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पुण्यतिथि विशेष: 'मौलाना' जो अपनी फिक्र में 'आजाद' थे

ऐसी जानी-सुनी एक बात ये है कि मुस्लिम लीग की सियासत को मौलाना आजाद जरा भी अच्छे नहीं लगते थे. अपनी चिढ़ में जिन्ना ने उन्हें कांग्रेस का 'शो बॉय' तक कह दिया था

Updated On: Feb 22, 2018 10:32 AM IST

Chandan Srivastawa Chandan Srivastawa
लेखक सामाजिक-सांस्कृतिक विषयों के शोधकर्ता और इन्क्लूसिव मीडिया फॉर चेंज के संस्थापक सदस्य हैं

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पुण्यतिथि विशेष: 'मौलाना' जो अपनी फिक्र में 'आजाद' थे

‘हम तो रुखसत हुए, औरों ने संभाली दुनिया- फिर न कहना, हुई तौहीद से खाली दुनिया-’

अल्लाह से ये शिकवा यों तो अल्लामा इकबाल को था लेकिन उस पागल दिल का क्या करें जो इसे मौलाना अबुल कलाम आजाद के नाम से याद कर रहा है जिनकी आज बरसी है! बेशक दिल पर किसी का अख्तियार नहीं, लेकिन बेअख्तियारी का मतलब ये नहीं कि दिल की दुनिया के कोई उसूल नहीं होते. इकबाल के शिकवे को अगर दिल ने मौलाना आजाद के नाम से याद किया है तो कोई वाजिब वजह जरूर होगी.

उस वजह की तलाश पर निकलने से पहले चंद लम्हे थमकर तनिक यह भी सोच लें कि मौलाना आजाद के ना रहने पर ऐसा क्या अनमोल खो गया, जो दिल में यह अफसोस जागे कि ‘हुई तौहीद से खाली दुनिया’..?

एक शोकमग्न सभा

वो 24 फरवरी का दिन था. मौलाना आजाद को अनंत के सफर पर निकले दो रोज बीत चुके थे. संसद में शोकमग्न सभा बैठी थी. कुछ के मन में जरूर चल रहा होगा कि देखें, देश के पहले प्रधानमंत्री के रूप में जवाहरलाल नेहरू क्या कहते हैं. आखिर, आजादी की विहान-वेला में जिस घड़ी (1946 जुलाई-सितंबर) नेहरू कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए, उसके तुरंत पहले लगातार सात सालों (1940-1946) तक यह ओहदा मौलाना आजाद संभाल रहे थे. और, देश की आजादी की आहटों के बीच मन में उनके भी था कि कांग्रेस के अध्यक्ष पद का चुनाव एक बार फिर लड़ें. सब मन ही मन जान रहे थे कि आजाद देश की प्रधानी के रास्ते को इसी पद से होकर गुजरना है.

खैर, अध्यक्ष पद की चुनावी लड़ाई, महात्मा गांधी के हस्तक्षेप और रूठने-मनाने के उस मशहूर वाकये के बारह बरस बाद 1958 की 24 फरवरी को देश की संसद में जवाहरलाल नेहरू ने शिक्षा मंत्री मौलाना आजाद के ना रहने पर जो कुछ कहा वह भी अपने आप में एक नजीर है. नेहरू के दर्द भरे बोल थे :

maulana azad

'किसी बड़ी शख्सियत के ना रहने पर यह कहने का आम चलन हो गया है कि अपूरणीय क्षति हुई है जिसकी भरपाई नहीं की जा सकती. एक हद तक यह बात सही भी है. लेकिन मौलाना आजाद के निधन पर यह बात शब्द के सटीक और अपने सबसे गहरे अर्थों में ठीक बैठती है. मेरा मतलब ये नहीं कि भारत में अब कोई महान शख्सियत पैदा नहीं होगी. इस देश में पहले भी महान व्यक्ति जन्मे हैं और आगे भी जन्म लेंगे. लेकिन मौलाना आजाद जिस तर्ज की महानता के साकार रूप थे, वह हिन्दुस्तान में या फिर दुनिया में कहीं और अब कभी नहीं दिखाई देगी.'

