर्ति के लिए यह संदेश काफी था कि वो हट जाएं.

भले ही जाति से ब्राह्मण थे, लेकिन वाजपेयी के दिल में वो राजनीति थी, जो पिछड़ों, दलितों और समाज के वंचित तबके की बेहतरी के पक्ष में थी. ऐसे तमाम मौके आए, जब अस्सी के दशक में गुजरात में आरक्षण विरोधी मुहिम चली. वाजपेयी गए और पार्टी को इससे दूर रखा. कहा जाता है कि एक मीटिंग में उन्होंने कहा, ‘अगर भगवान भी मुझसे कहें, तो भी मैं आरक्षण नहीं हटाऊंगा.’ इससे समाज के वंचित तबके की बेहतरी को लेकर उनकी प्रतिबद्धता नजर आती है. उन्होंने बीजेपी को आरक्षण विरोधी मोर्चे से अलग रखा.

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जब भी कड़े फैसले लेने की बारी आती थी, तब बाहरी तौर पर उनका नरम व्यक्तित्व छलावे की तरह होता था. करगिल में घुसपैठ के बाद पाकिस्तान को इसका अंदाजा जरूर लगा होगा. हालांकि उन्होंने युद्ध की हुंकार वाले अंदाज में गए बगैर बड़ा संतुलित तरीका अपनाया. जिस तरह करगिल से घुसपैठियों को निकाला गया, उसकी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वाहवाही हुई. पाकिस्तान को सख्त संदेश देते हुए भी उन्होंने असाधारण संयम बनाए रखा. उस वक्त के गृहमंत्री और उनके करीबी मित्र लालकृष्ण आडवाणी वाजपेयी को एक ऐसे नेता के तौर पर परिभाषित करते हैं, जिसका बाहरी आवरण कमल के फूल जैसा है, लेकिन अंदर से वो वज्र जैसे हैं (इंद्र का हथियार).

हालांकि इंसानी जिंदगी के दरकने की शाश्वत घटना उनके साथ 2004 के चुनावों के बाद शुरू हो गई थी. 2009 के चुनाव तक वो राजनीतिक जीवन जारी रखने में नाकाम दिखने लगे. हालांकि कभी-कभी अपने साथियों को सलाह देते रहे. कुछ समय बाद शारीरिक हालत ने उन्हें इससे भी दूर कर दिया. सच्चे अर्थों में वाजपेयी की राजनीतिक शख्सियत में कुछ ऐसी अद्भुत बात है, जो उन्हें आजाद भारत में किसी भी नेता से अलग खड़ा करती है.

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