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क्यों फिल्मफेयर अवॉर्ड में एक ही गायिका के नॉमिनेट हुए थे सारे गाने

रोमांटिक गानों की क्वीन अलका यागनिक के जन्मदिन पर खास

Updated On: Mar 20, 2018 08:32 AM IST

FP Staff

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क्यों फिल्मफेयर अवॉर्ड में एक ही गायिका के नॉमिनेट हुए थे सारे गाने

अलका यागनिक तब 15 साल की थीं. उन दिनों वो कलकत्ता में रहती थीं लेकिन मुंबई आना-जाना लगा रहता था. दरअसल अलका के मां-बाप की ख्वाहिश थी कि उनकी बेटी एक कामयाब गायिका बने. अलका की मां ने खुद भी शास्त्रीय संगीत सीखा था और गाती थीं. पिता नौकरी तो नेवी में करते थे लेकिन उन्हें भी गाने का शौक था. अलका ने भी बचपन में ही तय कर लिया था कि वो शास्त्रीय संगीत की बजाए सुगम संगीत यानी लाइट म्यूजिक सीखेंगी.

संगीत सीखने और पढ़ाई के साथ-साथ उनकी मां उन्हें मुंबई लेकर जाती थीं और समय लेकर संगीत निर्देशकों से मिलती थीं. बेटी की काबिलियत और मां की ये मेहनत जल्दी ही रंग लाई. हुआ यूं कि 1980 के आस पास प्रकाश मेहरा एक फिल्म बना रहे थे-लावारिस. इस फिल्म का संगीत कल्याण जी आनंद जी तैयार कर रहे थे.

फिल्म में अमिताभ बच्चन, जीनत अमान, राखी और अमजद खान जैसे कलाकार थे. फिल्म जबरदस्त हिट हुई थी. इस फिल्म के हिट होने में एक गाने का अहम रोल रहा. गाने के बोल थे- मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है. इस गीत के लिए कल्याण जी आनंद जी ने एक नई आवाज को मौका दिया था और वो आवाज थी अलका यागनिक की. करीब 15 साल की उम्र में इसी गाने के लिए वो प्रतिष्ठित फिल्मफेयर अवॉर्ड के लिए नॉमिनेट की गईं.

इसी वक्त अलका के माता-पिता को लगा कि अब समय की जरूरत है कि कलकत्ता में रहने की बजाए मुंबई चला जाए. लावारिस 1981 में रिलीज हुई थी. उसके बाद इस बड़े फैसले को लेने और उसे अपनाने में कुछ वक्त लगा. पिता ने अपनी नौकरी से वक्त से पहले ही रिटायरमेंट लिया. 1986 के आस-पास अलका यागनिक अपनी मां के साथ मुंबई आ गईं.

मुंबई आने के अगले ही साल दो ऐसी फिल्में आईं, जिसके संगीत ने धूम मचा दी. पहली कयामत से कयामत तक और दूसरी तेजाब. कयामत से कयामत तक में संगीत आनंद मिलिंद का था और तेजाब में लक्ष्मीकांत प्यारेलाल का. कयामत से कयामत तक के सारे गाने हिट हुए और सारे गाने अलका यागनिक और उदित नारायण के गाए हुए थे. ‘कयामत से कयामत तक’ इस फिल्म से जुड़े ज्यादातर लोगों के लिए शुरुआती काम था, आमिर खान, जूही चावला, डायरेक्टर मंसूर खान से लेकर संगीत निर्देशक आनंद मिलिंद तक हर किसी ने अपनी तरफ से बेस्ट देने की कोशिश की. जिसके चलते उस फिल्म का संगीत अब भी तरोताजा करता है. इसके अलावा तेजाब का एक गीत ‘एक दो तीन चार पांच छ सात’ भी अलका यागनिक का गाया हुआ था, जो बहुत बड़ा हिट गाना बना.

मेरे अंगने के बाद अलका का गाया ये दूसरा ऐसा गाना था अपने आप एक नए किस्म का प्रयोग था और प्रयोग सफल रहा. लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के साथ अलका की पहचान तबसे थी जब वो 10-11 साल की थीं. लक्ष्मीकांत ने उस वक्त उनसे कहा था कि या तो डबिंग आर्टिस्ट बन जाओ या फिर इंतजार करो. इंतजार करने का फैसला अलका की मां ने लिया और वो फैसला सही साबित हुआ. इस दौरान अलका यागनिक को लता मंगेशकर का भी आशीर्वाद मिला. अलका लता मंगेशकर को भगवान मानती थीं और खुद को उनकी दासी.

