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चिकन-मटन के जरिए आपके शरीर में पहुंच रहा है हानिकारक आर्सेनिक

महामारी संबंधी अध्ययनों (एपिडेमॉलिजिकल स्टडीज) का एक संकेत है कि आर्सेनिक के लगातार उपभोग और टाइप-टू मधुमेह (डायबिटीज) के रोग होने में रिश्ता है.

Updated On: Nov 16, 2018 02:44 PM IST

Maneka Gandhi Maneka Gandhi

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चिकन-मटन के जरिए आपके शरीर में पहुंच रहा है हानिकारक आर्सेनिक

'रात के खाने पर कुछ मेहमान आने वाले हैं. श्रीमती जी! मेहमानों के लिए आर्सेनिक मिला स्वादिष्ट चिकन करी तैयार कर दीजिए. क्या कहा? नहीं हो सकता ? ठीक है, फिर हम मेहमानों को आर्सेनिक मिला तंदूरी चिकन खिलाने के लिए कहीं बाहर ले जाएंगे..'

अगर आपको लगता है कि ये पंक्तियां बॉलीवुड की किसी ताजातरीन मर्डर मिस्ट्री की पटकथा से ली गईं हैं तो आप गलती पर हैं. दरअसल ये बातें फिल्मी नहीं बल्कि एक सच्चाई हैं. आर्सेनिक एक जहर होता है और इस जहर ने नाटकों, फिल्मों तथा उपन्यासों में कई किरदारों की जान ली है. लेकिन जो बात हमारी आंखों से लगातार छुपी चली आ रही है वो ये है कि हमलोग भी रोजाना अपने भोजन में आर्सेनिक ले रहे हैं.

आर्सेनिक दो तरह का होता है-कार्बनिक और अकार्बनिक. अकार्बनिक आर्सेनिक के यौगिक (कंपाउंड) कार्बनिक आर्सेनिक (यह भी नुकसानदेह होता है) की तुलना में मनुष्यों के लिए कहीं ज्यादा हानिकारक होते हैं. अकार्बनिक आर्सेनिक के यौगिक शरीर की कोशिकाओं से प्रतिक्रिया करते हैं, और उनकी कार्य-प्रणाली में हेर-फेर कर देते हैं.

मिसाल के लिए, कोशिकाएं ऊर्जा पैदा करने और संकेत देने के लिए फॉस्फेट का इस्तेमाल करती हैं लेकिन आर्सेनिक का एक रूप जो आर्सेनेट कहलाता है, कोशिकाओं में प्रतिरूप बना सकता है और फॉस्फेट को हटाकर उसकी जगह ले सकता है. इससे कोशिकाओं की ऊर्जा-उत्पादन और दूसरी कोशिकाओं से संवाद करने की क्षमता में बिगाड़ पैदा होता है.

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यह 200+ एन्जाइम्स के कामकाज में बदलाव लाता है और इस बदलाव के कारण ये एन्जाइम्स जहर में तब्दील हो जाते हैं. आर्सेनिक के जहरीले होने का जिक्र एबर्स पेपिरस में आता है जो ईसा पूर्व 1500 की रचना है.

आर्सेनिक की मात्रा तेज हो तो इसके जहर से उल्टी, पेट-दर्द, खूनी अतिसार (डायरिया). हृदय संबंधी परेशानियां, लाल रक्त कोशिकाओं में टूटन, चक्कर आना, मूर्छा और सन्निपात, सदमा, बेहोशी और मौत का वाकया पेश आ सकता है.

लेकिन असल चिन्ता आर्सेनिक की ज्यादा नहीं बल्कि कम मात्रा की चपेट में आने की करनी है, बशर्ते इस कम मात्रा की चपेट में हम देर तक रहें. ( शेष दुनिया में आर्सेनिक के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया गया है सो अब इसका इस्तेमाल इमारती लकड़ी में लगे कीड़ों को मारने के लिए एक रसायन के रूप में नहीं किया जा सकता लेकिन भारत में अब भी लकड़ी के बचाव के लिए आर्सेनिक का चलन जारी है.)

प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

हम दूध, सेब के जूस तथा वाइन के जरिए आर्सेनिक की चपेट में आते हैं. एफडीए को वाइन के 83 ब्रांडों में उच्च मात्रा में अकार्बनिक आर्सेनिक मिला है. लेकिन ध्यान रखने की एक बात यह भी है कि हम कई प्रकार के जो मीट खाते हैं उनमें भी आर्सेनिक होता है- खासकर मछली, शेलफिश और चिकन में.