‘मौलाना’ भी और ‘आजाद’ भी

ऊपर के वाक्य तकरीबन यह कहते जान पड़ते हैं मानवता के खजाने से एक अनमोल हीरा हमेशा के लिए खत्म हो गया. आगे के वक्तों में फिर कभी मौलाना आजाद सी शख्सियत को देखना नसीब नहीं होगा. आप तर्क कर सकते हैं कि भविष्य को किसने देखा है, दुनिया हर रोज बदलती है और पहले से कहीं बेहतर होने के लिए बदलती है. सो बहुत मुमकिन है मौलाना आजाद से बेहतर शख्सियत आने वाले वक्तों में दुनिया को देखने के लिए मिले. तो क्या नेहरू किसी जज्बात के ज्वार में बहकर उस शोकमग्न सभा में मौलाना आजाद को ‘ना भविष्यति’ के अंदाज में याद कर रहे थे ?

ना, जज्बातों का जोर जरूर ही रहा होगा, लेकिन नेहरू अपनी तकरीर में तर्क का दामन कभी नहीं छोड़ते थे. उन्होंने मौलाना आजाद के बेमिसाल होने की एक मजबूत वजह गनाई, कहा, ‘मैं उन्हें जब भी देखता था तो मुझे याद आते थे यूरोपीय पुनर्जागरण काल के वे महान मनीषी आत्माएं जिन्होंने फ्रेंच क्रांति की आहटों को सुन लिया था और उदारता तथा धीरज का वह गुण भी जो सिर्फ आधुनिक जमाने के पहले के वक्तों में पाया जाता था. मौलाना आजाद नए और पुराने युग की सारी अच्छाइयों का बेजोड़ संगम थे.’

इसी क्रम में नेहरू ने कहा कि पश्चिमी एशिया की जिन संस्कृतियों ने हजारों साल से हिन्दुस्तान को सजाया-संवारा है- ईरान की संस्कृति, फारसी और अरबी की संस्कृति उसके सारे श्रेष्ठ तत्वों का संगम थे मौलाना आजाद और 'वह युग चूंकि अब बीत गया है, सो अब कोई भी मौलाना आजाद की सी महानता लेकर पैदा नहीं होगा.'

दो आलिम, दो देश और एक मजहब

मौलाना आजाद की शख्सियत को याद करते हुए ईरानी-अरबी संस्कृति के किन श्रेष्ठ तत्वों की बात सोच रहे थे जवाहरलाल नेहरू? अच्छा होगा कि इस सवाल का जवाब हम देश की आजादी के इतिहास के जाने-समझे प्रसंगों के भीतर ही खोजें.

ऐसी जानी-सुनी एक बात ये है कि मुस्लिम लीग की सियासत को मौलाना आजाद जरा भी अच्छे नहीं लगते थे. अपनी चिढ़ में जिन्ना ने उन्हें कांग्रेस का 'शो बॉय' तक कह दिया था. जिन्ना कांग्रेस को सिर्फ हिंदुओं की कौमी पार्टी साबित करना चाहते थे. सो, कुरान के व्याख्याता और मजहबी बातों के अगाध ज्ञान के आधार पर ‘इमाम-उल-हिन्द’ कहलाने वाले मौलाना आजाद का कांग्रेस में होना जिन्ना को हरचंद खटकता था.

जिन्ना की खटक समझी जा सकती है. आखिर मौलाना आजाद की फिक्र जिन्ना के ‘टू नेशन थ्योरी’ की काट जो थी. जिन्ना को लगता था भारत में मुस्लिम राजाओं के शासन के बहुत पहले पाकिस्तान तो उसी लम्हे बन चुका था जब किसी गैर-मुस्लिम ने इस्लाम कबूल किया. साल 1944 के 8 मार्च को अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के वायस-चांसलर डॉक्टर सर जियाउद्दीन अहमद के एक भोज में यह बात जिन्ना ने ऐलानिया तौर पर कही थी.

इस्लाम की ऐसी समझ से मौलाना आजाद को जरा भी इत्तेफाक ना था. वे दो मजहब की बात सोच सकते थे. लेकिन मजहब के आधार पर दो देश की बात बनाने की बात नहीं. जिस घड़ी (1912) उन्होंने 'हिज्बुल्लाह’ नाम से उलेमा (इस्लाम के विद्वान) की पार्टी बनाई और मजहब के दायरे के भीतर सियासत की सोच पैदा करने के खयाल से अल-हिलाल तथा अल-बलाग जैसे अखबार निकाले तब भी ‘दो मजहब-दो देश’ का खयाल उनके जेहन में नहीं था और आजादी की लड़ाई के सबसे कठिन दिनों में जब (1940) वे कांग्रेस की अगुआई कर रहे थे तब भी यह खयाल उनके जेहन से कोसों दूर था.

