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काकोरी: अशफाक खान नहीं चाहते थे सरकारी खजाना लूटना

इन क्रांतिकारियों की शहादत को 2017 में 90 साल पूरे हो गए हैं

Updated On: Dec 19, 2017 04:31 PM IST

FP Staff

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काकोरी: अशफाक खान नहीं चाहते थे सरकारी खजाना लूटना

एक ट्रेन डकैती कितनी बड़ी हो सकती है? अगर लूट के पैसे की जगह सरकार और सिस्टम पर पड़ने वाले असर की बात करें तो काकोरी कांड भारत की सबसे बड़ी ट्रेन डकैती मानी जाएगी. वैसे काकोरी ट्रेन लूट का असर सबसे ज्यादा इतिहास पर पड़ा. 10-12 लड़कों ने वो काम किया जिसने हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (एचएसआरए) की नींव रखी. इसी एचएसआरए ने भगत सिंह और जतींद्रनाथ जैसे देश के अलग-अलग हिस्सों के क्रांतिकारियों को एक साथ लाने का काम किया.

अश्फाक नहीं चाहते थे कि काकोरी हो

1857 के गदर के बाद देश में अंग्रेजों ने बागियों का भरपूर दमन किया. 1920 आते-आते नौजवानों की एक नई पीढ़ी आ चुकी थी जो सशस्त्र क्रांति के जरिए गोरों से टक्कर लेना चाहती थी और महात्मा गांधी के चौरी-चौरा के बाद असहयोग आंदोलन खत्म करने से नाराज थे. इन लड़कों ने एक संगठन बनाया एचआरए. हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन का उद्देश्य क्रांति कर अंग्रेजों को भगाना था. राजेंद्र लाहिड़ी, चंद्रशेखर आज़ाद, रामप्रसाद बिस्मिल और अशफाकउल्लाह खां जैसे लोग इस विद्रोह के लिए पैसा इकट्ठा करना चाहते थे.

काकोरी से पहले पैसा लाने का एक ही तरीका था. जमींदारों, सेठों से राह चलते पैसा छीन लेना. दो राजनीतिक डकैतियां डाली गईं. पैसा तो नहीं मिला मगर दो लोग मारे गए. इसके बाद तय हुआ कि सरकारी खजाना ही लूटा जाएगा.

1925 में मेरठ के एक अनाथालय में सहारनपुर-लखनऊ डाउन पैसेंजर  में जा रहे खजाने को लूटने का प्रस्ताव रखा गया. लोग बताते हैं कि अश्फाक इससे सहमत नहीं थे. उनका कहना था कि संगठन इतना मजबूत नहीं है कि सरकार से सीधे टक्कर ले सके. खजाना लूटने का मतलब है कि अंग्रेज सब छोड़कर एचआरए के पीछे पड़ जाएंगे. मगर बहुमत काकोरी के पक्ष में था. 9 अगस्त की तारीख पक्की हो गई.

एक चादर की छाप

काकोरी में राजेंद्रनाथ लाहिड़ी ने चेन खींच कर ट्रेन रोकी. बिस्मिल, अशफाक समेत 6 लोगों ने सरकारी खजाने का बक्सा गिरा लिया. मन्मथनाथ गुप्ता से बक्सा नहीं खुल रहा था तो अशफाक ने उन्हें अपना माउज़र पकड़ाया और खुद बक्सा तोड़ने लगे. इस गहमागहमी में मन्मथनाथ गुप्ता से गोली चल गई और अहमद अली नाम का मुसाफिर मारा गया. इसके बाद सब वहां से भागे तो एक चादर मौके पर छूट गई. आज़ादी के कई साल बाद तक जीवित रहे मन्मथनाथ गुप्ता खुद को इस गलती का जिम्मेदार मानते रहे.

काकोरी के क्रांतिकारी

काकोरी के क्रांतिकारी

स्कॉटलैंड यार्ड के जासूस

सरकार ने स्कॉटलैंड यार्ड से अफसर बुलवाए. ताकि ब्रिटिश शासन की शान में गुस्ताखी करने वाले हर शख्स को पकड़ा जा सके.

पुलिस ने उस चादर पर लगे निशान से पता किया कि चादर शाहजहांपुर के धोबी ने धोई है. वहां पता चला कि चादर किसी बनारसी लाल की है. बनारसी लाल बिस्मिल के साथी थे. 9 अगस्त वाले दिन बिस्मिल शाहजहांपुर में नहीं थे. एक-एक कर 40 लोग गिरफ्तार कर लिए गए.

सबसे आखिर में गिरफ्तार होने वाले शचींद्रनाथ बख्शी और अशफाकउल्ला खां थे. चंद्रशेखर आज़ाद को गिरफ्तार नहीं किया जा सका. अदालती पैरवी में बिस्मिल अपनी पैरवी खुद करना चाहते थे. उन्हें मौका नहीं दिया गया. चीफ जस्टिस बिस्मिल की जिरह से काफी प्रभावित थे. कहीं उनको रिहा न करना पड़ जाए इसलिए बहस करने से रोक दिया गया.

रामप्रसाद बिस्मिल, राजेंद्रनाथ लाहिड़ी, अशफाकउल्ला खां और रौशन सिंह को फांसी हुई. बाकी सबको अलग-अलग समय कारावास मिला. जितने लोगों ने सजा कम करने की अपील की उन सबकी सजाएं बढ़ाई गईं. प्रवणेश चटर्जी एक मात्र ऐसे क्रांतिकारी थे जिनकी सजा 5 साल से घटाकर 4 साल कर दी गई. इसके पीछे कारण था कि जज को उनकी खूबसूरत हैंडराइटिंग बहुत पसंद आई थी. 17-18-19 दिसंबर 1927 को क्रांतिकारियों को फांसी दे दी गई.

इस कांड के बाद चंद्रशेखर आजाद ने इसके बाद संगठन को दोबारा खड़ा किया. नया नाम रखा गया हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन. इसमें भगत सिंह, सुखदेव राजगुरु जैसों की आमद हुई. इस बीच काकोरी और उसे अंजाम देने वाले ये नाम इतिहास में अमर हो गए.

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