आर्सेनिक की मात्रा कम हो तो इसके लक्षण ज्यादा गंभीर रूप में नहीं दिखते. लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि शरीर में धीमा जहर नहीं पहुंच रहा और इस जहर से देह बर्बाद नहीं हो रही. कम मात्रा में होने के कारण आर्सेनिक के यौगिक भले ही कमजोर हों लेकिन उनका धीमा असर लगातार जारी रहता है.

आर्सेनिक का संबंध विटामिन ए की कमी, हृदय रोग, स्ट्रोक, सांस के लाइलाज रोगों, मधुमेह (डायबिटीज) तथा फेफड़े, मूत्राशय और त्वचा के कैंसर और गुर्दे/जिगर के रोगों से है. आर्सेनिक के असर में ज्यादा दिन तक रहने पर त्वचा में बदलाव ( चमड़ी का रंग काला पड़ना, बदरंग होना, लाल होना, सूजन तथा चमड़ी पर गांठ या मस्सों का उभरना) आता है.

नाखूनों पर उजले रंग के धब्बे उभर सकते हैं. तंत्रिओं तथा मोटर-नर्व्स में दोष पैदा हो सकते हैं. एक समस्या लैक्टिक एडोसिस की पैदा होती है. आर्सेनिक कोशिकाओं में पोटेशियम के जाने को रोकता है और पोटेशियम की मात्रा कम हो जाय तो हृदय-गति में अवरोध की समस्या पैदा होती है जो जानलेवा हो सकती है. आर्सेनिक के कारण पैदा होने वाली पोटेशियम की कमी से तंत्रिका-तंत्र से जुड़ी परेशानियां, उच्च रक्तचाप, केंद्रीय तंत्रिका तंत्र में अवरोध तथा एनेमिया (रक्ताल्पता) जैसे रोग होते हैं.

महामारी संबंधी अध्ययनों (एपिडेमॉलिजिकल स्टडीज) का एक संकेत है कि आर्सेनिक के लगातार उपभोग और टाइप-टू मधुमेह (डायबिटीज) के रोग होने में रिश्ता है. गर्भवती महिलाएं अगर आहार के जरिए आर्सेनिक ले रही हैं तो उन्हें कम वजन और छोटे आकार के बच्चे पैदा हो सकते हैं. आर्सेनिक के शुरुआती लक्षण सिरदर्द, विभ्रम तथा सुस्ती के रूप में प्रकट होते हैं. आप जब भी चिकन खाते हैं, थोड़ी सी आर्सेनिक आपके शरीर में चली जाती है.

साल 1940 के दशक से ही मुर्गे-मुर्गियों को आर्सेनिक दिया जाता है ताकि बहुत कम चुग्गे देने के बावजूद उनका शरीर और वजन तेजी से बढ़े. इसका मतलब हुआ कि खास किस्म के दड़बों में रखकर पाले जा रहे मुर्गे-मुर्गियों को आप कम भोजन देंगे तो भी उनका आकार मन-मुताबिक बढ़ जाएगा. इससे पॉलिट्री मालिक की लागत में कमी आती है. रोग्जरसोन तथा निटरसोन नाम की दवाइयों से चिकन तेजी से बढ़ता है और यह दवा उनकी रोगग्रस्त त्वचा को लाल रंग में बदल देती है ताकि चिकन देखने में स्वस्थ जान पड़ें.

रोग्जरसोन तथा निटरसोन दवा बनाने वाली कंपनी तथा अमेरिकन फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन इसके उपयोग को यह कहकर जायज ठहराते हैं कि इस्तेमाल किया जाने वाला आर्सेनिक अपनी प्रकृति में कार्बनिक(आर्गेनिक) है. लेकिन साल 2011 के एक अध्ययन में यह दावा गलत साबित हुआ.

तब जॉन होपकिंस सेंटर फॉर ए लिवेबल फ्यूचर ने अमेरिका के 10 शहरों में दुकानों में बेचे जा रहे चिकन ब्रेस्ट का सैकड़ों की तादाद में विश्लेषण किया. इस विश्लेषण से पता चला कि रोग्जरसोन चिकन के शरीर में जाने के साथ कैंसरकारक अकार्बनिक आर्सेनिक में बदल जाता है. इस चिकन को जब काटा और पकाया जाता है अकार्बनिक रसायन की मात्रा खतरनाक स्तर तक बढ़ जाती है.