रामगढ़ (1940) के अपने मशहूर अध्यक्षीय भाषण में उन्होंने मुस्लिम लीग की राजनीति पर चोट करते हुए कहा: “जो बात मैंने अट्ठाइस बरस पहले अल-हिलाल में कही थी, उसे फिर आज यहां दोहराता हूं कि हिन्दुस्तान की सियासत की बनावट में यह कहने से ज्यादा सच से दूर कोई और बात नहीं कि मुसलमान यहां अल्पसंख्यक हैं...”

'..मैं मुसलमान हूं और मुझे इस बात का फख्र है. इस्लाम की तेरह सौ साल की शानदार परंपराएं मेरी विरासत हैं और मैं इस विरासत का कण मात्र भी खोने को तैयार नहीं.. बतौर मुसलमान इस्लामी धर्म और संस्कृति में मेरी खास रुचि है और मैं उसमें जरा भी हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं कर सकता. लेकिन इन भावनाओं के साथ-साथ कुछ बातें और भी हैं जिन्हें जिंदगी की सच्चाइयों और हालात ने मुझ पर आयद की हैं. इस्लाम का जज्बा इनके आड़े नहीं आता बल्कि राह दिखाता और मेरे आगे बढ़ने में मददगार होता है... मुझे हिन्दुस्तानी होने का गर्व है. मैं उस अदृश्य एकता का हिस्सा हूं जिसे भारतीय राष्ट्रीयता कहते हैं.'

सवाल उठता है मौलाना आजाद की इस्लाम की व्याख्या में ऐसा क्या खास है जो उन्हें मुस्लिम होने और हिन्दुस्तानी होने पर साथ-साथ गर्व करना सिखाता है जबकि इसके उलट मुस्लिम लीग को इस्लाम का एक ही मतलब नजर आता है कि जितनी जल्दी हो सके दिल्ली से कराची पहुंचकर ‘पाकिस्तान’ बना लिया जाय ?

शेख सरमद, इकबाल और मौलाना आजाद

बीसवीं सदी में हिन्दुस्तान की धरती पर इस्लाम के दो मशहूर व्याख्याता हुए- एक अल्लामा इकबाल और दूसरे मौलाना आजाद. दोनों की इस्लाम की व्याख्याओं में अंतर है और इस अंतर ही के कारण इकबाल पाकिस्तान के वैचारिक जनक कहलाते हैं जबकि मौलाना आजाद भारत की साझी संस्कृति के बेमिसाल प्रतीक !

चूंकि यहां विचारों के लंबे सफर पर निकलने की गुंजाइश नहीं सो अच्छा होगा कि हम इस अंतर को समझने के लिए शेख सरमद के किस्से का सहारा लें.

शाहजहां के शासन के आखिरी वक्त में सिंध के रास्ते ईरान से हिन्दुस्तान पहुंचे थे शेख सरमद. यों यहूदी थे, लेकिन ईसाई धर्म के रास्ते से गुजरे और इस्लाम से भी. धर्म उनके लिए बाहरी दिखावे की नहीं बल्कि गहरे अनुभव की चीज थी. थोड़े में किस्सा यह कि तलाश उन्हें उस एक ‘नूर’ की थी जिसके बारे में मीर ने कहा है कि ‘उस के फ़रोग़-ए-हुस्न से झमके है सब में नूर शम-ए-हरम हो या हो दीया सोमनाथ का’.

सूफियत के रास्ते पर चलने वाले शेख सरमद की प्रसिद्धि इतनी बढ़ी कि दाराशिकोह इनका भक्त हो गया. शायद यही बात चुभी होगी जो औरंगजेब ने बहाने से शेख सरमद को सजा देने की ठानी. कहते हैं, काजियों की मदद लेकर इस्लाम-विरुद्ध आचरण करने के आरोप मढ़ औरंगजेब ने शेख सरमद को सूली पर चढ़ाया. मौलाना आजाद इस वाकये को याद करते हुए शेख सरमद पर लिखे अपने तज्किरे में कहते है :

