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जन्मदिन विशेष: चाचा की साइकिल से स्कूल जाने वाले अखिलेश कैसे पहुंचे सिडनी टू सियासत

बस एक बार चुनाव लड़ने के लिए पिता का आदेश आया और अखिलेश यादव सब छोड़कर यूपी लौट आए

Updated On: Jul 01, 2018 01:46 PM IST

Rituraj Tripathi Rituraj Tripathi

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जन्मदिन विशेष: चाचा की साइकिल से स्कूल जाने वाले अखिलेश कैसे पहुंचे सिडनी टू सियासत
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करीब तीन दशक पुरानी बात है, पेड़ पर चढ़ा एक लड़का अपनी चाची के सामने अड़ गया कि जब तक उसे टॉफी नहीं मिलेगी, वह पेड़ से नीचे नहीं उतरेगा. ये लड़का कोई और नहीं बल्कि देश के सबसे बड़े राजनीतिक परिवार का चश्म-ओ-चिराग है.

बचपन में लोग उसे टीपू बुलाते थे लेकिन आज संविधान से लेकर संसद के गलियारों तक दुनिया उन्हें अखिलेश यादव के नाम से जानती है. जिन चाची के सामने वह अपने बचपन में टॉफी के लिए अड़ गए थे, वह कोई और नहीं बल्कि उनके चाचा शिवपाल सिंह यादव की पत्नी सरला यादव थीं. हालांकि आज शिवपाल और उनके परिवार से अखिलेश के रिश्ते बहुत मधुर नहीं हैं.

आज यानी 1 जुलाई को उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव का जन्मदिन है. इस साल वह 45 के हो जाएंगे. बचपन का टीपू कैसे यूपी की सियासत का राजा बना और कैसे इस राजा की कुर्सी पर परिवार और पार्टी के कुछ नेताओं की नजर लगी, यह एक दिलचस्प और विवादों से भरी कहानी है.

अखिलेश यादव उर्फ टीपू का जन्म 1 जुलाई, 1973 को यूपी के इटावा जिले में एक छोटे से गांव सैफई में हुआ. यह वही सैफई है जहां हर साल एक रंगारंग कार्यक्रम होता था और फिल्मी जगत की मशहूर हस्तियां अपनी कलाकारी का हुनर दिखाकर लाखों रुपए कमाकर ले जाती थीं. सैफई महोत्सव में बड़े-बड़े नेताओं और बिजनेसमैनों का जमावड़ा लगता था.

एक कहावत थी कि हिंदुस्तान की मशहूर हस्तियों का मेला देखना हो तो मुलायम सिंह के गांव में होने वाला सैफई महोत्सव देखना चाहिए. हालांकि पिछली बार इस महोत्सव को पारिवारिक और राजनीतिक विवादों की वजह से रद्द कर दिया गया था.

चाचा शिवपाल के साथ साइकिल पर बैठकर स्कूल जाते थे अखिलेश

ShivpalSinghYadav 

टीपू जब छोटे थे तभी उनकी मां का देहान्त हो गया था, बचपन में ही मां का साया सर से उठ जाने की वजह से चाचा शिवपाल सिंह यादव और उनके परिवार ने ही टीपू का खयाल रखा. इटावा के सेंट मैरी स्कूल में कई बार चाचा की साइकिल पर बैठकर टीपू स्कूल जाया करते थे. स्कूल में भी अखिलेश के गार्जियन उनके चाचा शिवपाल और चाची सरला ही थीं.

हालांकि मुख्यमंत्री बनने के बाद टीपू ने क्यों चाचा शिवपाल का खयाल रखना बंद कर दिया, यह सियासी कहानी का एक अलग पहलू है. राजनीति में एक दौर ऐसा आया जब मुलायम सिंह की जान को खतरा था, उस वक्त मुलायम ने अखिलेश को स्कूल जाने से मना कर दिया था और वह घर पर ही पढ़ाई करने लगे. 1980 से 1982 के बीच चाची सरला ही उन्हें पढ़ाती थीं क्योंकि टीपू की मां बीमार रहती थीं.

टीपू बचपन में काफी शर्मीले थे लेकिन दिमागी रूप से वह काफी तेज थे. एक बार स्कूल में सांप होने की वजह से सभी बच्चे डर गए लेकिन टीपू ने पूरी हिम्मत के साथ उस सांप का सामना किया और डंडे से उसे मार दिया, इस घटना के बाद टीपू स्कूल में बच्चों के लिए हीरो बन गए थे.