इंस्टीट्यूट फॉर एग्रीकल्चर एंड ट्रेड पॉलिसी (2006) के मुताबिक खाद्य-आपूर्ति के लिए पाले गए 87 लाख चिकेन में 70 फीसद तादाद ऐसे चिकेन की थी जिन्हें रोग्जरसोन खिलाया गया था. जॉन हापकिंग्स ने तुरंत ही एफडीए से कहा कि वह लोगों की स्वास्थ्य रक्षा के मकसद को ध्यान में रखते हुए आर्सेनिक आधारित इस दवाई को दी गई मंजूरी तुरंत वापस ले और कांग्रेस जंतुओं के मांस से बने तमाम खाद्य-पदार्थों में आर्सेनिक आधारित दवाइयों के उपयोग को स्थायी तौर पर रोकने के लिए कानून बनाए.

कोई प्रतिबंध तो आयद नहीं हुई लेकिन अमेरिका में कुछ पॉलट्रीज ने स्वेच्छा से अपने ब्रॉयलर उत्पादन में इस दवा का इस्तेमाल बंद कर दिया. कैंसर को लेकर बढ़ती चिंता और जागरुकता के मद्देनजर फाइजर ने 2011 में ऐलान किया कि कंपनी अमेरिका में यह दवा अब नहीं बेचेगी. लेकिन कंपनी रोग्जरसोन और निटरसोन दूसरे देशों मे बेचती है. चिकन को दिया जाने वाले आर्सेनिक मिश्रित आहार पर जापान तथा ब्रिटेन सहित यूरोप के 25 देशों में हमेशा से रोक रही है. लेकिन कनाडा,ऑस्ट्रेलिया तथा एशिया के कई देशों में ऐसे चिकेन फीड (मुर्गे-मुर्गियों को दिया जाने वाला आहार/चुग्गा) के इस्तेमाल को मंजूरी है.

भारत में पॉलिट्री के उद्योग में रोग्जरसोन तथा निटरासोन का व्यापक रूप से इस्तेमाल होता है. दरअसल, आर्सेनिक आधारित फार्म-फीड की एक साधारण सी सर्च करें तो पूरे देश से इसके 22,300 विक्रेताओं के नाम उभरकर सामने आते हैं. आप इसे एनिमल फीड, ब्रायलर फीड या फिर ब्रायलर ग्रोथ प्रमोटर के नाम से खोज सकते हैं. रोग्जरसोन के एक विज्ञापन में लिखा है, 'हमने अपने कारोबार की शुरुआत 2010 में की और हम पॉलिट्री फीड एडीटिव तथा वुड प्रिजर्वेटिव सहित कई किस्म के उत्पाद बेचने में सक्षम हैं. हमारे उत्पादों के ग्राहकों की एक बड़ी तादाद पूरी दुनिया में फैली हुई है. हमारे कुछ बड़े ग्राहक लैटिन अमेरिका, मध्यपूर्व, दक्षिण अमेरिका, दक्षिण/पश्चिम यूरोप, दक्षिण पूर्व एशिया, सेंट्रल अमेरिका, आस्ट्रेलिया, मलेशिया तथा भारत के लोकल मार्केट से हैं.'

ज्यादा से ज्यादा लोग अभी चिकेन खा रहे हैं बगैर यह जाने कि उसमें घातक आर्सेनिक मौजूद है. ग्लोबल एग्रीकल्चर इन्फॉरमेशन नेटवर्क के मुताबिक प्रसंस्कृत(प्रोसेस्ड) चिकेन का इस्तेमाल भारत में सालाना 15-20 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है. भारत सरकार के डेयरीज्, फिशरीज तथा पशुपालन विभाग के आंकड़े बताते हैं कि साल 2016-17 में तकरीबन 23 करोड़ 80 लाख चिकेन मारे गए.

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वेस्ट बंगाल यूनिवर्सिटी ऑफ फिशरिज एंड एनिमल साइंसेज द्वारा कोलकाता में हुए एक अध्ययन से पता चलता है कि चिकन, मटन और अंडे के सैम्पल्स (नमूना) में आर्सेनिक खतरनाक मात्रा में मौजूद है. इस अध्ययन में 24 परगना के देगंगा प्रखंड के आठ गांवों के पॉलिट्री तथा अन्य जंतु-उत्पादों को शामिल किया गया था. अध्ययन से पता चला कि इलाके के पॉलिट्री उत्पाद में विहित मात्रा से पांच गुणा ज्यादा आर्सेनिक मौजूद है.