इसके बाद तो रोमांटिक संगीत के उस दौर में अलका यागनिक सबसे चहेती कलाकार हो गईं. 90 के दशक की लगभग हर सभी फिल्मों में उन्होंने गाने गाए. उदित नारायण, कुमार सानू, अभिजीत जैसे कलाकारों के साथ अलका की गायकी का अंदाज सुननेवालों ने खूब पसंद किया. उनकी आवाज में एक खास किस्म का रोमांस था, जो लोगो को पसंद आता था. अलका खुद भी मानती हैं कि उनकी आवाज की जो ‘टोनर क्वालिटी’ है वो भगवान ने उन्हें बड़े मन से दी है.

खास बात ये थी कि अलका यागनिक की आवाज उस दौर की सभी हीरोइनों पर फिट बैठती थी. 90 के दशक में उनका एक और गाना सुपरहिट हुआ. सुपरहिट होने के साथ साथ उस गाने को लेकर कंट्रोवर्सी भी खूब हुई. उस गीत के बारे में ये जानना जरूरी है कि उसे लिखा था दिग्गज गीतकार आनंद बक्षी ने, संगीत था लक्ष्मीकांत प्यारेलाल का, वो गाना फिल्माया गाया था माधुरी दीक्षित पर. विवाद गाने के बोल को लेकर हुआ था- चोली के पीछे क्या है. इस गाने के लिए अलका यागनिक को फिल्मफेयर अवॉर्ड मिला था. इसके अलावा सरोज खान को इसी गाने के लिए बेस्ट कोरियोग्राफर का अवॉर्ड दिया गया था.

ये 1994 का वो साल था जब फिल्मफेयर अवॉर्ड में बेस्ट फीमेल सिंगर के लिए जितने भी गाने नॉमिनेट किए गए सारे अलका यागनिक के थे. उसमें खलनायक का चोली के पीछे, पालकी पे होकर सवार, फिल्म बाजीगर का बाजीगर ओ बाजीगर और फिल्म हम हैं राही प्यार के का टाइटिल गाना नॉमिनेट हुआ था. ये उस दशक में उनकी गायकी के जादू को समझने के लिए काफी है. अलका यागनिक ने अपने करियर में अब तक 7 फिल्मफेयर अवॉर्ड जीते हैं. दो नेशनल अवॉर्ड से भी उन्हें नवाजा जा चुका है.

ऐसी दर्जनों फिल्में हैं जिनकी कामयाबी में उनके संगीत का रोल बहुत अहम है और उस फिल्म के संगीत की कामयाबी में अलका यागनिक का रोल. ऐसी फिल्मों में साजन, ताल, हम हैं राही प्यार के, राजा हिंदुस्तानी, परदेस, बाजीगर, कुछ कुछ होता है, दिल चाहता है जैसी फिल्में सहज ही याद आती हैं. ऐसा भी कहा जाने लगा कि फिल्म के टाइटल गाने में अलका यागनिक की आवाज का एक ‘लकी कनेक्शन’ है.

उन्होंने जिन फिल्मों के टाइटिगल गाने गाए वो फिल्म और उसका संगीत हिट हुआ. साल 2001 में कभी खुशी कभी गम का गाना ‘सूरज हुआ मद्धम’ बेहद लोकप्रिय हुआ. फिल्म तमाशा का उनका गाना तुम अगर साथ हो, लोकप्रियता के चरम पर रहा. दिलचस्प बात ये है कि शुरू-शुरू में अलका यागनिक एआर रहमान के साथ काम करने में हिचकिचाती थीं, क्योंकि वो ज्यादातर रिकॉर्डिंग रात में करते थे. बाद में अलका को महसूस हुआ कि रात में रिकॉर्डिंग करने पर किसी तरह का ‘डिसटर्बेंस’ ना होने की वजह से रहमान ऐसा करते हैं.

इसी दौरान फिल्म इंडस्ट्री में सुनिधि चौहान की एंट्री हुई. कुछ साल बाद श्रेया घोषाल भी आईं. संगीतकारों को नई आवाज मिली. अलका यागनिक के पास फिल्मी गाने भले ही कम हुए हों लेकिन उनकी व्यस्तता कम नहीं हुई. वो टूअर करती रहीं. कई रियलिटी शो में जज का रोल निभाती रहीं. बच्चों के रियलिटी शो की वे बेहद लोकप्रिय जज हैं. आज अलका यागनिक ऐसी स्थिति में भी हैं कि वो कई गानों को मना तक कर देती हैं. उन्होंने हिंदुस्तानी फिल्मी संगीत को दर्जनों ऐसे नगमें दिए हैं जिनकी मिठास हमेशा कानों में घुलती रहेगी.

 

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