चाचा शिवपाल ने ही टीपू को दिलाया था मिलिट्री स्कूल में दाखिला

टीपू के स्कूल की पढ़ाई राजस्थान के धौलपुर मिलिट्री स्कूल से हुई. चाचा शिवपाल ही उन्हें इटावा से वहां लेकर गए थे. स्कूल में दाखिले से जुड़ी सारी औपचारिकताएं चाचा शिवपाल ने ही पूरी की थीं क्योंकि मुलायम सिंह अपनी राजनीति में व्यस्त थे. स्कूल की पढ़ाई करने के बाद टीपू ने सिविल इनवायरमेंट इंजीनियरिंग में डिग्री हासिल की.

बाद में वह सिडनी यूनिवर्सिटी से इनवायरमेंट इंजीनियरिंग में डिग्री लेने के लिए ऑस्ट्रेलिया चले गए. सिडनी में पढ़ाई के दौरान उन्हें पॉप म्यूजिक का चस्का लगा. उन्हें किताबों और फिल्मों का भी शौक है. ऑस्ट्रेलिया में पढ़ाई जारी रहने तक उन्होंने अपनी पहचान छुपा कर रखी और किसी को नहीं बताया कि वह भारतीय राजनीति में नेताजी के नाम से प्रसिद्ध मुलायम सिंह यादव के बेटे हैं.

मीडिया को दिए गए इंटरव्यू में टीपू ने कई बार इस बात का जिक्र किया है कि उन्हें कभी नहीं पता था कि वह राजनीति में आएंगे. बस एक बार चुनाव लड़ने के लिए पिता का आदेश आया और वह सब छोड़कर यूपी लौट आए.

सिडनी से लिखे लेटर्स ने चार सालों तक बनाए रखा डिस्टेंस रिलेशनशिप 

valentine prapose day 2018 akhilesh yadav dimple love story

एक पुरानी कहावत है कि प्यार और पढ़ाई एक साथ चलते हैं. अक्सर पढ़ाई के दौरान ही प्यार परवान चढ़ता है. टीपू के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. अखिलेश को एक लड़की से पहली नजर में प्यार हो गया. ये लड़की कोई और नहीं बल्कि डिंपल यादव थीं.

उस समय डिंपल यादव लखनऊ यूनिवर्सिटी में कॉमर्स की पढ़ाई कर रही थीं. एक कॉमन फ्रेंड के जरिए टीपू और डिंपल की पहली मुलाकात हुई थी. दोनों एक दूसरे को पसंद करने लगे थे और शादी करना चाहते थे. डिंपल यादव के पिता एससी रावत लेफ्टिनेंट कर्नल थे.

लेकिन, टीपू के पिता मुलायम सिंह यादव नहीं चाहते थे कि यह शादी हो. वह बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव की बेटी मीसा से अखिलेश की शादी करवाना चाहते थे. लेकिन, प्यार कहां किसी की परवाह करता है. टीपू ने पिता मुलायम सिंह यादव को मनाने के लिए दादी को अपना जरिया बनाया.

टीपू ने दादी मूर्ति देवी को अपनी प्रेम कहानी सुनाई और कहा कि वह डिंपल से शादी करना चाहते हैं. आखिरकार टीपू की मेहनत रंग लाई और तमाम गतिरोधों के बावजूद 24 नवंबर, 1999 को डिंपल और अखिलेश की शादी हो गई.

अमर सिंह के मनाने पर हुई थी अखिलेश और डिंपल की शादी

AmarSingh 

कहा जाता है कि अखिलेश और डिंपल की शादी के लिए एक दौर में सपा के वफादार रहे अमर सिंह ने मुलायम सिंह को मनाया था. अखिलेश की जिद के सामने मुलायम को झुकना पड़ा, ये ठीक वैसे ही था जैसे बचपन में टीपू को पेड़ से नीचे उतारने के लिए सरला चाची को टॉफी देनी ही पड़ी थी.

'अखिलेश यादव- बदलाव की लहर' किताब की लेखिका सुनीत एरन ने लिखा है कि दोनों की पहली मुलाकात तब हुई थी जब अखिलेश 21 साल के थे और डिंपल 17 साल की थीं. डिंपल स्कूल में पढ़ाई कर रही थीं, हालांकि दोनों तब एक दूसरे के साथ कभी नहीं रहे लेकिन डिस्टेंस रिलेशनशिप के दौरान दोनों ने एक-दूसरे को चार सालों तक डेट किया.