वेस्ट बंगाल यूनिवर्सिटी ऑफ फिशरिज एंड एनीमल साइंसेज के एक शोधकर्ता(रिसर्चर) ने बताया, 'हमने देखा कि पॉलिट्री फार्म में तैयार किए जा रहे ब्रायलर चिकेन में आर्सेनिक 0.77 पीपीएम (पार्ट पर मिलियन) तक मौजूद है जबकि अंडों में आर्सेनिक की मात्रा 0.38 पीपीएम तक थी. ये दोनों ही निर्धारित सीमा से बहुत ज्यादा है. अधिकारियों को चाहिए कि वे फौरन पॉलिट्री फार्म पर छापा मारें.'

सिर्फ चिकेन खाने वाले लोगों को ही जोखिम नहीं है बल्कि हम जैसा हर व्यक्ति जोखिम के दायरे में हैं. चिकेन के मल का इस्तेमाल खेतों में खाद के रूप में होता है. खेतों की मिट्टी में मौजूद बैक्टीरिया चिकेन के मल में मौजूद कार्बनिक आर्सेनिक को अकार्बनिक आर्सेनिक में बदल देते हैं.

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साइंस ऑफ द टोटल एन्वायर्नमेंट में प्रकाशित यूनिवर्सिटी ऑफ अलबर्टा के एक अध्ययन से पता चलता है कि चिकेन के फीड में मौजूद आर्सेनिक बड़ी आसानी से चिकेन के शरीर से उसके मल में चला जाता है. चूंकि चिकेन के मल का इस्तेमाल मिट्टी को उपजाऊ बनाने के लिए खाद के रूप में होता है सो चिकेन-मल के इस्तेमाल वाली मिट्टी में उगे पौधों में आर्सेनिक की मात्रा बढ़ी हुई होती है.

इससे लोगों की सेहत को नुकसान पहुंच सकता है. पॉलिट्री से पैदा 70-90 फीसद आर्सेनिक पानी में घुलनशील है. इसका मतलब है मिट्टी के जरिए यह आर्सेनिक भूमिगत जल में प्रवेश कर सकता है. पॉलिट्री के आर्सेनिक मिले अवशिष्ट (मल, चुग्गे तथा पंख आदि) दुधारू पशुओं को प्रोटीन के आहार के तौर पर खिलाए जाते हैं. ऐसे में आर्सेनिक मिला चुग्गा पॉलिट्री को खिलाने का वैधानिक चलन अन्य खाद्य-पदार्थों को भी आर्सेनिक के जरिए दूषित कर सकता है.

आर्सेनिक के इस्तेमाल से एंटीबायोटिक के प्रति रोधन-क्षमता (रेसिस्टेंस) बढ़ती है. यह संक्रामक रोगों को लेकर चिंता की एक वजह है क्योंकि पॉलिट्री प्रोड्यूसर्स दैनंदिन रूप से ऐसे फीड एडिटिव का इस्तेमाल करते हैं, जिनमें एंटीबायोटिक तथा आर्सेनिक से बने पदार्थ मिले होते हैं.

डॉक्टर्स तथा पूरी मेडिकल बिरादरी को आगे बढ़कर अभियान चलाना चाहिए और मांग करनी चाहिए कि पॉलिट्री उत्पादन बगैर आर्सेनिक के हो. सेहत के लिए गैर-जरूरी जोखिम पैदा होने की आशंका को देखते हुए एफएसएसआई तथा ड्रग कंट्रोलर को आर्सेनिक मिले फीड एडिटिव्स के चलन को दी गई मंजूरी वापस ले लेनी चाहिए. यूरोप के उदाहरण से हमें पता है कि बिना आर्सेनिक के भी पॉलिट्री का उत्पादन हो सकता है.

नियंत्रण का एकमात्र तरीका है आर्सेनिक मिले फार्म फीड तथा अन्य उत्पादों पर प्रतिबंध लगाना. सिर्फ रोग्जरसोन तथा निटरसोन पर ही नहीं बल्कि आर्सेनिलिक एसिड, कार्बरसोन तथा ऐसे अन्य यौगिकों (कंपाउंड्स) पर भी रोक लगनी चाहिए. निगरानी के मानक सख्त बनाए जाएं, चिकेन के मांस और अंडे की नियमित जांच हो तथा फार्मास्युटिक्ल्स(दवा) की फैक्ट्रियों का निरीक्षण हो तो प्रतिबंधों का पालन सुनिश्चित किया जा सकेगा. इस बात पर बहस का कोई मतलब नहीं कि कितनी मात्रा में और किस किस्म का आर्सेनिक खाया जा सकता है. जरूरत तो इस बात की है कि आर्सेनिक एकदम खाया ही न जाए.

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