‘आलमगीर (औरंगजेब) की सादगी और संयम अपनी जगह, लेकिन दाराशिकोह का प्रेमपूर्ण पागलपन, तर्कबुद्धि का न रहना ज्यादा बेहतर है क्योंकि आलमगीर के मामले में हम देखते हैं कि संयम और सादगी ने तलवार थाम रखा है जो वेदना में पड़े लोगों के रक्त से सनी हुई है जबकि दाराशिकोह के मामले में पाते हैं कि खून की नदी खुद उसके शरीर की नसों से बह रही है. शायद, दाराशिकोह भी आलमगीर की सादगी और संयम को नापसंद करता था और इसी कारण उसने सरमद जैसे ‘पागल‘ लोगों का साथ चुनना ‘संयमी‘ लोगों की सभा में शामिल होने के बजाय उचित समझा..”

लेकिन औरंगजेब के हाथों शेख सरमद को मिली सूली की सजा पर अल्लामा इकबाल की फिक्र एकदम ही अलग है. वे लिखते हैं: “पिछले मुस्लिम राजवंशों के इतिहास ने औरंगजेब को सिखाया कि भारत में इस्लाम की ताकत लोगों की सहयोग-भावना पर उतनी आधारित नहीं है जितनी शासक (मुस्लिम)- वर्ग की शक्ति पर जबकि अक़बर यही मानता था..वह (औरंगजेब) हमारी तरकश में बचा आखिरी तीर था- बुतपरस्त हिन्दुस्तान में किसी अब्राहम की तरह ”....

शेख सरमद को मिली सूली की सजा पर मौलाना आजाद और अल्लामा इकबाल के विचारों की तुलना के आधार पर फरजाना शेख ने लिखा है कि ‘इकबाल‘ और ‘आज़ाद‘ दोनों में बहुत-सी बातों में समान हैं लेकिन ”आज़ाद इस्लामी कानून-व्यवस्था लेकर बहुत उत्सुक नहीं थे. वे मानते थे कि इस्लाम में कानून पर जोर दरअसल यहूदी-परंपरा से अपने को बांधे रखने के कारण आया है और विधि-निषेधों तथा धार्मिक क्रिया-कलापों पर हद से ज्यादा जोर देने कारण आदमी उस ‘सार्वभौम‘ संदेश और नैतिक उद्देश्य से दूर हो जाता है जो धर्म का मूल भाव है. ‘आज़ाद‘ का तर्क था कि इस्लाम के कानूनी पक्ष पर जोर देने के कारण ही भारत या कहीं भी इस्लाम, पतन का शिकार हुआ..”

'आज़ाद की तरह, इकबाल भी यहूदी-पंरपरा से प्राप्त कानूनी हठधर्मी को जायज नहीं मानते थे लेकिन ‘आजाद’ के विपरीत इक़बाल का मानना था कि ‘सार्वभौम नैतिक भावना’ पर जोर दरअसल सूफीयत की देन है जो इहलोक से ज्यादा परलोक की चिन्ता करता है और इस तरह एक समाज-व्यवस्था के रूप में इस्लाम के विजन को धुंधला बना देता है..'

इस्लाम कबूल करने वाले कश्मीर के पंडित परिवार में जन्मे, विलायत में पढ़े-लिखे और जिन्ना की रहबरी करने वाले अल्लामा इकबाल की इस्लाम की समझ ने सिखाया: औरंगजेब ने अच्छा किया जो शेख सरमद को सूली पर चढ़ाया.

पवित्र भूमि मक्का में मौलाना के घर पैदा हुए लेकिन कलकत्ता में पले-बढ़े और घर पर रहकर मौलवियों से तालीम लेने वाले इमाम-उल-हिन्द अबुल कलाम आजाद को इस्लाम की उनकी समझ ने सिखाया : अच्छा दाराशिकोह था, जो उसने संन्यासियों और सूफियों का साथ चुना. दिल का पागल होना अच्छा लेकिन दिमाग की वह सादगी नहीं अच्छी जो बात-बात पर तलवार थाम ले!

लेख के इस मुकाब पर अब सोचिए कि ‘शिकवा’ का वह मशहूर हिस्सा किस पर मौजूं जान पड़ता है, अल्लामा इकबाल पर या मौलाना आजाद पर :

‘हम तो रुखसत हुए, औरों ने संभाली दुनिया फिर न कहना, हुई तौहीद से खाली दुनिया.

(तौहीद कहते हैं एकेश्वरवाद को)

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