अखिलेश के सिडनी जाने के बाद भी दोनों लोग एक-दूसरे को लेटर लिखते रहे हालांकि आज की व्हाट्सऐप और फेसबुक वाली पीढ़ी इस दौर को करीने से नहीं समझ सकेगी. आज अखिलेश और डिंपल को एक आदर्श कपल माना जाता है. उनके दो बेटी और एक बेटा है. बेटियों का नाम अदिति और टीना है, जबकि बेटे का नाम अर्जुन है.

सुनीत ने अखिलेश के एक बयान को भी अपनी किताब में दर्शाया है जिसमें अखिलेश ने कहा, 'अगर मैं राजनीतिक पिता का बेटा न होता तो फौजी होता.'

टीपू से टीपू सुल्तान कैसे बन गए अखिलेश यादव

akhilesh yadav

टीपू एक आम आदमी की तरह अपना जीवन जी रहे थे. उन्हें जिप्सी चलाने का बहुत शौक था. मोटापे और सुस्ती से चिढ़ने वाले टीपू दूध से बने छाछ में देशी घी और जीरा का तड़गा लगवाकर पिया करते थे. अदरक की चाय और फोटोग्राफी का शौक उनके जीवन को सामान्य तरीके से चला रहा था.

साल 2000 में अचानक नेताजी(मुलायम सिंह) का पैगाम टीपू के पास पहुंचा जिसमें उन्हें यूपी की कन्नौज लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने के लिए कहा गया था. यह मुलायम सिंह की ही खाली की हुई सीट थी जिस पर उपचुनाव हो रहा था.

यहीं से टीपू के अखिलेश यादव बनने का सफर शुरू हुआ और पहली बार कन्नौज से चुनाव जीतकर 26 साल के अखिलेश यादव ने पिता की राजनीतिक विरासत को अपने कंधों का सहारा दिया. यूपी के सियासी दरवाजों पर ये अखिलेश की पहली दस्तक थी.

साल 2004 में फिर से आम चुनाव हुए और अखिलेश यादव दूसरी बार लोकसभा के लिए चुने गए. अब लोगों में अखिलेश के अंदर पिता मुलायम की झलक दिखने लगी थी. हालांकि आलोचक अभी भी अखिलेश को परिपक्व नहीं मानते थे लेकिन समय गुजरने के साथ-साथ लोगों का यह भ्रम भी दूर हो गया.

 38 साल की उम्र में यूपी के मुख्यमंत्री बने थे अखिलेश यादव

Akhilesh Yadav

अखिलेश ने लोकसभा में हैट्रिक मारते हुए 2009 में एक बार फिर जीत हासिल की. इस बार की जीत ने अखिलेश को विरोधियों के चेहरे का सबसे बड़ा सवाल बना दिया. अब विरोधी नेता भी अखिलेश में अपना राजनीतिक प्रतिद्वंदी देखने लगे थे.

जब तक विरोधी अपने सवालों के माकूल जवाब ढूंढ पाते तब तक यूपी के सियासी गलियारों में एक बड़ा धमाका हुआ.10 मार्च 2012 को अखिलेश यादव को समाजवादी पार्टी का नेता चुन लिया गया. 2012 के विधानसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी भारी बहुमत से जीती.

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र वाले देश ने अपने सबसे बड़े राज्य की मुख्यमंत्री पद की कुर्सी पर अखिलेश यादव को बैठा दिया. यूपी की 404 सीटों में से 224 जीत कर समाजवादी पार्टी सत्ता पर कबिज हो गई. 15 मार्च, 2012 को अखिलेश यादव ने 38 साल की उम्र में यूपी के 20वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली.

हालांकि चाचा शिवपाल नहीं चाहते थे कि अखिलेश मुख्यमंत्री बनें लेकिन किसी तरह उन्हें मनाकर अखिलेश को सत्ता सौंप दी गई. यह वह दौर था जब अखिलेश यादव टीपू से टीपू सुल्तान बन चुके थे.

पारिवारिक विवादों ने चटकाया टीपू सुल्तान का किला

Akhilesh Mulayam Shivpal

सबसे बड़ा लोकतंत्र, सबसे बड़ा राज्य और उस राज्य का सबसे बड़ा सम्राट. सब कुछ था अखिलेश यादव के पास. सियासी दंगल में अखिलेश लगातार अपने विरोधियों को पटखनी दे रहे थे लेकिन परिवार के अंदर जिस दंगल ने तबाही मचाई, उसने नेताजी (मुलायम सिंह) के कुनबे को ताश के पत्तों की तरह बिखेर दिया.

सत्ता के सिंहासन पर एक साथ भाई और भतीजे ताल ठोक रहे थे. अखिलेश यादव और उनके चाचा शिवपाल सिंह यादव के रिश्तों के बीच दरार पड़ चुकी थी. समाजवादी पार्टी के सबसे बड़े किंगमेकर कहे जाने वाले अमर सिंह भी अखिलेश के आंखों की किरकिरी बन चुके थे. मतभेदों का सिलसिला मनभेदों में बदल गया था. मुलायम सिंह, भाई और बेटे के चुनाव की दहलीज पर अकेले पड़ गए थे.

उस दौर में यादव परिवार महाभारत के कुरुक्षेत्र से कम नहीं था. बयानों की बौछार से सियासी रणभूमि को रंग दिया गया था. समाजवादी पार्टी के टूटने की खबरें सामने आने लगी थीं. इसी बीच पार्टी के हाईकमान का एक फैसला टीवी पर ब्रेकिंग न्यूज बन गया. अखिलेश और उनके चाचा रामगोपाल यादव को पार्टी से निष्कासित कर दिया गया.

हालांकि एक दिन के अंदर ही अखिलेश को पार्टी में वापस ले लिया गया. बाद में सपा के राष्ट्रीय अधिवेशन में अखिलेश यादव को राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना गया. मुलायम सिंह को केवल नाम के लिए पार्टी का संरक्षक बनाया गया. मुलायम ने कहा था कि यह पार्टी उनके जीवनभर की मेहनत की कमाई है लेकिन बेटे ने उन्हें बेदखल कर दिया. वहीं अखिलेश कह रहे थे कि नेताजी लोगों के बहकावे में आ गए हैं.

अखिलेश के खिलाफ अमर को साथ लेकर EC पहुंच गए थे मुलायम

Mulayam Singh Yadav 

मुलायम सिंह, अमर सिंह को साथ में लेकर चुनाव आयोग गए और अखिलेश की समाजवादी पार्टी को असंवैधानिक बताया और मान्यता रद्द करने की गुजारिश की. लेकिन, अखिलेश और उनके चाचा रामगोपाल ने चुनाव आयोग को पार्टी के कुल 5731 डेलीगेट्स में से 4716 के शपथ पत्र सौंपे, इन लोगों ने अखिलेश को समर्थन दिया था.

पार्टी के 229 विधायकों में से 212 ने भी अखिलेश को समर्थन दिया था और 68 विधान परिषद सदस्यों में से 56 सदस्यों और 24 सांसदों में से 15 ने भी अखिलेश को अपना नेता माना था. इस तरह अखिलेश समाजवादी पार्टी के सशक्त नेता बनकर उभरे जिसमें फैसले लेने की ताकत दिखाई दे रही थी. अखिलेश ने अपनी पहचान जाति से हटकर बनाई थी.

लेकिन पार्टी और परिवार के अंदर मची उथल-पुथल ने 2017 के विधानसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी के पतन का नया अध्याय लिख दिया. 403 सीटों में से समाजवादी पार्टी 356 सीटें हार गई. पिछले विधानसभा चुनाव में 224 सीटें जीतने वाली समाजवादी पार्टी केवल 47 सीटों पर ही सिमट कर रह गई.

इस बार 312 सीटें जीतने वाली बीजेपी ने राज्य में सरकार बनाई और समाजवादी पार्टी के हाथों से सत्ता की चाबी सरक गई. इस हार की वजह से अखिलेश यादव को परिवार और पार्टी दोनों का नुकसान उठाना पड़ा. 2017 के चुनावों में बुरी हार का मुंह देखने वाले अखिलेश यादव को यह जख्म भरने में काफी समय लगेगा.

अगर अखिलेश यादव 2019 के लोकसभा चुनाव में सही रणनीति के साथ चुनाव लड़ते हैं तो हो सकता है कि आने वाले नतीजे 2022 के विधानसभा चुनावों में कुछ मलहम लगा जाएं.

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